कोई तो लक्ष्मण रेखा हो – प्रफुल्ल केतकर

दिंनाक: 24 Aug 2017 17:44:37

 

स्वतंत्रता दिवस पर चिंतन 

"क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? यह एक ऐसा विचार है जो मुझे सदैव चिंतित करता है | यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब में देखता हूँ की जाति और पंथ के विभेद जैसे हमारे पुराने दुश्मनों के अतिरिक्त अलग अलग विचारों और मान्यताओं वाले तथा एक दूसरे के विरोधी राजनीतिक दलों के रूप में नए दुश्मन और पैदा हो गए हैं । । क्या भारतीय देश को अपने पंथ से ऊपर स्थान दे सकेंगे या फिर पंथ को ही देश के ऊपर मानेंगे? "

संविधान स्वीकृति के अवसर पर संविधान सभा में डॉ. बी आर अंबेडकर का अंतिम भाषण (25 नवंबर, 1 9 4 9)

हमारा राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस एक राष्ट्र के रूप में हमारी यात्रा के सिंहावलोकन का अवसर प्रदान करता है। किन्तु दुर्भाग्य से,  यह दिन भी अवांछित विवादों और चुनावी लाभ हानि की ओछी राजनीति के कारण विवादित बना । जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत को आकस्मिक वा तानाशाही पूर्ण तरीके से राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोका जाना, सबसे लंबे समय तक कार्यरत रहने वाले मुख्य मंत्रियों में से एक द्वारा अपने उच्चतम संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए इस अवसर का उपयोग अपनी विचारधारा के हित में करना, और कुछ शैक्षणिक संस्थानों द्वारा हमारे राष्ट्रीय जीवन का इस सबसे महत्वपूर्ण दिन को मनाने से इनकार करना जैसी घटनाएँ स्पष्ट रूप से हमारे राष्ट्रीय चिंतन की दुर्दशा को रेखांकित करता है, जिसके खिलाफ डॉ अम्बेडकर ने पहले ही चेतावनी दी थी।

केरल और त्रिपुरा के मुख्य मंत्रियों द्वारा दिए गये विवादास्पद भाषण इसकी बानगी हैं । पिनारई विजयन ने इस अवसर पर जो शब्द प्रयोग किया वह थर्रा देने वाला है - 'राष्ट्रवादी जहर' | जबकि मानिक सरकार ने वैचारिक आधार पर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों को निशाना बनाया। ऐसा करने से कुछ समूह खुश हो गए हों, किन्तु इस प्रकार वे निश्चित तौर पर राष्ट्रीय एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हैरत की बात है कि उन्होंने लोगों को अपनी सरकारों की उपलब्धियां बताने के स्थान पर इस मौके का उपयोग केंद्र सरकार के खिलाफ जहर उगलने के लिए किया। ऐसे विवादों से कम्यूनिस्ट राष्ट्रीय मीडिया में तो जगह बना सकते हैं, किन्तु संविधान निर्माताओं की भावना को तार तार करते हैं ।

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार द्वारा दिए गए विवादास्पद भाषण को देखें | यह तो सच है कि उन्हें निश्चिंत रूप से त्रिपुरा के लोगों द्वारा दो दशकों से अधिक समय तक समर्थन किया गया है, किन्तु इस अवसर पर उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में उन्हें बताने या स्वतंत्रता दिवस पर नए संकल्प लेने की जरूरत नहीं समझी | सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उन्होंने सिर्फ इसलिए कि आने वाले महीनों में उन्हें विधानसभा चुनावों का सामना करना है, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों को लक्षित करने का फैसला किया ।

उत्तर प्रदेश में सरकार द्वारा मदरसों को भी निर्देशित किया गया ठा कि वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस का पर्व मनाएं, इसके बाद भी कुछ संस्थानों ने राष्ट्रगान गाना पसंद नहीं किया | in घटनाओं से पता चलता है की किस प्रकार वोट बैंक की राजनीति ने देश के प्रति भावना को नष्ट भ्रष्ट किया है।

राजनीति विज्ञान के आधुनिक सिद्धांतों के अनुसार, समाज में बढ़ती राजनैतिक चेतना लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है। किन्तु सवाल यह है कि कैसी राजनैतिक चेतना और राजनीति का उद्देश्य क्या ? यह सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में दलगत राजनीति अपरिहार्य और अनिवार्य है;  और उनको जबाब देह रखने के लिए कठिन सवाल पूछने वाली स्वतंत्र मीडिया भी आवश्यक है | किन्तु इसके साथ ही क्या कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होना चाहिए, ताकि ओछी चुनावी राजनीति की छोटी सोच से बचा जा सके ? चुनावी तिकड़मबाजी से इतर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की राजनीति !

'नये भारत' का विचार राजनीतिक क्रांति से फलीभूत नहीं होगा, यह होगा सांस्कृतिक अभ्युदय से; इस प्रक्रिया में ही हमारे राष्ट्रीय चरित्र का परीक्षण होगा। हम, भारतवासियों को राजनीतिक दलों और मीडिया को संदेश देना होगा कि चुनावी बाजार में सबकुछ बिकाऊ नहीं है। हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, जन्मजात एकता, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय दिवस सभी के लिए अहम हैं और कोई अन्य हमारी इस पहचान या प्रभाग का दुरुपयोग या इसमें हेरफेर नहीं कर सकता । हमारी राष्ट्रीयता की भावना और देश के प्रति समर्पण का सामूहिक संकल्प ही राजनीतिक दलों को लक्ष्मण रेखा द्वारा स्वानुशासित कर सकता है, तभी हमारा वर्तमान और भविष्य स्वर्णिम होगा | आईये अतीत से सीख लेकर नए भारत के निर्माण का संकल्प लें ।