काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से निकला संघ का पथसंचलन

दिंनाक: 23 Jan 2018 18:19:19


काशी(विसंके). छात्र स्वास्थ्य केन्द्र के निकट कृषि मैदान से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मालवीय नगर के स्वयंसेवकों द्वारा पथ-संचलन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना स्थल तक जाकर सम्पन्न हुआ। भारतरत्न महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी की तपोस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के 102 वर्ष पूर्ण होने पर गत वर्षों की भांति परम्परागत रूप से इस वर्ष भी वसंत पंचमी के अवसर पर विश्वविद्यालय के स्वयंसेवकों ने सधे कदमों के साथ अनुशासन बद्ध होकर नवीन गणवेश में पथसंचलन किया।


संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरूजी भारत माता तथा भारतरत्न पं. मदन मोहन मालवीय जी के विशाल चित्र के पीछे-पीछे पूर्ण गणवेश में पंक्तिबद्ध होकर स्वयंसेवकों का घोष के थाप पर समता करते हुए पथसंचलन किया। सिंहद्वार सहित अनेक स्थानों पर लोगों ने पथसंचलन का  स्वागत किया।

इस पावन अवसर पर कृषि मैदान मे स्वयंसेवको को सम्बोधित करते हुए कार्यक्रम के मुख्य वक्ता काशी प्रांत के प्रांत प्रचारक अनिल जी ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द्र जी का हस्तलिखित संविधान में रामकृष्ण मिशन में सन्यासियों से आग्रह किया कि देश में भ्रमण करके सबको अवगत करायें महामना ने विश्व विद्यालय के स्थापना का उदेश्य था कि हिन्दू धर्म का मानवर्धन करना, तकनीकी विकास के साथ देश के नैतिक बल को पुष्ट करना है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र देश विदेश मे अपनी छाप छोड़ते है। इसी विश्व विद्यालय से द्वितीय सर संघचालक माधव सदा शिव गोलवरकर जी (गुरूजी) भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और यही पर शिक्षक भी रहे महामना और डॉ. हेडगेवार जी की पहली मुलाकात नागपुर में संघ की शाखा पर हुई। डॉ. हेडगेवार ने स्वयं मालवीय जी को मदद के रूप में मांगा। महामना ने बी.एच.यू. के लॉ कॉलेज में संघ कार्यालय के लिए स्थान दिये नागपुर के बाद संघ की दूसरी शाखा काशी में लगी थी । 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके प्रतिरोध में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 280 छात्रों ने अपनी गिरफतारी दी थी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और संघ का इतिहास गौरव पूर्ण रहा है। हमें इसका सदैव मान रखना चाहिये।


वर्तमान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थिति स्वयंसेवकों के असीम तप और साधना का परिणाम है। संघ पर सरकार ने चार बार प्रतिबंध लगाया है। किन्तु स्वयंसेवकों की तप और साधना से आज भी यह अपनी जगह पर अडिग है। और ढृढ़ता के साथ बढ़ता जा रहा है।


संघ की कोई नई परिभाषा नही है। संघ स्वामी विवेकानन्द और महामना के सपनों को पूरा करने के लिए तत्पर और प्रयासरत है। संघ का भगवाकरण कोई अपनी विचारधारा  नहीं है। यह तो पुरातन परम्परा है। जो वेदो संस्कृतियों में वर्णित है। संघ का उद्धेश्य भारत को उत्कृट राष्ट्र बनाना है। 1734 में 14 वर्ष के वीरहकीकत राय को बसंत पंचमी के दिन फाँसी दे दी गयी क्योकिं उसने इस्लाम धर्म नहीं स्वीकार किया।  बसंत पंचमी उमंग का पर्व है, लोग नई उर्जा के साथ आगे बढ़े ।

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूर्वान्ह 2.00 बजे संघ के स्वयंसेवक कृषि मैदान में पथसंचलन हेतु एकत्रित हुए। बौद्धिक कार्यक्रम के बाद कृषि मैदान से ही लगभग 1000 की संख्या में स्वयंसेवकों ने पथसंचलन किया। यह पथसंचलन भारत कला भवन, मधुवन मार्ग से होते हुए सिंहद्वार, संत रविदास द्वार, ट्रामा सेण्टर होते हुए विश्वविद्यालय स्थापना स्थल पर पहुंचा और वंदेमातरम् के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम का संचालन एवं अतिथियों का परिचय म्रत्युन्जय जी ने कराया। मंचासीन अतिथियों में प्रमुख रूप से क्षेत्र संघचालक प्रो0 देवेन्द्र प्रताप सिंह, प्रांत प्रचार अनिल जी, विभाग संघ चालक प्रो. जय प्रकाश जी काशी दक्षिण के भाग संघ चालक प्रो. कविन्द्र जी उपथित रहे.