14 सितम्बर/हिंदी दिवस -भारतीय चेतना का स्त्रोत हिंदी भाषा

दिंनाक: 14 Sep 2017 21:32:59

1936 में कोलकाता वि.वि. में अपने दीक्षांत भाषण में कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बड़े दुखी मन से कहा था , ‘संसार में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ शिक्षा विदेशी भाषा के माध्यम से दी जाती है |’ उन्हें क्या पता था कि स्वतंत्रता के पश्चात भी यही क्रम चलता रहेगा | महत्मा गाँधी ने 1909 में हिन्द स्वराज्य में अंग्रेजी भाषा के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा था- ‘हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सीखाना उन्हें गुलाम बनाना है |’  2 नवम्बर, 1947  को हरिजन पत्रिका में उन्होंने लिखा था – ‘यह समस्या 1938  में हल हो जानी चाहिए थी अथवा 1947  में तो अवश्य हल हो जानी चाहिए थी |’ हिंदी सदैव भारतीय चेतना का स्त्रोत रही है | मध्यकाल में सूर, तुलसी, कबीर, रविदास, जायसी, रसखान ने भारतीय समाज में स्वाभिमान आत्मगौरव  की भावना जगाई तथा चैतन्य फैलाया | भारतेंदु हरिश्चंद्र ने राष्ट्र की उन्नति के लिए कहा- निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्वेदी तथा महान लेखक मैथिलीशरण गुप्त तथा रामधारी सिंह दिनकर ने समाज में चेतना जगाई, पन्त, प्रसाद, महादेवी निराला ने राष्ट्र को संघर्ष के लिए प्रेरित किया | राष्ट्रीय आन्दोलन में अंग्रेजी से टकराव राष्ट्रीय भावना का प्रतीक रहा | देश के शिक्षाविदों तथा राष्ट्रचिंतकों ने भारत में शिक्षा, संस्कृति  के उत्थान के लिए बच्चों को हिंदी या मातृभाषा में ही शिक्षा देने पर बल दिया | स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के माध्यम का क्रम बतलाते हुए इसे मातृभाषा, हिंदी, संस्कृत तथा अंग्रेजी के क्रम में रखा | भगिनी निवेदिता ने महाकवि रवीन्द्रनाथ को अपने परिवार की एक कन्या का अंग्रेजी स्कूल में प्रवेश कराते हुए विरोध में कहा, ‘क्या तुम उसे मेम बनाना चाहते हो, साथ ही कहा, ‘विदेशी शिक्षा के कारण अपनी राष्ट्रगत विशेषताएं नष्ट हो जाती हैं |’ ऐनी बेसेंट ने मातृभाषा का समर्थन करते हुए कहा, ‘अंग्रेजी भाषा ने एक ऐसे वर्ग का निर्माण किया जो भारतीयता से हटकर शासन का हिमायती बन गया |’ श्री मां ने सदैव मातृभाषा में शिक्षा देने की बात कही |

साभार :- म्हारा देश म्हारी माटी