जैसा विचार वैसा संसार

दिंनाक: 17 Aug 2017 20:01:23

गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम | पाण्डव-कौरव का अध्ययन चल रहा है | एक दिन द्रोणाचार्य के मान में विचार आया कि आज युधिष्ठिर और दुर्योधन के विचार और बुद्धि की परीक्षा की जाये | उन्होंने दोनों को बुलावाया | युधिष्ठिर और दुर्योधन ने आकर आचार्य को प्रणाम किया | पूछा – ‘ हमारे लिए क्या आज्ञा है ? ` आचार्य बोले – ‘ युधिष्ठिर ! तुम हस्तिनापुर जाओ और एक ऐसा मनुष्य खोजकर लाओ जो सबसे अधिक दुष्ट हो , दुर्मति हो | ‘ युधिष्ठिर ने कहा – ‘ जो आज्ञा गुरुदेव!’ और तत्काल नगर की ओर चल पड़े | फिर आचार्य ने दुर्योधन से कहा- ‘वत्स ! तुम भी हस्तिनापुर जाओ और एक ऐसा मनुष्य खोजकर आओ जो नगर में सबसे अधिक सज्जन हो, सदाचारी हो |’ दुर्योधन ने कहा – ‘ गुरुदेव! यह कौन सी बड़ी बात है | अभी आपकी आज्ञा पूरी करता हूँ |’ और वह बड़े घमंड से नगर की और चल पड़ा | युधिष्ठिर पुरे दिन नगर में भटकते फिरे, बहुत खोज की | अनेक लोगों से मिलकर पूछताछ की | अनेक उनके मित्र बन गए | परन्तु साँझ के समय सब प्रकार से निराश होकर आश्रम में अकेले ही लौट आये और द्रोणाचार्य से निवेदन किया- ‘गुरुदेव ! मैंने बहुत खोजा, परन्तु मुझे तो सभी सज्जन और सदाचारी नागरिक ही देखने में आये और उनसे मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई | कहीं एक भी दुष्ट मनुष्य दिखाई नहीं दिया मुझे | थोड़ी देर बाद थका-हारा दुर्योधन भी आकर आश्रम में अकेले हि उपस्थित हो गया | उसका शरीर बड़ा थका तथा चेहरा बहुत परेशान था, क्योंकि आज वह न जाने कितने लोगों से झगडे और मारपीट करता रहा | द्रोणाचार्य ने पूछा- ‘क्यों दुर्योधन ! तुम भी अकेले हि लौट आये ?’ दुर्योधन चिडचिडे स्वर में कहने लगा – ‘गुरुदेव ! आपने तो बेकार की बातों में समय नष्ट करने के लिए मुझे भेज दिया | भला हस्तिनापुर में सज्जन और सदाचारी लोग कहाँ बैठे हैं जो मुझे मिल जाते | मैं सारा शहर घूम आया | लेकिन देखा कि एक से एक दुष्ट मनुष्य भरे पड़े हैं | बहुत खोज करने पर भी कहीं एक भी सज्जन मनुष्य मेरे देखने में नहीं आया |

तब गुरुदेव ने समझाया कि जो जैसा होता है उसे हस्तिनापुर क्या, संसार भर में वैसे ही लोग दिखाई देते हैं | इसका कारण है हमारा अपना दृष्टिकोण , विचार और व्यवहार | और इस प्रकार परीक्षा फल युधिष्ठिर के पक्ष में गया था |