भारतवर्ष का सतत प्रवाह - श्री रंगा हरी जी

दिंनाक: 24 Aug 2017 20:58:06

 

वैदिक काल से आज तक भारत

राष्ट्र की भारतीय संकल्पना क्या है? इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रंगा हरी जी द्वारा व्यक्त किये गए विचार -

बहुत से लोग कहते हैं कि राष्ट्रवाद भारत में एक नई अवधारणा है और इसकी उत्पत्ति ब्रिटिश लोगों के आगमन के बाद हुई | यह निश्चित नहीं है | वस्तुतः राष्ट्रवाद की अवधारणा भारत में बहुत प्राचीन है और यह दृढ़ता पूर्वक हमारी संस्कृति में ही अंतर्निहित है। हमें इसके प्रमाण संस्कृत साहित्य में और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य में भी मिलते हैं। सचाई तो यह है कि जब इंग्लैंड में नेशन, नेशनलिज्म और नेशनलटी जैसे शब्द प्रयोग में आना शुरू हुए, उसके कई शताब्दियों पहले संस्कृत वैदिक साहित्य में "राष्ट्र" शब्द की अभिव्यक्ति हुई और यह यदा कदा इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि सैकड़ों वैदिक "ऋचाओं" में "राष्ट्र" शब्द का उल्लेख मिलता है | ऐतिहासिक रूप से देखें तो यूरोप में 3-4 सौ वर्ष पूर्व एक प्रतिक्रियावादी और संघर्ष-पूर्ण अवधारणा के रूप में राष्ट्रवाद आया, जबकि भारत में यह न केवल कई सदियों पूर्व से है, वरन एक सहकारी और रचनात्मक अवधारणा है। वास्तव में तो पश्चिम का राष्ट्रवाद राजनीतिक है, जबकि भारत का मानवतावादी है |

वैदिक काल

वैदिक साहित्य में, "राष्ट्र" की अवधारणा, इसका उद्देश्य और इसके नागरिकों के कर्तव्यों का विस्तृत उल्लेख है। यह अवधारणा वैदिक महर्षियों द्वारा विश्व कल्याण की भावना से विकसित की गई थी और इसे सत्य, ईमानदारी, शिष्टता, यज्ञ, ज्ञान प्राप्त करने और व्यापक दृष्टिकोण के सिद्धांतों पर स्थापित किया गया था। यह निवासियों का एक अनिवार्य कर्तव्य था कि वे जिस भूमि पर रहते हैं, उसकी सेवा करें | वे इसे अपनी मातृभूमि मानें, क्योंकि यही उनका भरण पोषण करती है । राष्ट्र की वैदिक अवधारणा में हमें कोई राजनीतिक अर्थ दिखाई नहीं देता |

कुछ सदी बाद हमें रामायण और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रंथों में भी राष्ट्र की इसी अवधारणा का दिग्दर्शन होता है । यद्यपि इस अवधि में राज्य और राष्ट्र, ये दो अलग-अलग अवधारणाएं विकसित हुईं। जैसा कि आज की परिभाषाओं में देखा गया है, हमारे प्राचीन काल में भी राज्य और राष्ट्र, ये दो अलग-अलग अवधारणायें मान्य थीं । उदाहरण के लिए रामायण में जब भगवान राम को निर्वासित किया गया, तो उनकी दुःख-त्रस्त मां कौशल्या राजा दशरथ को कहती हैं कि "उनके कारण राज्य और राष्ट्र दोनों नष्ट हो जायेंगे" | महाभारत में युधिष्ठिर अपने भाइयों से कहते हैं कि निर्वासन के पश्चात वे अपने राज्य और राष्ट्र को प्राप्त कर लेंगे | ऐसा लगता है कि वाल्मीकि काल में देश की वैदिक अवधारणा अधिक स्पष्ट हुई । मातृभूमि का सीमा निर्धारण हुआ । जैसे कि महर्षि वाल्मीकि भगवान राम का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे हिमालय की तरह दृढ है और एक महासागर की तरह गंभीर है। इस प्रकार भारतवर्ष के भौगोलिक विस्तार को दर्शाया गया है। इसी प्रकार, एक अन्य संदर्भ में, हनुमान जी सुग्रीव और भगवान राम दोनों को समुद्र और सुमेरु के बीच स्थित भूमि की रक्षा करने में सक्षम बताते हैं । भगवान हनुमान सुदूर हिमालय से संजीवनी पौधे प्राप्त कर लंका तक लाते हैं, यह उत्तर से दक्षिण तक की किसी यात्रा का पहला उल्लेखनीय रिकोर्ड है । तभी से भारतवर्ष की सीमाओं को परिभाषित करने वाली लोकप्रिय अभिव्यक्ति, “आसेतु हिमाचल", प्रचलित हुई |

महाभारत काल में, युधिष्ठिर के अश्वमेध और राजसूया यज्ञ से इस शब्द को व्यापक और अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है ।

इसके बाद, चाणक्य के समय राष्ट्र की परिभाषा और अधिक ठोस और सुनिश्चित हुई | "चक्रवर्ती" को परिभाषित करते हुए चाणक्य कहते हैं, "यह भूमि ही राष्ट्र है और उत्तर में हिमालय से लेकर समुद्र पर्यंत जो विशाल भूभाग है, वह "चक्रवर्ती" क्षेत्र है | इस परिभाषा को स्पष्ट करने से पहले चाणक्य ने निश्चय ही देश के कोने कोने की यात्रा की होगी, यहाँ के निवासियों की विभिन्न आदतों और परंपराओं का अध्ययन किया होगा, इसके साथ ही उन्हें इन सबको जोड़ने वाले सूत्रों का भी एहसास हुआ होगा । इस अवधि में ही ऐत्रेय ब्राह्मण में "राष्ट्र" के संदर्भ में उल्लेख किया गया कि महासागर तक फैला यह भू भाग ही राष्ट्र है ।

संगम साहित्य

संगम साहित्य में कवि मंगदी मरुदनर अपनी "पट्टप्पतु" कविता में राजा को संबोधित करते हुए कहा, "हे राजा, आपके राज्य की सीमाएं दक्षिण में कुमारी, उत्तर में हिमालय और पूर्वी-पश्चिमी महासागर तक फैली हैं" ।

लगभग इसी तरह की भावना कवि कुरुंदनकोलियुर किल्लर, महाराजा मंदारन इरुनपोर के समक्ष दोहराते है। संत तिरुवल्लुवर की तिरुककुर्ल (संतों की आवाज़) भी यही कहती है कि "इस आदर्श देश के दोनों तरफ महासागर हैं, एक तरफ पहाड़ों और बारिश की प्रचुरता" है। निश्चय ही  यह उल्लेख भारत के बारे में ही है।

पौराणिक काल

पौराणिक अवधि की बात करें तो विष्णु पुराण के अनुसार "महासागर के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में स्थित भूमि को भारतवर्ष कहा जाता है, और इसके निवासियों को भारतीय "। पुराण में राष्ट्र और राष्ट्र भक्ति को एक गीत के माध्यम से व्यक्त किया गया है "देवता भी भारत देश में जन्म लेने हेतु लालायित रहते हैं, यह स्वर्ग और मोक्ष से भी बेहतर हैं"। ब्रह्मवैवर्त पुराण के लेखक भी कहते हैं कि भारत अन्य सभी देशों से अलग है, यह तपस्या की भूमि है जो सभी के प्रति शुभेक्षा रखती है |

मार्कंडेय पुराण एक कदम और आगे जाकर कहता है कि, भारत की चार सीमाएं हैं, इसके पश्चिम, दक्षिण और पूर्व में एक सागर है, जबकि उत्तर में धनुषाकार पहाड़ों की उपस्थिति है । बाद में, महाकवि कालिदास ने राजा रघु के राज्य की सीमा पूर्वोत्तर में कामरूप तक, दक्षिण में केरल तक और उत्तर-पूर्व में पार्सिक तक बताकर उस समय में राष्ट्र की एकता का संकेत दिया। यहां तक ​​कि भास अपने "स्वप्न वासवदत्ता" में भारत को एक झंडे और एक राजा के अधीन बताते हैं । बाद की अवधि में, क्षेत्रीय भाषाओं में लिखित साहित्य में भी यही अवधारणा दिखाई देती है । गुजरात में, संत नरसिंह मेहता और असम के शंकर देव के गायन में भी यही स्वर हैं । सौराष्ट्र में, स्वामी प्राणनाथ और केरल में, पुन्तन नांबुदरी भी भारतवर्ष और इस भूमि की संस्कृति को स्पर्श करते हैं।  इसी तरह, तमिल कवि "करी किलार्" ने अपने राजा को तमिलनाडु के राजा या द्रविड़ राजा के रूप में नहीं दर्शाया, बल्कि उस भूमि का अधिपति बताया जो हिमालय तक फैली हुई है।

तो इस प्रकार वैदिक काल से भक्ति काल तक, राष्ट्रवाद अनेक प्रकार से परिलक्षित होता है । राजा के लिए भले ही यह राजनीति का विषय हो, किन्तु एक आम आदमी के लिए राष्ट्र की अवधारणा राजा से परे थी | किन्तु लेकिन 16 वीं सदी के बाद हुए मुग़ल आक्रमणों ने परिस्थितियों में दर्दनाक परिवर्तन लाया । बड़ी संख्या में मंदिर नष्ट हुए और जबरन धर्मांतरण कराया गया । यहां तक ​​कि ब्रिटिश काल में भी यही क्रम जारी रहा | लेकिन छपाई प्रौद्योगिकी की शुरूआत के साथ साहित्यिक लेखकों को अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने का और लोगों तक पहुंचाने नया माध्यम मिला । लेकिन रचनात्मक लेखकों के बीच घुटन और निराशा भी थी। उदाहरण के लिए, एक बंगाली नाटक “भारत माता” में केसी बन्द्योपाध्याय ने भारतमाता के बेटों की दयनीय स्थिति के बारे में खुलकर लिखा ।

स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान बड़ी संख्या में "स्वराज्य" और "स्वधर्म" के संघर्ष पर कवितायें लिखी गईं । बंकिम चंद्र चटर्जी और स्वामी विवेकानंद जैसे बहुत से लोगों ने राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हुए लोगों के बीच उत्साह की भावना का संचार किया। वीर सावरकर ने भी अपनी कविताओं में इसे प्रतिध्वनित किया। स्वतंत्र भारत में, यद्यपि वीर रस के ओजपूर्ण काव्य का सृजन तो हुआ, किन्तु नए भारत की दिशा क्या होनी चाहिए, इस विषय को अधिक विस्तारित नहीं किया गया । भारत का राष्ट्रवाद अपनी भूमि से विकसित हुआ है। यह मुश्किल से दो सदियों पुराने राजनीतिक विचारों की एक संकल्पना नहीं है | भारतीय राष्ट्रवाद उस समय विकसित हुआ, जब यूके या पुर्तगाल का नामोनिशान भी नहीं था ।