सियासत की विरासत- भरतचन्द्र नायक

दिंनाक: 05 Aug 2017 12:12:10

"बोए पेड़ बबूल का फूल कहां ते होय"

भारतीय लोकतंत्र की महिमा निराली है। यहां दशकों तक एक राजनैतिक दल ने आजादी के जंग में कामयाबी का श्रेय भी लूटा और राजनैतिक एकाधिकार भी जमाया। तब निर्वाचित सरकारे लोकतंत्र के नाम पर भंग भी की जाती रही और समय आने पर आया राम गया राम का खेल भी गुजरात और हरियाणा में खेलते हुए राजनैतिक कुशलता का ढोल भी पीटा गया। दिवंगत नेता भजनलाल का उल्लेख खूब हुआ और एक शब्दावली भी गढ़ी गयी लेकिन बलिहारी देश के मतदाताओं की जिन्होंने मुफलिस और मजलूम माने जाने पर भी करिश्मा कर दिखाया। उक्त पार्टी के एकाधिकार का दंभ खंडित किया। विकल्प भी पैदा किया। लोकशाही का मर्म सिखाते हुए फकीरों को बादशाह का रूतबा बख्श दिया। अब वही एकाधिकार वाले बादशाह तोहमत लगा रहे कि उनकी विरासत छीन कर बेइन्साफी की गयी है। जिस निजाम पर पक्षधरता का इल्जाम चस्पा होता रहा। वे ही अब चीख रहे है। उनका आरोप है कि लोकतंत्र को सरेआम लूटा जा रहा है।

चारों तरफ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी के चर्चे है। राज्यसभा के चुनाव की सरगर्मी जारी है। उसके 6माह बाद गुजरात के चुनाव है। इसी दरम्यान बिहार में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिश कुमार ने महागठबंधन से दूरी बनाकर एनडीए का साथ पकड़ लिया। चारों तरफ कोहराम मचा। राहुल गांधी ने इसे महागठबंधन के साथ विश्वासघात बताया वहीं लालूप्रसाद यादव ने कहा कि यह जनता दल यू और कांग्रेस को मिले जनादेश का अपमान है। उपरी तौर पर उनकी आपत्ति सही भी लगती है, लेकिन नीतिश कुमार समर्थकों का यह कहना कि जनादेश जरूर जनता दल यू और कांग्रेस को ही मिला था और इस पर कायम रहना नैतिक जिम्मेदारी बनती थी लेकिन जनादेश के साथ बिहार के अवाम में यह भावना भी थी कि नीतिश कुमार की सरकार साफ सुथरा प्रशासन देगी और उनकी गठबंधन सरकार भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेंस की प्रतिबद्धता पर खरी उतरेगी। लिहाजा जब नीतिश बाबू ने देखा कि न तो लालू परिवार भ्रष्टाचार का स्पष्टीकरण देना चाहता है और न भ्रष्टाचार पर प्रायश्चित करने का साहस दिखा रहा है तो वे भ्रष्टचारी शासन को ढोते रहकर कलंक के भागी क्यों बनतें लेकिन लालू प्रसाद यादव ने सत्ता पलट बर्दाश्त करने के बजाए नीतिश कुमार के खिलाफ अभिलेखागार से एक आरोप भी खोद निकाला और लेकर घूमते फिर रहे है। बात यही समाप्त नहीं होती बौखलाहट में नित नए आरोप लगाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को घेरने की जुर्रत की जा रही है लेकिन राहुल बाबा और गुलाम नवी आजाद इस बात को गंवारा करने को तैयार नही है कि यदि राज्यसभा चुनाव की बेला में विधायक पाला बदल रहे है तो पूरी सरकार के दल बदल करने का शिल्प तो कांग्रेस की ही देन है जिसने आया राम गया राम को शह देकर सरकारे पलटी और एकाधिकार को मजबूत किया। फिर आमजन चुनाव की आहट में विधायक आ जा रहे है तो स्यापा की क्या बात है। विधायकों के इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होने के पीछे पार्षदों द्वारा अपनी विफलता, संगठन की अप्रासंगिकता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मां बेटा की पार्टी ने तो राज्यों के संगठन पर गौर करना छोड़ दिया। वरिष्ठ नेता बेकद्री से संगइन से विरक्त हो गए। जो डूबते जहाज से निकलकर राजनैतिक वैतरणी पार करना चाहते है वे ठौर देख रहे है। इसमें प्रधानमंत्री को लपेटना अमित शाह को घसीटने के बजाए कांग्रेस का श्रेष्ठ वर्ग आत्म परीक्षण करने का साहस क्यों नहीं दिखाता। चूक सरासर कांग्रेस की है जो सूबायी संगठनों को कबीलाई जंग में जाता देखकर भी तटस्थ दर्शक बनकर रह गया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में यदि राजनैतिक दलों से पलायन हो रहा है तो दलीय विफलता के अलावा क्या कहा जा सकता है, लेकिन मजे की बात है कि किं कत्र्तव्यं विमूढ़ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस पलायन को भाजपा का राजनैतिक भ्रष्टाचार और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख वहन मायावती इसे सत्ता की भूख बताकर हकीकत से मंुह मोड़ रही है।

आज हकीकत को अवसरवादिता के पैमाने पर देखना राजनैतिक दलों की फितरत बन गयी है। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पं. बंगाल में हो रही जातीय हिंसा और केरल की वामपंथी सरकार की शह पर राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के कत्ल के मामलों पर गौर करते और निंदा करते लेकिन उनका नजरिया वास्तविकता से भिन्न है और वे मोदी सरकार पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे है। आखिर वे जनता की आंखों में धूल झौंककर दलीय समर्थन खोने पर क्यों आमादा बने हुए है। ऐसे में एक विद्वान का यह कथन मौंजू है कि कल्पना शक्ति नाॅलेज से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि नालेज की तो सीमा होती है लेकिन कल्पना असीम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष इसके धनी है और राजनीति की घिसी पिटी फितरते छोड़कर कल्पनाशीलता से जनता का मन मोह रहे है। कल्पना में विश्व समाया हुआ है। इसी के बल पर नरेन्द्र मोदी ने हताश मुल्क में सकारात्मक पर्यावरण रचा, उसे अमली जामा पहनाने का प्रयास किया। जनता का भरोसा जीता और भगवा परचम लहराया है। विपक्ष अरण्यरोदन करता फिर रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में जनता दल यू के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी नीतिश कुमार से अप्रसन्न चल रहे है। वास्तव में उनकी नाराजगी के चर्चा उनकी प्रासंगिकता को नया रूप देने में सहायक हो सकती है और पुनर्वास का सिलसिला आगे बढ़ सकता है। राजनीति में तनिक भी रूचि लेने वालें इस बात पर अकस्मात दांतों तले अंगुली तो दबा लेते है कि एक जहाज का पंछी असुरक्षा के कारण दूसरे जहाज पर जा रहा है इसमें कोई अनुचित अवैध गोरखधंधा हो सकता है लेकिन जब वह याद करता है कि यह गोरखधंधा न तो नया और न इसकी अवैधता से आज विपक्ष अछूता है। उन्होंने सत्ता में रहकर कभी गौर नहीं किया है। अलबत्ता पूरी सरकार के पाला बदल लेने पर अपनी पीठ थपथपायी है। घोड़ा की मंडी का रिवाज तो उन्होंने ही आरंभ किया जो आज इस पर टीका टिप्पणी करते हुए यथार्थ से मंुह चुरा रहे है।

 जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों ने पलायन किया और गुजरात में विधायकों ने कांग्रेस से किनारा किया है उससे अगस्त में होने जा रहे राज्यसभा के चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित हो सकते है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की राज्यसभा पहंुचने का रास्ता कंटकाकीर्ण बन सकता है। जहां तक राज्यसभा में एनडीए के वर्चस्व बढ़ने का सवाल है उसे 123 सदस्यों की गिनती पूरी करना है जिसके समीप पहंुचकर उसने अल्पमत की लक्ष्मण रेखा को पार करने का कौशल दिखा दिया है। बुजुर्गो का कहना है कि संकट अकेला नहीं आता उसके साथ कई परेशानियां भी आती है। कमोवेश यही हालात देश में सबसे बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और उन क्षेत्रीय दलों की है जो वंश परंपरा और अपनी पारिवारिक विरासत के मत से नहीं उबर पाए है। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात जहां विधानसभा चुनाव सन्निकट है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गृह प्रदेश है, इसलिए गुजरात के चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़े है। कांग्रेस में कद्दावर नेता रहे और वरिष्ठता का दर्जा हासिल करने वाले शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस से इस्तीफा और प्रदेश कांग्रेस संगठन में बिखराव कांग्रेस की विफलता है वही भाजपा के लिए वरदान साबित भी है। हर विफलता के पीछे सबब खोजना जरूरी समझा जाता है लेकिन सियासी दलों को यह मंजूर नहीं कि साहसपूर्वक कहे कि जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। इसलिए वह ठीकरा तो फोड़ता है और जनता क्षणिक भ्रमित हो जाती है।