देश तो देशवासी बनातें हैं-नीलम महेंद्र

दिंनाक: 17 Aug 2017 19:52:39

इतिहास केवल गर्व महसूस करने के लिए नहीं होता सबक लेने के लिए भी होता है क्योंकि जो अपने इतिहास से सीख नहीं लेते वो भविष्य के निर्माता भी नहीं बन पाते।“

भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार "मन की बात" कार्यक्रम से पूरे देश से सीधा संपर्क साधा है वो वाकई काबिले तारीफ है।

इस कार्यक्रम के द्वारा वे न सिर्फ देश के हर वर्ग से मुखातिब होकर उन्हें देश को उनसे जो अपेक्षाएँ हैं,उनसे अवगत कराते हैं बल्कि अपनी सरकार की नीतियों,उनके उद्देश्य एवं देश को उनसे होने वाले लाभ से भी रूबरू कराते हैं।
इस बार उनकी मन की बात का केंद्र 'अगस्त का महीने ' रहा।
वो महीना जिसमें असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई, अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगे,और हमें लगभग 200 सालों की गुलामी से आजादी मिली।

यह वो महीना है जिसमें हमें एक  लम्बे संघर्ष के बाद "स्वराज" तो मिल गया लेकिन  "सुराज" का आज भी देश को इंतजार है। दुनिया 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी का जश्न देखती है  लेकिन इस 'एक दिन ' के लिए हमने लगभग सौ सालों तक जो कुर्बानियाँ दीं उनका दर्द तो केवल हम ही महसूस कर सकते हैं l दरअसल हमारी सफलता को तो दुनिया देखती है लेकिन इस दिन के पीछे के त्याग और बलिदान को  कोई देख नहीं पाता। 1857 में रानी लक्ष्मीबाई की तलवार से जो चिंगारी भड़की थी, वो 9 अगस्त 1942 तक एक लौ बन चुकी थी।

वो लौ जिसकी अगन में देश का बच्चा बूढ़ा जवान, सभी जल रहे थे। पूरे भारत में धधकने वाली इस ज्वाला के तेज के आगे अंग्रेज टिक नहीं पाए और 1947 में वो ऐतिहासिक लम्हा भी आया जिसकी चाह में इस माटी के वीरों ने अपनी जान की परवाह भी नहीं की थी।

लेकिन क्या यह आजादी का पल केवल एक नारे से आया?  "अंग्रेजों भारत छोड़ो"   यह नारा डॉ युसुफ मेहर अली ने  दिया, "करो या मरो" का नारा गाँधीजी ने दिया और अंग्रेज चले गए? नहीं,हम सभी जानते हैं कि केवल भाषण और नारों से काम नहीं चलता । ठोस धरातल पर जमीनी स्तर पर काम करने से बात बनती है।

उस समय भी यही हुआ, नारा हमारे नेताओं ने दिया लेकिन आवाज हर मुख से निकली, उस यज्ञ में आहुति हर आत्मा ने दी,जिस से जो बन पाया, उसने वो किया, उस समय जब अंग्रेजी हुकूमत ने कांग्रेस को एक "गैरकानूनी संस्था" घोषित कर दिया और सभी बड़े नेताओं को या तो जेल में डाल दिया या फिर नजरबंद कर दिया, आंदोलन की बागडोर इस देश के आम आदमी ने अपने हाथों में ले ली।

ब्रिटिश शासन का विरोध रुका नहीं, बल्कि और उग्र हो गया। सरकारी सेवकों ने त्यागपत्र नहीं दिए लेकिन कांग्रेस के साथ अपनी राजभक्ति खुलकर घोषित कर दी, सैनिकों ने सेना में रहते हुए ब्रिटिश सरकार के आदेशों के खिलाफ खुली बगावत की और  भारतीयों पर गोलियां चलानी बंद कर दी,छात्रों ने शिक्षण संस्थानों में हड़ताल कर दी,जुलूस निकाले,जगह जगह पर्चे बाँटे और भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए संदेशवाहक का कार्य किया,कृषकों ने  सरकार समर्थक जमींदारों को लगान देना बन्द कर दिया,राजे महाराजाओं ने जनता का सहयोग किया और अपनी प्रजा की सम्प्रभुता स्वीकार कर लीमहिलाएं और छात्राएं भी पीछे नहीं थीं, उनकी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही। कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश के हर नागरिक ने जिस भी रूप में वो अपन योगदान दे सकता था,दिया।

हर दिल में वो ज्वाला थी जो ज्वालामुखी बनी तब जाकर हम गुलामी के अंधेरे से निकल कर स्वतंत्रता के सूर्योदय को देख पाए।
यही ज्वाला आज फिर से देश के हर ह्रदय में जगनी चाहिए।आज हमारा देश एक बार फिर अंधकार के साये में कैद होता जा रहा हैं।हमारे समाज में कुछ बुराइयाँ हैं जो देश को आगे बढ़ने से रोक रही हैं l ये बुराइयाँ हैं ,भ्रष्टाचार ,आतंकवाद ,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद , गरीबी,जगह जगह फैली गन्दगी के,बेरोजगारी ,अबोध बालिकाओं के साथ होने वाले अत्याचार आदि ।यह सभी इस देश की नींव को खोखला करने में लगी हैं।

देश के प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात में पूरे देश का आह्वान किया है कि इस बार अगस्त मास में हम सभी इन बुराइयों के खिलाफ एक महाभियान चलाँए और एक नए भारत के निर्माण का संकल्प लें। लेकिन नए भारत का निर्माण तभी संभव हो पाएगा जब  देश के प्रधानमंत्री के मन की बात इस देश के हर नागरिक के मन की बात बनेगी।

 जब  एक अग्नि देश के हर दिल में जलेगी जब देश का हर व्यक्ति बच्चा बूढ़ा जवान अपने मन में खुद से वादा करेगा कि मुझे इन बुराइयों को इस देश से भगाना है। मुझे आज फिर से देश के लिए इससे लड़ना है। एक ऐसा देश बनना है जहाँ धर्म हो इंसानियत,जाति हो मानवता ,योग्यता हो ईमानदारी,सबला हो हर नारी। हर नागरिक को बराबरी का दर्जा संविधान में नहीं व्यवहार में हासिल हो, और कानून चेहरों के मोहताज न हों जहाँ देश का कोई भी व्यक्ति परेशान न हो। जहाँ स्वराज के साथ सुराज भी हो।