ऋतुराज के स्वागत का पर्व है बसंतोत्सव - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

दिंनाक: 22 Jan 2018 15:55:53


भोपाल(विसंके). बसंत पंचमी का पर्व जीवन में सकारात्मक पतिवर्तन लाने का परिचायक है. यह परिवर्तन आनंद, उल्लास और नई उमंग प्रसारित करता है. बसंत ऋतु अति विशिष्ट है, इसलिए इसे ऋतुराज कहा जाता है. इस ऋतु का आगमन मन में नए जीवन का संचार करता है. इसी दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य भी हुआ था. बसंत पर्व पर ज्ञान की देवी की साधना मन के विकारों को दूर करके उसमें ज्ञान का प्रकाश भरती हैं. बसंत पंचमी को आत्म मूल्यांकन करके रचनात्मक कार्य करने का प्रण लेना ही सही अर्थ में पर्व को मनाना है.


भारत वर्ष की छह ऋतुओं में सबसे मनोरम भाव रखने वाले बसंतोत्सव का आगमन हर प्राणी के जीवन में राग, रंग और उल्लास का संचार करने वाला माना जाता है. यू तो प्रत्येक ऋतु अपनी एक पहचान रखती है, किन्तु बसंत का महीना जहां एक और ठंड से कडकडाती काया को गर्म कपडों से छुटकारा दिलाता है. तो दूसरी ओर युवाओं और युवतियों के हृदय में प्रेम की पींगे बढाने वाला भी होता है. भारत वर्ष के लोक गीतों में भी बसंत की खुमारी अपना रंग जमाती देखी और सुनी जा सकती है. यही वह मौसम है जब पलाश के लाल फूलों से आच्छादित वृक्ष रसिकों के हृदय में आग लगाता प्रतीत होता है. पूरी धरती सरसों के पीले फूलों के आवरण से नववधु सी सजी संवती दिखाई पडती है. बाग बगीचों में गुलाबों की अठखेलियां ऐसा दृष्य निर्मित करती हैं, मानों वे पर्व मनाने एकत्रित हुई हों. हर प्राणी का मन ऐसे मनोरम दृश्य देखकर खुशी से नाचने और झूमने लगता है शरीर में एक नई उर्जा का आभास होने लगता है.

जग उठी प्रकृति:

प्रकृति परिवर्तन का यह पर्व सभी ओर सुस्वागत की मुद्रा लिये खडा होता है. कई महीनों से सोई इुई प्रकृति मानो अचानक ही निद्रा से जाग उठती है और फिर पूरे दो माह आनंद और उल्लास का वातावरण सभी वर्गों को प्रसन्नचित, गुलाबी मौसम में विचरने का अवसन प्रदान करता है. बसंत का मौसम जहां ऋतु परिवर्तन का सूचक है वहीं दूसरी ओर संगीत और सूर-ताल का देवी सरस्वती के उद्भव का पौराणिक महत्व भी प्रतिपादित करता है. सर्द मौसम से मुक्त समषीतोष्ण वातावरण में मां के आराधक अपनी अराध्य देवी की अर्चना में मस्त हो जाते हैं. सृष्टि रचयिता ब्रह्मापु़त्री वाग्देवी की पुजा अर्चना भी मौसम के अनुकूल पीले वस्त्र धारण कर पीले फूलों और पीले चावलों से  की जाती है. पीले-पीले बेर फल, आम की बौर और पीले कदली फल मां के श्री चरणों में अर्पित कर आराधक मनचाही विद्या के लिए प्रार्थना करते हैं.

रचनाओं को नया जीवन:

ऋतुराज बसंत के स्वागत में स्वर लहरियों से लेकर गीतों की सुमधुर पंक्तिया कवियों की रचनाओं को नया जीवन दे जाती हैं. हाली पर्व फाग के आगमन का सूचक बसंत पंचमी का पर्व फाग गीतों की रचना करने लोक गीतकारो को विवश कर जाता है. बसंत का मौसम ऋतुराज के स्वागत का अवसर होता है. शताब्दियों से भारत वर्ष के रसिक कवियों और संतो के हृदय, बसंत का भाव भीने गीतों और पदों की रचना के साथ अभिनंदन आतुर दिखाई पडते हैं. बसंत ऋतु के पूर्ण रूप से छा जाने पर धरती में नए प्राण का संचार जान पडने लगता है. ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ प्रकृति भी अपने धर्म कर्म के निर्वाह में लग जाती है. असंख्य फूलों के साथ कई कोपलें और सुगंधित हवा के साथ मानों हृदय को सुख का अनुभव होने लगता है. सुबह से लेकर शाम तक पेडों की सुकोमल हरी पत्तियां, रसीले फल  पकने की तैयारी का दृश्य दिखाते हैं, तो रात स्वच्छ चांदनी की आंचल में मचलती दिखाई पडती है. आम के पेडों पर कोयल की मीठी कूक कानों में रस घोल जाती है.

पर्व की महत्ता:

बसंत ऋतु में बसंत पंचमी सहित महा शिवरात्री तथा होली जैसे महत्वपूर्ण पर्व मनाए जाते हैं. यही कारण है कि भारतीय संगीत और साहित्य, कला में इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. पर्व की महत्ता को स्वीकार करते हुए भी संगीत में एक विशेष राग बसंत के नाम पर भी बनाया गया है, जिसे राग बसंत के नाम से जाना जाता है.

विद्या का पर्वः

यह कहा जा सकता है कि बसंत का तात्पर्य ही भाषा व सिद्धी का सुंदर संयोग, कल्पना और वास्तविकता का समन्वय है. हिन्दू धर्म संस्कृति के अनुसार कार्तिक माह की देव उठनी एकादशी अर्थात तुलसी विवाह से त्यौहार की धमाचौकडी बंद हो जाती है, किन्तु बसंत पंचमी का पर्व लोगों  को पुनः त्यौहार की खुशी से भर देता है. ऐसा अनुभव होने लगता है मानों बसंत के रूप में त्यौहार अंगडाई ले रहे हों और होली का रंग बसंत के उत्सव को पुरी उमंग प्रदान कर दिखाता है. स्कूलों में बसंत पंचमी का पर्व बडे उल्लास के साथ मनाया जाता है.

साभारः-सेवा प्रेरणा