डोकलाम के बाद नरेंद्र मोदी की दूसरी जीत चीन के नहले पर मोदी का दहला - भरतचन्द्र नायक

दिंनाक: 06 Sep 2017 20:05:20

एक संत पुरूष के सात्विक पक्ष हमेशा तिरस्कार का दंश भोगता है। वे जब गांव में निकलते तो उनकी सादगी का मजाक उड़ाया जाता। वे ऐसे लोगों को कुछ प्रसाद, कुछ सिक्के देकर पिंड छुड़ा लेते थे। इस दिन दिनचर्या को सभी देखते और ऐसा करने को प्रोत्साहित होते। कुछ ऐसा ही व्यवहार एक दूसरे दुनियादारी में पारंगत व्यक्ति के साथ जब हुआ तो उसने सोंटा चलायां सभी अपने अपने घरों में दुबक गये। चीन को नहीं मालूम था कि सदी बदल गई है। भारत को ऐसा नेतृत्व मिला है जिसका मूल मंत्र भारत को वैभव के चरम पर पहुंचाना है।  बीते जून में चीन ने डोकलाम के पठार, भूटान की भौगोलिक सीमा में सड़क निर्माण कर भारत को शेष भाग पूर्वोत्तर से काटने का षडयंत्र रचा। भूटान सीमा में स्थित इस त्रिकोण पर निर्माणाधीन सड़क भूटान और चीन के बीच विवाद का मुद्दा बनी। लेकिन भारत की प्रतिबद्धता में भूटान की सुरक्षा शामिल है इसलिये भारत ने अपने सैनिकों को भेजकर चीन पर लगाम कसने की कोशिश की। विस्तारवाद की राजनैतिक महत्वाकांक्षा लिये चीन ने चीनी मीडिया में युद्धोन्माद की भाषा इस्तेमाल कर भारत को चुनौती दे दी। चीन ने जब 1962 में भारत की दुर्भाग्यपूर्ण पराजय की चुटीली टिप्पणी की भारत के तत्कालीन रक्षामंत्री अरूण जैटली ने यह कहकर कि यह 2017 का भारत है। 1962 के याद दिलाने की गलती न करें। भारत का यह जवाब चीन के लिये अप्रत्याशित था और उसने 73 दिन तक भारत की दृढ़ता और धैर्य की परीक्षा ली, लेकिन प्रधामनंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही भारतीय फौज को कह चुके थे कि बंदूक की नाल नीचे करके जाना। यदि नाजुक हालात बनते हैं तो फौज को नार्थ ब्लाक (रक्षा मंत्रालय) से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। भारत के जेम्सबांड, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने चीन का दौरा किया और चीन की दशा और दिशा का सूक्ष्म अवलोकन किया जिसका निष्कर्ष यही था कि चीन की गीदड़ भभकी सारहीन, खोखली है। अन्त भल सो सब भला, भारत और चीन की फौजे अपने पूर्व स्थान पर लौटने को सहमत हो गईं। श्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक दक्षता ने चीन के दर्प को चूर-चूर कर दिया और चीन की जग हंसाई हुई। चीन के साथ उसके विस्तार वाद से पीड़ित सत्रह देशों का विवाद है। वे सभी भारत के समर्थन में आ गये। अमेरिका और जापान ने भारत को खुला समर्थन देकर चीन के ताजिए ठंडा कर दिये।

दरअसल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के दौर से ही चीन की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति सामने आ गई थी, लेकिन भारत अपनी सदाशयता से ठगा गया और भारत-चीन के बीच एक बफर स्टेट के रूप में तिब्बत पर जब चीन ने दबाव बनाया भारत ने तिब्बत में तैनात भारतीय सेना का दस्ता भी वापस बुलाकर तिब्बत को भगवान भरोसे छोड़े दिया। तिब्बत में भारी नरसंहार हुआ और पलायन शुरू हुआ तिब्बत के धर्मगुरू दलाईलामा ने भारत में राजनैतिक संरक्षण पायी और इसी मुद्दे पर चीन ने गांठ बांध ली 1 चीन ने भारत के भू-भाग पर अपना दावा ठोक दिया। क्योंकि पं. नेहरू विश्व शांति के मसीहा के रूप में चीनी भारत भाई-भाई। पंचशील चिन्दाबाद पर आत्ममुग्ध बन रहे। इसे लम्हे ने खता की और सदियों ने सजा पाई कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

विश्व में भारत के महाशक्ति के रूप में निखार को चीन पचा नहीं पा रहा है। भारतीय संसद में 1962 में चीन द्वारा हथियायी गई भूमि वापस लेने का संकल्प पारित हुआ था, लेकिन इस बीच उस पर धूल चढ़ गई। सच्चाई यही है कि आजादी के बाद भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता के क्षरण को रोक नही पाया। चीन और पाकिस्तान इतिहास में भारत भूमि पर अतिक्रमणकर्ता के रूप में दर्ज है। लेकिन पूर्ववर्ती सरकारें क्षेत्रीय अखंडता के प्रति कितनी बेपरवाही रही इसकी गवाही संसद में दिया गया पं. नेहरू का प्रधानमंत्री के रूप में दिया गया जवाब है। उन्होंने संसद में यह कहने से गुरेज नहीं किया कि चीन द्वारा नए अतिक्रमित भू-भाग बर्फीला पठार है जहाॅ घास भी नहीं उगती। लेकिन नए भारत ने करवट ली है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने क्षेत्रीय अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर विश्व को चरत्कृत कर दिया है। चमत्कार को ही सब नमस्कार करते हैं। आज दुनिया के अधिकांश देश भारत के समर्थक और मुरीद बन चुके हैं। सीमन में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की दृढ़ता और दूरदर्शिता ने चीन से भी लोहा मनवा लिया हैं जिस प्रस्ताव को चीन दोबार संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर अपने विरोध से निरस्त कर चुका है, को ब्रिक्स ने न केवल कड़ी चेतावनी दी है। अपितु संपन्न बैठक में मंजूर करना पड़ा। इससे नरेंद्र मोदी की वैश्विक स्वीकार्यता को सार्वदैशिक मान्यता मिली है। पाकिस्तान की अंातकवाद के पोसने वाले मुल्क के रूप में पहचान बनी है वहीं चीन की आतंकवाद को लेकर दोहरे मापदंड अपनाने की पोल खुल गई है। चीन को यह भारत ने दूसरी मात दी है।

श्री नरेंद्र मोदी की क्षेत्रीय अखंडता के साथ जीरो टालरेंस की जो प्रतिबद्धता सामने आई है उसने भारत की साख बढ़ाई है और दुनिया को समझ में आ गया है कि भारत तेजी से महाशक्ति के रूप में अपनी दृढ़ता के साथ पग बढ़ा रहा है। पूर्वोत्तर में हमेशा की तरह म्यांमार से दहशतगर्द खून खराबी और लूटपाट करते चले आ रहे थे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने म्यामार की सीमा में जब दहशतगर्दी की खबर ली यह भारत का पहला सर्जिकल स्टाइक था, जिसने भारत की साफ्ट स्टेट की छवि को धो डाला, चीन की लाल सेना इस दौरान इतनी आश्वस्त महसूस करती थी कि भारत पर हुआ हर अतिक्रमण, विरोध प्रदर्शन, एक शिकायत के रूप में दर्ज होकर रह जायेगा। लेकिन नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत की अस्मिता पर वार बर्दाश्त नहीं होगा। ईट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा। चीनी सैनिकों के साथ झड़पे अब चीन की सेना को भयभीत करने लगी है। सब चलता है का युग बीत चुका है।

विश्व के सर्वशक्तिमान देश अमेरिका में ही यह चलन है कि जब वह कही हमला करता है और किसी मुल्क को सबक देता है अमेरिका खामोश नहीं रहता अमेरिका उस सामरिक कार्यवाही का दूसरे दिन प्रचार कर देता हे जिससे दूसरे देश सावधान हो जायें। कमोवेश महाशक्ति का सबूत देते हुए नरेंद्र मोदी ने भी सर्जिकल स्ट्राईक की कार्यवाही पर कभी न तो शर्मिंदगी जतायी और न उसे गुप्त रखा। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। क्योंकि ऐसा करने से प्रतिशोध की कार्यवाही की गुंजाईश रहती।

चीन और पड़ौसी देश पाकिस्तान की विदेश नीति कभी समन्वयकारी नहीं रही। चीन की विदेश नीति विस्तारवाद को प्रोत्साहन देती है तो पाकिस्तान ने पड़ौसी देश भारत में दहशतगर्दी को अंजाम देना अपनी विदेश नीति बना ली है। जबकि भारत सभी से मेल जोल, समरसता, गुटनिरपेक्षता और पंचशील का पेरोकार रहा है। इसलिये उसे दोनों ओर से आघात पहुंचाया गया। भारत विरोध प्रदर्शन, डोजिपर भेजने तक सीमित रहा। लेकिन 2014 में जब से श्री नरेंद्र मोदी के हाथ में जनता ने सत्ता सौंपी है मोदी ने देश की आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने तक एक महाशक्ति के रूप में व्यवहार करना सीख दिया है। एक अरब तैतीस करोड़ आबादी के देश का सुशुप्त आत्म विश्वास और गौरव को झकझोर लिया हैं पांच सितम्बर को चीन में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन ने दुनिया को चीन और भारत की वास्तविकता से वाकिफ कर दिया है। चीन जानता था कि भारत की अनुपस्थिति में ब्रिक्स सम्मेलन बेनूर हो जायेगा। उसने डोकलाम से अपने पैर पीछे खीच लिये और नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में भाग लेना मंजूर कर लिया। चीन नहीं चाहता था कि ब्रिक्स सम्मेलन में उसके हम दर्द पाकिस्तान की आतंकवादी तसवीर बेपरदा हो। उसने जब कहा कि आतंकवाद को अजेंडा में शािमल करने से सम्मेलन पटरी से उतर जायेगा। भारत ने जवाब दिया कि हमारा अजेंडा तय करने वाला चीन कौन है? चीन सतर्क हो गया। मोदी ने पाक स्थित चार आतंकवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने की मांग की। मजे की बात है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिग की अध्यक्षता में रूस, ब्राजिल, द. आफ्रीका ने तत्काल सहमति दे दी। चीन अपने कृपापात्र पाकिस्तान को बेनकाब होने से नहीं बचा पाया। यह नरेंद्र मोदी की राजनयिक चतुराई से ही संभव हुआ। एनडीए सरकार ने सुरक्षा के मामले में पारदर्शिता दिखा कर जनता को विश्वास जता दिया है कि देश की सुरक्षा का भार सबल कंधों पर है। चीन को भी सबक मिल गया है कि यह इक्कीसवीं सदी का भारत है। कूटनीति के महागुरू चाण्क्य ने कहा था कि इतिहास बदल सकते हैं। पड़ौसी नहीं बदल सकते। नरेंद्र मोदी ने इसे चरितार्थ किया। पड़ौसी भी डोकलाम की पुनरावृत्ति न होने देने के लिए सहमत हो गया है। देखना है वायदा ड्रेगन है?