संघ मेरी आत्मा – श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की आत्मकथा के अंश

दिंनाक: 30 Jan 2018 15:27:59


भोपाल(विसंके). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मेरा प्रथम संपर्क 1939 में हुआ और वह भी आर्य समाज की युवा शाखा, आर्य कुमार सभा के माध्यम से उन दिनों ग्वालियर रियासत थी, जो किसी भी प्रांत का हिस्सा नहीं थी. एक कट्टर 'सनातती' परिवार से होने के बाद भी मैं आर्य कुमार सभा के साप्ताहिक 'सत्संग' में सम्मिलित हुआ करता था, जोकि प्रति रविवार को प्रातः काल हुआ करता था.


एक दिन आर्य कुमार सभा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता और महान विचारक व कुशल संगठक श्री भूदेव शास्त्री ने मुझसे पूछा
, "आप शाम को क्या करते हैं?" 

मैने कहा, "कुछ नहीं".  इस पर उन्होंने हमें संघ की शाखा में जाने का आग्रह किया और इस प्रकार ग्वालियर में मेरा शाखा जाने का क्रम प्रारंभ हुआ. यही मेरा आरएसएस के साथ पहला परिचय था. उस समय ग्वालियर में शाखा अभी शुरू ही हुई थी. इसमें केवल महाराष्ट्रीयन लड़के ही जाते थे, और स्वाभाविक ही सभी स्वयंसेवक मराठी भाषी थे. उसके बाद मैं नियमित शाखा जाने लगा. मुझे शाखा में खेले जाने वाले खेल और साथ ही साप्ताहिक 'बौद्धिक' पसंद आये.

 ग्वालियर में शाखा प्रारम्भ करने नागपुर से एक प्रचारक, श्री नारायणराव तरटे आये थे. वे वास्तव में एक शानदार इंसान थे. एक बहुत ही सरल आदमी, एक विचारक और एक विशेषज्ञ संगठक। आज मैं जो कुछ भी कर पा रहा हूं, उसके पीछे श्री तरटे, दीनदयाल उपाध्याय और भाऊ राव देवरस की प्रेरणा है. ग्वालियर उस समय भाऊराव के कार्यक्षेत्र में नहीं था. लेकिन एक बार वे तत्कालीन बौद्धिक प्रमुख श्री बालासाहेब आपटे के साथ ग्वालियर आए थे. आप्टे जी बहुत ही मृदु भाषी थे. हम लोग शीघ्र ही उनसे प्रभावित हो गए. उस समय तो उनके साथ मेरी मात्र कुछ ही मिनिट बातचीत हुई, किन्तु उसी वर्ष (1940) जब मैं अधिकारी प्रशिक्षण शिविर (ओटीसी) प्रथम वर्ष को देखने गया, तब मैं उनके निकट संपर्क में आया. मैं वहां शिविर के समापन समारोह में भाग लेने के लिए गया था, प्रशिक्षण के लिए नहीं. डॉ हेडगेवार भी कुछ समय के लिए वहां आए थे. मैंने सबसे पहले उन्हें वहां ही देखा था, बाद में जब डॉक्टरजी बीमार थे, तब मैं उन्हें देखने गया था। 1941 में जब मैं हाई स्कूल में था, मैंने अपना ओटीसी प्रथम वर्ष किया.  उसके बाद 1942 में जब मैं इंटरमीडिएट क्लास में था, तब मैंने अपना ओटीसी द्वितीय वर्ष किया, और 1944 में जब मैं बीए कर रहा था तब मैंने अपना तृतीय वर्ष किया.

जब मैंने 'हिंदू तन-मन हिंदू जीवन' लिखा, उस समय मैं कक्षा दस का छात्र था. ग्वालियर से स्नातक होने के बाद मैंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से एमए किया, क्योंकि ग्वालियर में कोई स्नातकोत्तर कॉलेज नहीं था. इसके लिए मुझे राज्य सरकार की छात्रवृत्ति भी मिली. विभाजन के कारण, मैं अपनी कानून की पढाई पूरी नहीं कर सका और फिर 1947 में, मैंने आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए अपना अध्ययन छोड़ने का फैसला किया. 1947 तक मैंने अपनी पढाई करते हुए शाखा स्तर पर आरएसएस का काम किया था. मैंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और जेल की सजा पाई, तब मैं अपनी इंटरमीडिएट परीक्षा के लिए अध्ययन कर रहा था. मुझे आगरा जिले के अपने गांव बटेश्वर से गिरफ्तार किया गया था. उस समय मेरी आयु 16 वर्ष थी.

मेरे पिताजी का आरएसएस से कोई सम्बन्ध नहीं था, लेकिन मेरे बड़े भाई शाखा जाया करते थे. एक बार जब वे शीतकालीन शिविर में गये, तब एक समस्या आई. उन्होंने कहा: "मैं अन्य स्वयंसेवकों के साथ भोजन नहीं कर सकता, मैं अपना भोजन स्वयं बनाऊंगा. और देखिये कि आरएसएस के अधिकारियों ने कैसे स्थिति को संभाला. शिविर के 'सर्वाधिकारी' (अधीक्षक) ने उनके अनुरोध का मान रखा और भोजन बनाने के लिए आवश्यक सभी चीजें प्रदान कीं. स्नान करने के बाद और अपने पवित्र धागे जनेऊ को समायोजित करने आदि के बाद, उन्होंने अपना खाना बनाना शुरू किया. पहले दिन तो उन्होंने किसी तरह अपना भोजन स्वयं तैयार किया, किन्तु अगले दिन वह इसे तैयार नहीं कर सके और सभी स्वयंसेवकों के साथ भोजन की कतार में शामिल हो गए. 44 घंटे के भीतर वह बदल गये थे.

 आरएसएस केवल व्यक्तियों को नहीं बदलता, वह सामूहिक मन को भी बदलता है. यही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रमुख गुण और सौन्दर्य है. हमारी आध्यात्मिक परंपरा में एक व्यक्ति, महान ऊंचाई पा सकता है. यदि कोई सही 'साधना' करता है तो आत्मोन्नति के चरम बिंदु, 'निर्वाण' को भी पा सकता है. लेकिन समाज के बारे में क्या? सामान्यतः कोई भी व्यक्ति समाज के प्रति अपने दायित्व के बारे में नहीं सोचता है. आरएसएस ने पहली बार इसके बारे में सोचा और निष्कर्ष निकाला कि व्यक्तियों को बदलकर हम समाज को बदल सकेंगे. अगर शिविर में सर्वाधिकारी ने उसे डांटा होता और उसे अपना भोजन स्वयं तैयार करने की इजाजत न दी होती, तो उसका आध्यात्मिक विकास थम गया होता, किन्तु 44 घंटों के भीतर आरएसएस में वह लड़का बदल गया. यही आरएसएस का "गुप्त तरीका" है, इसी से समाज परिवर्तन संभव है. यह सच है कि यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इसके लिए कोई शॉर्ट-कट नहीं है, इसलिए यही एकमेव मार्ग है.

 संगठन में अस्पृश्यता की अनुपस्थिति देखकर गांधीजी ने भी आरएसएस की तारीफ की थी. केवल आरएसएस ही समाज का संगठन करता है. अन्य जितने भी आंदोलन हुए उनमें अलग 'पहचान', अलग-अलग 'हितों', विशेष 'स्थिति' आदि पर जोर दिया गया, जिससे समाज केवल विभाजित हुआ. तथाकथित अछूतों में अलगाववाद की भावना बढ़ाकर, वे केवल अस्पृश्यता को ही प्रोत्साहित करते हैं. मसलन "आप का अपमान किया जा रहा है समाज में आपका कोई स्थान नहीं है " आदि !

इसके स्थान पर आरएसएस, दो प्रकार से कार्य करता है. पहला तो हिंदुओं को संगठित कर एक मजबूत हिंदू समाज का निर्माण, जो अच्छी तरह से एकजुट और जाति आदि के कृत्रिम मतभेदों के ऊपर उठ रहा है. संभव है कि कुछ मतभेद जारी रहें, किन्तु विविधता तो जीवन का संगीत है. जैसे, हमारी विविध भाषायें हैं, तो क्या हम इस विविधता को नष्ट करना चाहेंगे ?

 

दूसरा कार्य मुसलमानों और ईसाइयों जैसे गैर हिंदुओं को आत्मसात कर मुख्यधारा में लाना. वे अपनी आस्था के अनुसार अपनी पूजा पद्धति का पालन कर सकते हैं, इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकता, हम पेड़ों, जानवरों, पत्थरों की भी पूजा करते हैं. ईश्वर के पूजन के हमारे कई तरीके हैं. वे जहां चाहें, वहां जा सकते हैं. लेकिन उन्हें इस देश को अपनी मातृभूमि मानना चाहिए. उनके मन में इस देश के लिए देशभक्ति की भावना होना चाहिए. लेकिन इस्लाम ने दुनिया को 'दारूल हरब' और 'दारूल इस्लाम' में विभाजित कर रखा है. इस्लाम को अभी एक ऐसे देश में रहने और उत्कर्ष करने की कला सीखना है, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वे पूरे भारत को इस्लाम में परिवर्तित नहीं कर सकते. इसके बाद भी उन्हें रहना तो यहाँ ही है इसलिए उन्हें इस तथ्य को समझना होगा, मुस्लिम देशों में भी आज यह एक गंभीर चिंता और गहन विचार का विषय बन गया है, क्योंकि कुरान इस संबंध में कोई मार्गदर्शन प्रदान नहीं करता है वह केवल कफ़ीरों को मारने या उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करने की बात करता है लेकिन वे इसे हमेशा और हर जगह नहीं कर सकते  जहां वे अल्पसंख्यक हैं, वहां वे कैसे यह कर सकते हैं? अगर वे ऐसा करने की कोशिश करते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष हो जाएगा और उसमें केवल अल्पसंख्यक मारे जायेंगे. अतः मुसलमानों को इस मामले में स्वयं ही स्वयं को बदलना ही होगा. उनके लिए यह परिवर्तन हम नहीं कर सकते.

 कांग्रेस ने मुस्लिम समस्या ठीक से नहीं समझा है उन्होंने अपनी तुष्टीकरण की नीति जारी रखी. लेकिन इसका नतीजा क्या निकला? इस देश में मुसलमानों से तीन तरह से व्यवहार किया जा सकता है. एक है 'तिरष्कार', अर्थात अगर वे स्वयं को नहीं बदलते, तो उन्हें उनके हाल पर अकेला छोड़ दिया जाए, उन्हें बाहरी मानकर त्याग दिया जाए. दूसरा है 'पुरष्कार' जो तुष्टीकरण है, यानी उन्हें व्यवहार बदलने के लिए रिश्वत दी जाए, जो कि कांग्रेस और अन्य लोगों द्वारा लगातार किया गया है। तीसरा तरीका है 'परिष्कार' जिसका अर्थ है उन्हें बदलने के लिए, उन्हें सही संस्कार प्रदान करके मुख्य धारा में लाया जाए. हम उन्हें सही संस्कार प्रदान करके बदलना चाहते हैं. उनका धर्म बदलने की आवश्यकता नहीं, वे अपने धर्म का अनुसरण कर सकते हैं, मक्का मुसलमानों के लिए पवित्र बने रह सकते हैं, लेकिन भारत उनके लिए पवित्र से भी पवित्र होना चाहिए. आप एक मस्जिद में जा सकते हैं और नमाज अदा कर सकते हैं, आप रोजा रख सकते हैं, हमें कोई समस्या नहीं है, लेकिन अगर आपको मक्का या इस्लाम और भारत के बीच में से एक को चयन करना है तो आपको भारत का चयन करना होगा सभी मुसलमानों को यह महसूस होना चाहिए कि हम इस देश के लिए जियेंगे और मरेंगे.

 जब मैं दसवीं कक्षा में अध्ययन कर रहा था, तब मैंने "हिन्दू तन-मन-हिंदू जीवन" लिखा था. मैंने तब लिखा था, "कोई बतलाये काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोडीं।" मैं अभी भी अपने शब्दों पर अडिग हूं. लेकिन हम (हिंदुओं) ने अयोध्या में संरचना को हटा दिया. वास्तव में यह मुस्लिम वोट बैंक की प्रतिक्रिया थी. हम बातचीत और कानून के माध्यम से इस समस्या को हल करना चाहते थे. लेकिन बुराई के लिए कोई पुरष्कार नहीं है. हम बुराई को परिष्कार से ही बदल सकते हैं. मुझे लगता है, हिंदू समाज का पुनरुत्थान हो रहा है, जो आरएसएस का प्रमुख काम है। इससे पहले हमलावर हिंदुओं को झुकाते थे, लेकिन अब नहीं. हिंदू समाज में यह बदलाव स्वागत योग्य है. यह परिवर्तन नए-प्राप्त स्वाभिमान से उत्पन्न हुआ है. यह आत्मरक्षा का प्रश्न है, यदि हिंदू समाज इस स्व का विस्तार नहीं करता है तो उसे अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ेगा. हमें खुद का विस्तार करना होगा हमें सबको साथ लेना होगा अब यादव और तथाकथित हरिजन भी साथ आ रहे हैं. वे भी मानते हैं कि अंततोगत्वा वे हिंदू पहले हैं, यादव या अन्य जाती समुदाय के बाद में. एक बार एक यादव नेता मेरे पास आए और उन्होंने कहा: "आप सभी यादवों की निंदा मत करो. सभी यादव मुलायम सिंह और लालू प्रसाद के साथ नहीं हैं. सुसंस्कृत यादव उन्हें पसंद नहीं करते. आपको राजपूत, कुर्मी और गुज्जर मुस्लिम मिल जायेंगे, लेकिन कहीं भी यादव-मुस्लिम नहीं मिल सकते. यादवों ने कभी इस्लाम को स्वीकार नहीं किया. "यादव-मुस्लिम" एकता-एमव्हाय कार्ड, महज हवा हवाई है, वोटों के लिए लगाए जाने वाले खोखले नारे से अधिक कुछ नहीं है. "

 आरएसएस के साथ मेरे लंबे सम्बन्ध का सबसे बड़ा कारण यह है कि मैं संघ को पसंद करता हूं. मुझे इसकी विचारधारा पसंद है, और सबसे ऊपर मैं लोगों के प्रति आरएसएस के दृष्टिकोण को पसंद करता हूं, एक दूसरे के प्रति जो सम्मान आरएसएस में मिलता है वह अन्यत्र दुर्लभ है. मुझे एक घटना याद है, तब मैं लखनऊ में था. सोशलिस्ट आंदोलन अपने चरम पर था. अचानक एक वरिष्ठ समाजवादी कार्यकर्ता बीमार हो गये. वे अपने घर में अकेले लेटे थे, और कोई भी उनकी मदद के लिए पूछताछ करने नहीं गया. जब आचार्य नरेंद्र देव को इसका पता चला तो वे उनके घर उन्हें देखने पहुंचे. तब आचार्य ने कहा, "समाजवादी पार्टी में यह कैसी प्रकृति है? कोई आपको देखने भी नहीं आया. आरएसएस में यह कभी नहीं हो सकता था. अगर एक स्वयंसेवक केवल एक दिन के लिए शाखा में नहीं आता है तो उसी दिन उसके मित्र तुरंत उसके घर तक पहुंच जाएंगे ताकि उनकी देखभाल कर सकें. "

 जब आपातकाल के दौरान मैं बीमार था, तो मेरे परिवार के सदस्य भी मुझे देखने के लिए नहीं आये, क्योंकि उन्हें अपनी गिरफ्तारी का भय था, केवल आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने मेरी मदद की, देखो, आरएसएस में कितना जीवित संपर्क और भाईचारे का भाव है. असल में संघ हमारा परिवार है. हम सब एक हैं.

 शुरुआत में हम समाज के सभी वर्गों में अपना काम नहीं फैला सके, क्योंकि हमारे पास पर्याप्त कार्यकर्ता नहीं थे. "व्यक्ति-निर्माण" आरएसएस का मुख्य काम है. आज हमारे पास अधिक कार्यकर्ता हैं, हम जीवन के सभी क्षेत्रों को, समाज के सभी वर्गों को कवर कर रहे हैं. परिवर्तन सभी क्षेत्रों में हो रहे हैं। लेकिन मनुष्य-निर्माण का काम बंद नहीं होगा, यह आगे बढ़ेगा. इसे बढ़ना ही चाहिए, यही आरएसएस का अभियान है. 

 साभार - ओर्गेनाईजर के आलेख का हिंदी अनुवाद 

अनुवादकर्ता - हरिहर शर्मा