चीन कर रहा है राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के सेवा प्रकल्पो पर शोध

दिंनाक: 19 Jan 2018 18:35:24


भोपाल(विसंके).  वैश्विक पटल पर चीन एक उभरती हुई बड़ी ताकत है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि चीन अपनी इस क्षमता को पहचान कर और तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश में लगा हुआ है। बात अगर अर्थव्यवस्था की हो, सैन्य ताकत की हो अथवा अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में दखल की हो, चीन इन सब मामलों में कहीं से भी कम नहीं है। इतना ही नहीं चीन ने भारतीय दर्शन, शास्त्र उपनिषद में शोध के बाद भारत में चल रहे सेवा कार्यो के प्रकल्प और उसके पीछे जो प्रेरक शक्ति लगी है, उसको भी जानने और समझने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसके लिए उसने विश्व के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति को चुना है। चीन के विश्वविद्यालयों में आजकल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की अनुशासन पद्धति, विभिन्न सेवा प्रकल्पों के साथ ही समय-समय पर वरिष्ठ प्रचारकों द्वारा दिए जाने वाले बौद्धिकों पर शोध व उनका हिन्दी से चीनी भाषा में अनुवाद कार्य प्रारंभ किया है।


यह बात जरूर चौंकाने वाली है कि एक ओर जहां चीन सीमा पर आए दिनों युद्ध जैसे हालात पैदा कर रहा है तो दूसरी ओर चीन के विद्यार्थी संघ की कार्यपद्धति और समाज जीवन में किए जा रहे कार्यो को समझने के लिए आतुर है। शनिवार को एक कार्यक्रम में भाग लेने आगरा आए शंघाई अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन विवि, चीन के विजिटिंग प्रो. नवीन लोहनी ने यह महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रवादी विचारधारा, हिन्दुत्व और विभिन्न प्रांतों में संघ के स्वयंसेवक द्वारा चलाए जा रहे सेवा प्रकल्प और समय समय पर आपदाओं में जिस प्रकार संघ के स्वयंसेवक सहायता शिविरों का संचालन करते हैं, इस पर चीन के बीजिंग विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया जा रहा है। प्रो. नवीन लोहनी ने बताया कि इतना ही नहीं संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी और वर्तमान सरसंघचालक मोहनराव भागवत द्वारा दिए जाने वाले संबोधनों का हिन्दी से चीनी भाषा में अनुवाद का काम भी किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह सब शोध कार्य बीजिंग विवि के प्रो. च्यांग खोई के निर्देशन में चल रहा है। उन्होंने कहा कि संघ की कार्यपद्धति में हिन्दी के शुद्ध उच्चारण से हिन्दी का प्रचार प्रसार बखूबी हो रहा है। संघ के प्रति आकर्षण का एक कारण यह भी है कि भारत की ज्ञान परंपरा वैदिक ज्ञान पर आधारित है, जबकि चीन की ज्ञान परंपरा लाओत्से और कन्फ्यूशियस की परंपरा पर। हम वाचिक परंपरा से आगे बढ़े हैं, जबकि चीन लिखित परंपरा को अपनाता आया है।

प्रो. नवीन लोहनी ने कहा कि यद्यपि हमारे चीन के साथ अनेक मुद्दों पर विरोधाभास है लेकिन, हिन्दी आज की राजनीति में चल रहे संक्रमण काल में भारत-चीन संबंधों को नई ऊचाईयां दे सकती है। भारत-चीन सम्बन्धों में सुधार के लिए आवश्यक है कि दोनों देश अतीत को भूलकर एक नए अध्याय का आरम्भ व्यापार, व्यवहार एवं विश्वास के साथ करें।

साभार:-स्वदेश