“कश्मीर में आतंकवाद (आँखों देखा सच)” पुस्तक का विमोचन

दिंनाक: 22 Jan 2018 19:21:04


नई दिल्ली. पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर सरस त्रिपाठी जी की पुस्तक “कश्मीर में आतंकवाद (आँखों देखा सच)” (प्रभात प्रकाशन) का कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह जी ने विमोचन किया. भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी जी विशिष्ट अतिथि, पूर्व उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल नरेंद्र सिंह जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे.
पुस्तक के लेखक मेजर सरस त्रिपाठी जी ने कहा कि कश्मीर के बारे में बहुत सी बातें शेष भारत में आज भी अस्पष्ट हैं और शेष भारत के बारे में कश्मीर में भी अस्पष्टता कायम है. भारत के बारे में गलत जानकारियां कश्मीरी अवाम को बताई गईं हैं. इस कारण वो भारत को अपने से अलग देश मानने लगे हैं. वास्तव में कश्मीर घाटी पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य का 1/6 प्रतिशत का छोटा सा भाग है, जहाँ अलगाववादियों के कारण आतंकवाद की समस्या है. लेकिन देश दुनिया में मीडिया द्वारा जो दिखाया जाता है, वही हमें दिखाई देता है, वही प्रभावी भी बन जाता है. जम्मू-कश्मीर में उनके सैनिक जीवन के अपने अनुभव पर यह पुस्तक आधारित है. जिसमें जम्मू कश्मीर में आतंकवाद विरोधी उनके 12 अभियानों को भी शामिल किया है. जम्मू-कश्मीर के विषय में आई.एस.आई. की क्या भूमिका है, पाकिस्तान सरकार, अलगाववादियों की कश्मीर में भूमिका पर तथ्यपरक वर्णन है. कश्मीर का एक सन्दर्भ देते हुए कहा कि कश्मीर के लोग ताकतवर की ओर तथा जो उनके लिए आर्थिक दृष्टि से अधिक अनुकूल होता है, उनकी तरफ जाते हैं. यह ध्यान में रखते हुए हमें अपनी ताकत बढ़ानी होगी. लेकिन भारत ने वहां अपनी सैन्य ताकत ज्यादा नहीं दिखाई है. नक़्शे में कश्मीर भारत के मस्तक की तरह है और हम अपना मस्तक किसी को नहीं दे सकते.

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ले. जनरल नरेन्द्र सिंह जी ने कहा कि उस समय कश्मीर में आतंकवाद चरम सीमा पर था, जिस समय लेखक ने एक युवा सैनिक के रूप में वहां परिस्थिति को लम्बे समय तक नजदीक से देखा-समझा और अनुभव किया. उन्होंने कश्मीर में सेना के सैनिक के कठिन जीवन और कश्मीर के नागरिकों के भाव को इसमें प्रकट किया हैं, जिसमें दुर्दांत आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ों की कहानियाँ हैं. सैनिकों के सफल ऑपरेशन, उनकी वीरगति पर सैनिकों के दर्द, अलगाववादी कैसे आम नागरिकों की भावनाओं से खिलवाड़ करके अपना आर्थिक और राजनीतिक हित साध कर आम कश्मीरी नागरिक के खून की होली खेल रहे हैं, इसका सुविस्तार तथ्यपूर्ण, भावनात्मक चित्रण लेखक ने किया है.

उन्होंने कहा कि वास्तविक धरातल पर कश्मीर को जानने के लिए खासकर तथाकथित बुद्धिजीवियों को तो अवश्य यह पढ़नी चाहिए. सबसे पहले यह देश को मानना है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसकी पहाड़ियां हमारे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. सामरिक दृष्टि से यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि तीन देशों के साथ जम्मू-कश्मीर की सीमा लगती है. उन्होंने कश्मीर के वर्तमान परिदृश्य पर कहा कि अलगाववादियों तथा उससे उपजे आतंकवादियों के लिए आजादी के नाम पर कश्मीर एक फाइनेंशियल बैटल बन गया है. सेना द्वरा चिन्हित कई आतंकवादियों का पता करने पर यह देखा गया है कि वह दिल्ली, कलकत्ता जैसे शहरों में आतंकवाद से प्राप्त धन से अपना बिजनेस चलाकर आनंदपूर्वक जीवन जी रहे हैं. उनको देखकर वहां के भटके हुए युवा भी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए एक बिजनेस के रूप में आतंकवाद को अपना रहे हैं. उनके मन में आजादी के भाव से ज्यादा अर्थ का भाव ज्यादा है. इसको रोकने के लिए हमें हुर्रियत की वित्तीय मदद के स्रोत बंद करने होंगे. उन्होंने कहा कि कश्मीरी हिन्दुओं का वहां पुनर्वास करने में समय लगेगा, किन्तु हम उनको उनकी मातृभूमि की ओर से वोट का अधिकार तो दे ही सकते हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह जी ने कहा कि एक पूर्व सैनिक के अनुभवों पर आधारित होना इस पुस्तक की विशेषता है. जिसने कश्मीर की धरती पर वहां का वास्तविक चित्र देखा, सहा, झेला. इसलिये यह पुस्तक इस विषय पर अधिक प्रमाणिक है. कश्मीर के विषय पर सैनिकों के जो विवरण मिलते हैं, उसको अधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है, बजाए कि बुद्धिजीवियों के जो कुछ दिन के कश्मीर प्रवास के आधार पर पुस्तक लिखते हैं. वहां के दुर्गम आतंक प्रभावित इलाकों में गश्त कर रहे सैनिक को पता नहीं चलता, कब उसके साथ क्या हो जाए. सैनिकों के ऐसे कठिन जीवन को भी पुस्तक में बताया गया है, इसके लिए लेखक बधाई के पात्र हैं. उन्होंने कहा कि कई वर्षों से हम इस विषय पर उसी चर्चा में उलझे हुए हैं, जो हमसे करवाई जा रही है. जबकि महाराजा हरिसिंह ने वैसे ही दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये थे, जैसे अन्य रियासतों के राजाओं ने किये. जो जम्मू कश्मीर महाराजा हरिसिंह सौंप कर गए थे, उसका आधा हिस्सा भी भारत के पास नहीं है. राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसको मुद्दा बनाना चाहिए. पिछले 70 साल से जो हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है, उसे कैसे वापस लेना है, इस पर चर्चा होनी चाहिए. कोई भी बुद्धिजीवी ऐसी बात नहीं करे, जिससे सेना का मनोबल गिरता हो. कहा कि अगली बार कश्मीर पर आधारित सम्मलेन का विषय पाक अधिकृत कश्मीर को कैसे वापस लिया जाए” यह होना चाहिए.