17 जनवरी / बलिदान दिवस – रामसिंह कूका और उनके गोभक्त शिष्य

दिंनाक: 17 Jan 2018 14:11:01

नई दिल्ली. 17 जनवरी, 1872 की प्रातः ग्राम जमालपुर (मालेरकोटला, पंजाब) के मैदान में भारी भीड़ एकत्र थी. एक-एक कर 50 गोभक्त सिख वीर वहां लाये गये. उनके हाथ पीछे बंधे थे. इन्हें मृत्युदण्ड दिया जाना था. ये सब सद्गुरु रामसिंह कूका जी के शिष्य थे.

अंग्रेज जिलाधीश कोवन ने इनके मुंह पर काला कपड़ा बांधकर पीठ पर गोली मारने का आदेश दिया, पर इन वीरों ने साफ कह दिया कि वे न तो कपड़ा बंधवाएंगे और न ही पीठ पर गोली खायेंगे. तब मैदान में एक बड़ी तोप लायी गयी. अनेक समूहों में इन वीरों को तोप के सामने खड़ा कर गोला दाग दिया जाता. गोले के दगते ही गरम मानव खून के छींटे और मांस के लोथड़े हवा में उड़ते. जनता में अंग्रेज शासन की दहशत बैठ रही थी. कोवन का उद्देश्य पूरा हो रहा था. उसकी पत्नी भी इस दृश्य का आनन्द उठा रही थी.

इस प्रकार 49 वीरों ने मृत्यु का वरण किया, पर 50वें को देखकर जनता चीख पड़ी. वह तो केवल 12 वर्ष का एक छोटा बालक बिशन सिंह था. अभी तो उसके चेहरे पर मूंछें भी नहीं आयी थीं. उसे देखकर कोवन की पत्नी का दिल भी पसीज गया. उसने अपने पति से उसे माफ कर देने को कहा. कोवन ने बिशन सिंह के सामने रामसिंह को गाली देते हुए कहा कि यदि तुम उस धूर्त का साथ छोड़ दो, तो तुम्हें माफ किया जा सकता है.

यह सुनकर बिशनसिंह क्रोध से जल उठा. उसने उछलकर कोवन की दाढ़ी को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे बुरी तरह खींचने लगा. कोवन ने बहुत प्रयत्न किया, पर वह उस तेजस्वी बालक की पकड़ से अपनी दाढ़ी नहीं छुड़ा सका. इसके बाद बालक ने उसे धरती पर गिरा दिया और उसका गला दबाने लगा. यह देखकर सैनिक दौड़े और उन्होंने तलवार से उसके दोनों हाथ काट दिये. इसके बाद उसे वहीं गोली मार दी गयी. इस प्रकार 50 कूका वीर उस दिन बलिपथ पर चल दिये.

गुरु रामसिंह कूका का जन्म 1816 ई0 की वसन्त पंचमी को लुधियाना के भैणी ग्राम में जस्सासिंह बढ़ई के घर में हुआ था. वे शुरू से ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे. कुछ वर्ष वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में रहे. फिर अपने गांव में खेती करने लगे. वे सबसे अंग्रेजों का विरोध करने तथा समाज की कुरीतियों को मिटाने को कहते थे. उन्होंने सामूहिक, अन्तरजातीय और विधवा विवाह की प्रथा चलाई. उनके शिष्य ही ‘कूका’ कहलाते थे.

कूका आन्दोलन का प्रारम्भ 1857 में पंजाब के विख्यात बैसाखी पर्व (13 अप्रैल) पर भैणी साहब में हुआ. गुरु रामसिंह जी गोसंरक्षण तथा स्वदेशी के उपयोग पर बहुत बल देते थे. उन्होंने ही सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन का बहिष्कार कर अपनी स्वतन्त्र डाक और प्रशासन व्यवस्था चलायी थी.

मकर संक्रान्ति मेले में मलेरकोटला से भैणी आ रहे गुरुमुख सिंह नामक एक कूका के सामने मुसलमानों ने जानबूझ कर गोहत्या की. यह जानकर कूका वीर बदला लेने को चल पड़े. उन्होंने उन गोहत्यारों पर हमला बोल दिया, पर उनकी शक्ति बहुत कम थी. दूसरी ओर से अंग्रेज पुलिस एवं फौज भी आ गयी. अनेक कूका मारे गये और 68 पकड़े गये. इनमें से 50 को 17 जनवरी को तथा शेष को अगले दिन मृत्युदण्ड दिया गया. अंग्रेज जानते थे कि इन सबके पीछे गुरु रामसिंह कूका की ही प्रेरणा है. अतः उन्हें भी गिरफ्तार कर बर्मा की जेल में भेज दिया. 14 साल तक वहाँ काल कोठरी में कठोर अत्याचार सहकर 1885 में सदगुरु रामसिंह कूका ने अपना शरीर त्याग दिया.