तात्कालिक स्वार्थ के लिये समाज और देश को क्षति पहुंचाने वालो को इतिहास में कोई जगह नही मिलती – सुरेश राने

दिंनाक: 09 Jan 2018 13:52:27


भोपाल(विसंके). देश में कुछ समय से दलित-मुस्लिम एकता स्थापित कर एक सशक्त राजनीतिक शक्ति खड़ी करने का प्रयास हो रहा है. इसके लिये दोनों वर्गों के कुछ अति-उतावले नेता सक्रिय हैं. बहन मायावती ने एक बार मुस्लिम वोट प्राप्त कर उत्तरप्रदेश में सरकार बनाई, पर उनका उद्देश्य यहीं तक सीमित है. पर अब दोनों पक्षों में कुछ ऐसी शक्तियां उभर रही हैं जिनका लक्ष्य किसी अन्य वर्ग को कुचल कर अपनी संहारक सत्ता स्थापित करना स्पष्ट दिख रहा है. एक  उदाहरण मजलिश ए इत्तिहाद उल मुसलिमीन और इसके नेता असदुद्दीन उवैशी हैं, ये उन रजाकारों के उत्तराधिकारी हैं, जिनके संगठन ने 1946-48 में हैदराबाद रियासत में हिन्दुओं कि संहार किया था. भविष्य में ऐसे समूह सत्ता प्राप्त कर कैसा आचरण करेंगे, कल्पना की जा सकती है.
     ऐसा ही विध्वंशक इरादा नये उभरे दलित नेता नेता जिग्नेश मेवानी का दिख रहा है. इन की वाणी मनुवादी, दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों के लिये जहर उगल रही है. मुस्लिम अलगाववादियों के रूप में इनको भविष्य के साथी मिल गये हैं. यदि यह पाकिस्तान के दलितों के प्रति वहां के मुसलमानों का व्यवहार देख लेते तो इनका भ्रम मिट जाता. वहां वाल्मीकि  मेघवाल और अन्य दलित हिंदू अक्षरशः नरक भोग रहे हैं.
       मैं श्री मेवानी और उनकी विचारधारा के अन्य दलित नेताओं को अविभाजित भारत के दलित नेता जोगेन्द्र नाथ मंडल की कहानी से सबक लेने का आग्रह करता हूं.
        श्री मंडल बंगाल के बड़े दलित नेता थे, डा.अम्बेडकर से स्पर्धा रखते थे इसलिये मुस्लिम लीग से जुड़ गये. सुहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार में वे मंत्री थे ,जो सीधी कार्यवाही के नाम पर बंगाल के हिंदुओं के कत्लेआम के लिये कुख्यात हुई. लीग की पाकिस्तान की मांग मंगवाने के लिये वह अनशन पर बैठ रहे थे, किन्तु कांग्रेस के सहमत होजाने के कारण इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी.
      जब पाकिस्तान के लिये जनमत-संग्रह हो रहा था, तब सिलहट जिले में हिंदु, मुस्लिम जनसंख्या बराबर होने के कारण भारत में शामिल होने की सम्भावना थी. तब जिन्ना ने श्री मंडल को भेज कर दलितों के वोट पाकिस्तान के पक्ष डलवा कर वह जिला पाकिस्तान में मिलवाना सुनिश्चित किया.
         पाकिस्तान बनने पर मंडल वहां श्रम मंत्री बने और कराची में रहने लगे. 1949 में एसेम्बली में आब्जेक्टिव रिजोल्यूशन का भी समर्थन किया, जिससे पाकिस्तान इस्लामी देश घोषित हुआ. पर वह मुसलमानों का भरोसा नहीं जीत सके, अन्य मंत्री और अधिकारी उनकी उपेक्षा करने लगे.
         1950 में पूर्वी पाकिस्तान में दलित हिंदु साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार बनने लगे, हजारों लोग मारे गये, उनका पाकिस्तान से भारत पलायन शुरु हो गया. श्री मंडल भी भाग कर कलकत्ता आ गये और 1968 में वहीं उनका देहांत हुआ.
       इतिहास शिक्षा देता है, तात्कालिक स्वार्थ के लिये समाज और देश को क्षति पहुंचाने वाले पहले भी हुए हैं, पर वह क्या उपलब्ध कर सके ?