बांग्लादेशी घुसपैठियों पर निर्णायक मूड में नमो सरकार – प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 05 Jan 2018 16:29:32


भोपाल(विसंके). अंततः संघ परिवार की नीतियों के अनुरूप बांग्लादेशी घुसपैठियों के सन्दर्भ में असम की सर्वानंद सरकार ने व केंद्र की नमो सरकार ने अपना राष्ट्रवादी मास्टर प्लान लागू कर दिया है. 22 फरवरी 2014 को, लोक सभा चुनाव के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने असम  के सिलचर में कहा था- ‘बांग्लादेश से दो तरह के लोग भारत में आए हैं. एक शरणार्थी हैं. जबकि दूसरे घुसपैठिये. अगर हमारी सरकार बनती है तो हम बांग्लादेश से आये हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने के साथ ही घुसपैठियों को यहाँ से बाहर खदेड़ने का भी वादा करते हैं. भाजपा ने असम में लोकसभा व विधानसभा दोनों चुनावों में “जाति, माटी, भेटी” यानि जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करने के नाम पर वोट मांगे थे. सत्ता में आने के बाद 19 जुलाई 2016  को नमो सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोक सभा में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 पेश किया. यह विधेयक 1955 के उस ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए था, जिसके जरिये किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय होती है. इस विधेयक में प्रावधान था कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा. इसका सीधा सा अर्थ ये था कि इसके जरिये बांग्लादेशी हिन्दुओं को भारत की नागरिकता दी जानी थी. अब इस दिशा में ठोस कदम के रूप में NRC यानि नेशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ़ सिटिजन का पहला ड्राफ्ट 31  दिसंबर की रात सामने आया है. इस ड्राफ्ट में असम के कुल 3.29  करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ लोगों की जगह दी गई और उन्हें कानूनी तौर पर भारत का नागरिक मान लिया गया है. वहीँ बचे हुए लोगों का प्रमाणीकरण हो रहा है, जिसके बाद उनका नाम इस लिस्ट में शामिल किया जाएगा. जो व्यक्ति इस लिस्ट में अपना नाम दर्ज नहीं करवा पाएंगे या उनके पास इसके लिए जरूरी कागजात नहीं होंगे, उन्हें असम का नागरिक नही माना जायेगा और उन्हें देश के बाहर जाना पड़ेगा. 1971 में जब पाकिस्तान विभाजन के पश्चात् बांग्लादेश अस्तित्व में आया, उसके बाद से ही असम घुसपेठियो के विषय चर्चित रहने लगा था. असम के रास्ते घुसपैठिये देश में घुसकर देश के प्रत्येक हिस्से में जाकर बसने लगे थे.

बांग्लादेश के निर्माण के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई व वहां की एक बड़ी आबादी भारत आकर बस गई थी, इसमें हिन्दुओं के अलावा मुस्लिमों की भी बड़ी आबादी थी.

1971 के इस दौर में लगभग 10 लाख बांग्लादेशी असम में ही बस गए. 1971  के बाद भी बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी का असम में आना जारी रहा. बांग्लादेश के लोगों की बढती जनसँख्या ने असम के स्थानीय लोगों में भाषायी, सांस्कृतिक व सामाजिक असुराक्षा की स्थितियां उत्पन्न कर दी. घुसपैठिये असम में नाना प्रकार से अशांति, अव्यवस्था, अपराध व उत्पात मचाने लगे. 1978  में असम के मांग लोडी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव के दौरान चुनाव आयोग के ध्यान में आया कि इस चुनाव में वोटरों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई है. चुनावी गणित व तुष्टिकरण की नीति के चलते सरकार ने 1979 में बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिक बना लिया. असम में आल असम स्टूडेंटस यूनियन (आसू) और असम गण संग्राम परिषद के नेतृत्व में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर सरकारी नीति के विरोध में आन्दोलन हुआ और असम भड़क गया. आसू व अगप को असम की स्थानीय जनता ने बहुत प्यार व समर्थन दिया. छात्र संगठन आसू ने असम आन्दोलन के दौरान ही 18 जनवरी 1980 को केंद्र सरकार को एक NRC अपडेट करने हेतु ज्ञापन दिया. इस बड़े व् हिंसक आन्दोलन की परिणति 1985 में असम में राजीव गाँधी के साथ ‘’असम समझौते” के रूप में हुई. 1999 में वाजपेयी सरकार ने इस समझौते की समीक्षा की और 17 नवम्बर 1999 को तय किया गया कि असम समझौते के तहत NRC  को अपडेट किया जाना चाहिए. अटल जी की सरकार जाने के बाद 2005 में मनमोहन सरकार भी सी निर्णय पर कायम रही व NRC की समीक्षा हेतु बारपेटा और चायगाँव में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया. असम के कुछ संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और वहां हिंसा हो गई और असम की गोगोई सरकार इसमें बुरी तरह विफल रही. इसके बाद नेता सर्वानंद सोनोवाल ने 2013 में बांग्लादेश के घुसपैठ के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में उठाया और न्यायालय ने NRC 1951  को अपडेट करने का आदेश दिया जिसमें 25 मार्च, 1971 से पहले बांग्लादेश से भारत में आने वाले लोगों को स्थानीय नागरिक माने जाने की बात कही गई थी. और उसके बाद के असम में पहुँचने वालों को बांग्लादेश वापस भेजने के आदेश दे दिए गए थे. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद ही NRC  के समीक्षा व अपडेशन का कार्य प्रारम्भ हुआ और 1951  की जनगणना में शामिल अल्पसंख्यकों को राज्य का नागरिक मान लिया गया. 1951 से 25 मार्च, 1971 के बीच असम में आने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों के पास वैध कागजात नहीं थे. NRC को अपडेट करने के दौरान पंचायतों की और से जारी नागरिकता प्रमाण पत्र को मान्यता नहीं दी जा रही थी. इसके बाद मामला असम हाईकोर्ट में पहुँच गया. हाई कोर्ट ने लगभग 26 लाख लोगों के पहचान के दस्तावेज अवैध करार दे दिए. इसके बाद मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया. असम की सर्वानंद सरकार ने न्यायलय के आदेशानुसार 31 दिसंबर 2017 को नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस NRC  का पहला ड्राफ्ट जारी कर दिया जिसमें असम के कुल 3.29  करोड़ लोगों में से 1.9  करोड़ लोगों को कानूनी तौर पर भारत का नागरिक माना गया. यद्यपि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इण्डिया शैलेष ने ड्राफ्ट जरी करते हुए कहा है कि लोगों को घबराना नहीं चाहिए व इसके बाद और वेरीफीकेशन होगा व और ड्राफ्ट भी जारी होगा. लिस्ट जारी होने के बाद असम सरकार के वित्त मंत्री और नागरिकता रजिस्टर के इंचार्ज हेमंत विश्वकर्मा ने कहा कि जिन लोंगो का नाम NRC  रजिस्टर में नहीं है. उन्हें हर हाल में देश छोड़ना होगा. अब देखना यह है कि हमारा देश एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद किस प्रकार और कब बांग्लादेशी  घुसपैठियों की समस्या से मुक्ति पायेगा.