नल-नील की श्रेष्ठ अभियांत्रिकी कला का नमूना है श्री राम सेतु- डॉ. किशन कछवाहा

दिंनाक: 20 Jan 2018 16:51:27


भोपाल(विसंके). श्रीराम चरित मानस के इस प्रसंग से जन-जन परिचित है, जब श्रीराम ने श्रीराम सेतु के निर्माण के पूर्व अपना धनुष उठा लिया था. गोस्वामी तुलसी दास जी महाराज ने उस प्रसंग का वर्णन इन पंक्तियों में किया है:- ’’विनय न मानत जलघि जड, गये चार दिन बीत, बोले राम सकोप तब भयबिन होई न प्रीती ।। ‘नासा द्वारा लिऐ गये चित्रों में श्रीरामेश्वरम् और श्रीलंका के बीच मानव निर्मित सेतु के अस्तित्व की पुष्टि  होती हैं. सन् 1803 में प्रकाशित ’ग्लोसरी ऑफ़ मद्रास पे्रसीडेंसी (सी.डी. मैक्लियोन द्वारा संपादित) के अनुसार इसे एडम्सब्रिज भी कहा जाता है इसमें प्राप्त विवरण के अनुसार यह सेतु सन् 1480 तक भारतीय प्रायद्वीप को श्रीलंका से जोडता था. इस सेतु से लोगों का आवागमन होता था. उस समय आये भूकम्प से यह क्षतिग्रस्त हो गया. श्रीराम सेतु एक कालजयी एवं मानव सभ्यता की प्राचीन धरोहर है. इससे हिन्दुओं की अस्मिता, पहचान जुडी होने के साथ-साथ पूजनीय है. यह वैश्विक स्तर का स्मारक है. सन् 1747, 1788, 1804 के पश्चिमी नक्शों में श्रीराम सेतु के नाम से उल्लेख मिलता है. तंजौर स्थित आस्ट्रेलिया के वनस्पति शास्त्री यात्री द्वारा बनाया गया जो नक्शा उपलब्ध है उसमें ‘रामारसेतु‘ लिखा हुआ है. सन् 1747 के नक्शे में रामन को बिल (श्रीराम मंदिर लिखा हुआ है) प्राचीन अभियांत्रिकी विधा का श्रेष्ठतम उदाहरण है राम सेतु एक बेजोड शिल्प कला का नमूना है. साथ ही रामायण कालीन नैतिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों के अर्जित गुरुतर ज्ञान का संकेतक भी है. इस श्रीराम सेतु से आस्था और इतिहास के मिलन की व्यापक सम्भावनाएं हैं, भारतीयता को समर्पित लोगों ने श्रीराम सेतु से लेकर सरस्वती नदी शोध अभियान के प्रयास शुरु किये हैं जिससे पश्चिम के विद्वानों द्वारा विज्ञान और इतिहास की सीमांये अपने आप ध्वस्त हो जावेंगी. यह स्पष्ट है कि भारतीय कालगणना का विशाल सागर पश्चिम के संकीर्ण घेरे में उपयुक्त सिद्ध नहीं हो सकता. पाश्चात्य विद्वानों द्वारा जो अवधारणायें गलत होने के बावजूद थोपी हैं उनकी कडियां स्वतः टूट जायेंगी, अब समय आ गया है जब सरस्वती से लेकर श्रीराम सेतु तक का पाश्चात्य इतिहासकारों का भारत के नजरिये के बारे में जो भ्रम था, टूटता नजर आ रहा है अब आम लोगों को बतलाने की जरुरत है. कि अँग्रजों द्वारा जो एतिहासिक चि़त्र भारत के बारे में खींचे गये थें, वे विकृत हैं. अमेरिका के एक साईन्स चैनल ने दावा किया है कि श्रीराम सेतु कोरी कल्पना नहीं है. इसके प्रमाण है कि भारत और श्रीलंका के बीच स्थित बलुई रेखा पर मौजूद पत्थर करीब सात हजार साल पुराने है. इससे इस मान्यता को बल मिलता है कि भगवान श्रीराम और उनकी वानर सेना ने श्रीलंका में प्रवेश करने के लिए इस सेतु का निर्माण किया था. इस चैनल ने अपने शोध अ़़ध्ययन के आधार पर दावा किया है कि यह ढाँचा प्राकृतिक नही वरन् मानव निर्मित है. इस क्षेत्र में समुद्र बेहद उथला है. समुद्र में इन चट्टानों की गहराई 3 फुट से लेकर 30 फुट के बीच है. पाश्चात्य एवं कम्युनिस्टों ने तर्क और तथ्य से विहीन रहकर हमारी संस्कृति का तोड-मरोड कर पेश करने की घृणित कोशिशे की हैं. उन्हें भारतीय संस्कृति और उसकी गौरव गाथाओं से कोई सरोकार नहीं है इन इतिहासकारों ने इस बात का उल्लेख करने का साहस नहीं बटोरा कि इस देश को किसने लूटा,? आज परत-दर-परत खुलती जा रही है. अब विश्वभर के वैज्ञानिक एवं पुरातत्ववेता इस तथ्य से सहमत है. कि श्रीराम सेतु मानव निर्मित है. वह रामायण कालीन है. तथा भारतीय मान्यता के अनुसार वह नल-नील की श्रेष्ठ अभियांत्रिकी कला का श्रेष्ठ नमूना भी है. अभी हाल में ही अमेंरिकी पुरातत्व वेत्ताओं ने विज्ञान चैनल डिस्कवरी में दिखलाये एक प्रदर्शन में एक ऐसा शोध भी प्रस्तुत किया है. इस कार्यक्रम में अंतरिक्ष से नजर आने वाली एक तस्वीर भी दिखायी है. उल्लेखनीय है कि सोनिया गाँधी कांग्रेस के नेतृत्व वाली डॅा. मनमोहन सरकार के समय सेतु समुद्रम परियोजना के चलते श्रीराम सेतु और भगवान श्रीराम को मिथक कहते हुये सर्वोच्च न्यायलय में एक शपथ प़त्र भी पेश किया गया था. इसी दौरान इस सेतु को तोडने का उपक्रम भी चलाया गया था. जबकि इस प्रकार की धरोहरों को संरक्षित रखने की जरुरत है. इस सेतु का उल्लेख वाल्मीकि रामायण  सहित स्कन्द पुराण, अग्नि पुराण, आदि में मिलता है.


साभार:- महाकौशल संदेश