अनुशासित स्वयंसेवक अनंत रामचंद्र गोखले जी

दिंनाक: 24 Sep 2017 21:28:04

नई दिल्ली. अनुशासन के प्रति अत्यन्त कठोर श्री अनंत रामचंद्र गोखले जी का जन्म 23 सितम्बर, 1918 (अनंत चतुर्दशी) को म.प्र. के खंडवा नगर में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था. ‘’ संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के पिता श्री सदाशिव गोलवलकर जब खंडवा में अध्यापक थे, तब वे उनके घर में ही रहते थे.

नागपुर से इंटर करते समय गोखले जी धंतोली सायं शाखा में जाने लगे. एक सितम्बर, 1938 को वहीं उन्होंने प्रतिज्ञा ली. इंटर की प्रयोगात्मक परीक्षा वाले दिन उन्हें सूचना मिली कि डॉ. हेडगेवार ने सब स्वयंसेवकों को तुरंत रेशिम बाग बुलाया है. उन दिनों शाखा पर ऐसे आकस्मिक बुलावे के कार्यक्रम भी होते थे. जब गोखले जी वहां पहुंचे, तो डॉ. जी ने कहा कि तुम्हारी परीक्षा है, इसलिये तुम वापस जाओ. युवा गोखले जी इससे बहुत प्रभावित हुये कि डॉ. जी जैसे बड़े व्यक्ति को भी उनकी परीक्षा का ध्यान था.

डॉ. जी के निधन के बाद दिसम्बर, 1940 में नागपुर में अम्बाझरी तालाब के पास तरुण-शिविर लगा था. उसमें श्री गुरुजी ने युवाओं से प्रचारक बनने का आह्वान किया. गोखले जी कानून की प्रथम वर्ष की परीक्षा दे चुके थे, पर पढ़ाई छोड़कर वे प्रचारक बन गये. सर्वप्रथम उन्हें उ.प्र. के कानपुर नगर में भेजा गया. वहां के बाद उन्होंने उरई, उन्नाव, कन्नौज, फर्रुखाबाद, बांदा आदि में भी शाखाएं शुरू कीं. प्रवास और भोजन आदि के व्यय का कुछ भार कानपुर के संघचालक जी वहन करते थे, शेष गोखले जी अपने घर से मंगाते थे.

सन् 1948-49 में संघ पर प्रतिबंध लगा हुआ था, पर तब तक ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ का गठन हो चुका था. गोखले जी ने 150 स्वयंसेवकों को परिषद की ओर से ‘साक्षरता प्रसार’ के लिये गांवों में भेजा. ये युवक बालकों को खेल खिलाते थे तथा बुजुर्गो में भजन मंडली चलाते थे. प्रतिबंध हटने पर ये खेलकूद और भजन मंडली ही शाखा में बदल गयीं. इस प्रकार उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता से प्रतिबंध काल में भी सैकड़ों शाखाओं की वृद्धि कर दी.

गोखले जी 1942 से 51 तक कानुपर, 1954 तक लखनऊ, 1955 से 58 तक कटक (उड़ीसा) और फिर 1973 तक दिल्ली में रहे. आपातकाल के दौरान उनका केन्द्र नागपुर रहा. तब उन पर मध्यभारत, महाकौशल और विदर्भ का काम था. आपातकाल के बाद उन पर कुछ समय मध्य भारत प्रांत का काम रहा. इस समय उनका केन्द्र इंदौर था. 1978 में वे फिर उ.प्र. में आ गये और पूर्वी उ.प्र. में जयगोपाल जी के साथ सहप्रांत प्रचारक बनाये गये.

गोखले जी को पढ़ने और पढ़ाने का शौक था. जब प्रवास में कष्ट होने लगा, तो उन्हें लखनऊ में ‘लोकहित प्रकाशन’ का काम दिया गया. उन्होंने इस दौरान 150 नयी पुस्तकें प्रकाशित कीं. तथ्यों की प्रामाणिकता और प्रूफ आदि पर वे बहुत ध्यान देते थे. वर्ष 2002 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने सब दायित्वों से मुक्ति ले ली और लखनऊ के ‘भारती भवन’ कार्यालय पर ही रहने लगे. घंटे भर की शाखा के प्रति उनकी श्रद्धा अंत तक बनी रही. चाय, भोजन आदि के लिये समय से पहुंचना उनके स्वभाव में था. अपने कमरे की सफाई और कपड़े धोने से लेकर पौधों की देखभाल तक वे बड़ी रुचि से करते थे.

1991 में पुश्तैनी सम्पत्ति के बंटवारे से उन्हें जो भूमि मिली, वह उन्होंने संघ को दे दी. कुछ साल बाद प्रशासन ने पुल बनाने के लिये 19 लाख रु. में उसका 40 प्रतिशत भाग ले लिया. उस धन से वहां संघ कार्यालय भी बन गया, जिसका नाम ‘शिवनेरी’ रखा गया है. इसके बाद वहां एक इंटर कॉलेज की स्थापना की गयी, जिसमें दो पालियों में 2,500 छात्र-छात्रायें पढ़ते हैं. नारियल की तरह ऊपर से कठोर, पर भीतर से मृदुल, सैकड़ों प्रचारक और हजारों कार्यकर्ताओं के निर्माता गोखले जी का 25 मई, 2014 को लखनऊ में ही निधन हुआ.