19 जनवरी / बलिदान दिवस - महाराणा प्रताप

दिंनाक: 19 Jan 2018 17:36:24


भोपाल(विसंके). महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई सन् 1540 कुंभलगढ में जयवन्ती बाई  के गर्भ से हुआ. राणा उदयसिंह की 18 रानियां और 22 पु़त्र थे. प्रताप की माँ सबसे बडी व प्रताप अपने सब भाईयों में बडे थे. 15वीं शताब्दी में गुहादित्य (गुहिल) द्वारा स्थापित सिसोदिया शाखा में 60वी पीढी में प्रताप का जन्म हुआ. वह सूर्यवंशी क्षत्रिय भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज थे. माँ द्वारा रामायण, महाभारत की कथाओं द्वारा कर्तव्य भाव का जागरण किया जाने लगा. 7 वर्ष की आयु होने पर पिता द्वारा माँ-बेटे को चित्तोड बुला झाली महल में निवास की व्यवस्था की. यहाँ रहकर सभी प्रकार की शस्त्रशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की. प्रताप नाम के अनुसार ही प्रतापी ही थें. 17 वर्ष की आयु में बागड,  छप्पन व गोडवाड क्षेत्रों को जीत लिया था. 23 अक्टूबर 1567 में अकबर ने चित्तोड पर आक्रमण किया. राणा उदयसिंह ’जयमल राठौड’ व पत्ता चुडावत को युद्ध का नेतृत्व दे अरावली की पहाडियों में बने गोगुन्दा के महलों में जाकर रहने लगे. 4 माह के लंबे संघर्ष के बाद जयमल व पत्ता शहीद हो गए. 7000 क्षत्राणियों ने जोहर कर लिया. इस सदमे के कारण 28 फरवरी 1572 को राणा उदयसिंह का होली के दिन निधन हो गया. मरने के पहले वह अपनी 7वीं रानी धीरबाई भटियाणी के पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किए गए थे. जगमाल राजा बन गद्दी पर बैठ गए. राजा के संस्कार के बाद सभी सामंतो को जब इसका पता लगा तो लगभग सभी ने इस अन्याय पूर्ण व्यवस्था का विरोध किया और सालूम्बर के नरेश चूडावत कृष्णसिंह ने निर्भीकता से जगमाल को गद्दी से उतार प्रताप को राज सिंहासन पर बैठाया. ’महाराणा प्रताप की जय’ के गगनभेदी घोष लगने लगे. उनका राज्यभिषेक 3 मार्च 1572 को गोगुन्दा में हुआ. सिंहासनासीन होते ही महराणा प्रताप ने कठोर प्रतिज्ञा करते हुए कहा ’’जब तक शत्रुओं से मैं अपनी पावन मातृभुमि को मुक्त नहीं करा लेता तब तक मैं न महलों में रहूँगा और न सोने-चाँदी के बर्तनों में भोजन करूँगा. घास ही मेरे बिछौने और पत्तल दोने ही मेरे पात्र होंगे. मैं अपनी दाढी भी नहीं कटवाऊँगा. महाराणा के दृढ निश्चय को सुन अब्दुल रहीम खानखाना ने कहा ’’धर्म रहेगा, पृथ्वी भी रहेगी, पर मुगल साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जायेगा -हे  राणा विशम्भर भगवान पर भरोसा करके अपने भरोसे को अटल रखना’’ इस समय तक अनेक स्वाभिमान शून्य राजपूत मुगल बादशाह अकबर की शरण में जा चुके थे, उनकों बहनें और बेटियाँ देकर सम्बन्ध बना लिये थे. महाराणा प्रताप ही उसे खटक रहे थे जो किसी भी कीमत पर अधीनता स्वीकार करने को तैयार न थे. अकबर ने सितम्बर 1572 को जलाल खाँ कोरची के द्वारा संधि का प्रस्ताव भेजा जो असफल हो नवम्बर में वापस लौट गया. इतने पर भी अकबर निराश न हो मानसिंह को पुनः संधि का प्रस्ताव देकर भेजा. जून 1573 में वार्ता असफल रही. वार्ता की आशा न छोडते हुए अक्टूबर 1573 में मानसिंह के पिता भगवानदास को भेजा उससे भी बात न बनती देख अपने दरबार के नवरत्नों में से राजा टोडरमल को दिसम्बर 1573 में भेजा जो निराश होकर लौट गया. दोनों और से युद्ध की अनिवार्यता सामने आ खडी हुई. मुस्लिम सामन्तों के विरोध के बाद भी अकबर ने राजा मानसिंह को युद्ध का सेनापति बना 2 लाख की बडी सेना के साथ युद्ध करने भेज दिया. महाराणा के पास 22 हजार सेना ही थी. जिसमें अधिकांश पहाडी क्षेत्र के वनवासी थे. 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में जैसे ही अकबर की सेना ने प्रवेश किया कि पुर्व योजनानुसार घाटी के दोनों तरफ राणा के सैनिकों ने बाण और पत्थरों से जोरदार आक्रमण कर दिया. मुगल सेना की अपार क्षति हुई. अब हल्दी घाटी के मैदान में दोनो सेनाएँ आमने-सामने थीं. राणा प्रताप व सैनिक वीरता से युद्ध कर रहे थे. मुगल सैनिकों की लाशो के ढेर हो गए तभी राणा ने राष्ट्रद्रोही मानसिंह को हाथी पर बैठा देख भाले का प्रहार किया. भाला हाथी को लगने के कारण वह बच गया. सामने सलीम को देख इशारा पा चेतक ने हाथी के मस्तक पर पैर रख दिए. इस बार वार चुका और महावत मारा गया. राणा का हरावल दस्ता सेना के एकदम आगे युद्ध कर रहा था. तो चन्द्रावल दस्ता बिल्कुल पीछे. युद्ध में हकीम खाँ पठान और ग्वालियर के राजा रामसिंह व पुत्र प्रतापसिंह व शालिवाहन ने भी युद्ध में जौहर दिखा मुगल सेना को तितर-बितर कर दिया. चुडावत कृष्णदास, सरदार गढ के भीमसिंह, देवगढ, के रावत सांगा आदि वीरों ने पुरी निष्ठा और वीरता से युद्ध किया. राणा को मुगल सेना के भीतर घुसा जान शत्रुओं ने चारों तरफ से घेर लिया. उनकी जान को खतरा जान झाला सरदार मानसिंह ने राणा के मुकुट और राजचिन्ह धारण कर महाराणा को कुशलतापुर्वक युद्ध से बाहर निकाल दिया. मानसिंह के हाथी की तलवार से घायल चेतक जब आगे बढ रहा था तो दो मुगल सैनिकों को राणा का पीछा करते देख शक्तिसिंह जो अकबर से जा मिला था उसका भ्रात भाव जाग उठा, उसने दोनों मुगल सैनिकों को मार कर राणा के पैरों मे पडकर किए की क्षमा माँगी बनास नदी को पार कर बलिया के पास ’चेतक’ ने दम तोड दिया. झाला मानसिंह भी वीरतापूर्वक लडते हुए शहीद हुए. अकबर को आशानुरूप युद्ध में विजय न मिल सकी. दबे पाँव सेना वापस चली गयी. राणा को सेना के लिए धन की आवश्यकता  थी ऐेसे ही समय में भामाशाह ने 25 लाख रूपये व 20 हजार स्वर्ण अशर्फियां सहायता के रूप में दान कीं जो 25 हजार सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह कर सके. सेना भेजकर गोगांडा दुर्ग पर जहाँ मानसिंह ठहरा था आक्रमण कर उदयपुर को भी जीत लिया. शेरपुर के किले में मिर्जा शेख की पत्नी और बच्चों को अमरसिह ने बंदी बना लिया था. उन्हें राणा प्रताप ने पुनः सम्मानजनक तरीके से वापस भिजवा दिया. 1576 से 1584 तक लगातार युद्ध कर खोए हुए किले पुनः प्राप्त कर अपनी प्रतिज्ञा पुरी कर उसके बाद रचनात्मक कार्यों द्वारा राज्य के विकास का केन्द्र चावण्ड बनाया. अपना अन्तकाल जान पुत्र अमरसिंह को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर 19 जनवरी 1597 को अपने पूर्ण प्रतिज्ञ विजयी शरीर को छोड दिया. चावण्ड से 3 कि.मी. दूर ’बडोली’ ग्राम के ’केजड’ तालाब के पास अमरसिंह द्वारा दाह संस्कार कर दिया गया. सिसोदिया कुल में राणा सांगा, राणा हम्मीर, आदि वीर राणा ही कहलाए पर पराक्रमी प्रताप महाराणा की उपाधि से विभूषित हुए.

साभार:- एकात्मता के स्वर