आज की अभिव्यक्ति

दिंनाक: 01 Oct 2018 15:02:04


स्वदेशी की कल्पना बीते युग की तथा प्रतिगामीपन की घोतक समझी जाती है | विदेशों की हर वस्तु हम बड़े चाव से ले रहे हैं | विचार,व्यवस्था, पद्दति, पूंजी, उत्पादन प्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा उपभोग के मानदंड - सभी क्षेत्रों में हम विदेशों पर निर्भर हैं | यह प्रगति का रास्ता नहीं है | इससे विकास नहीं होगा | हम अपने स्व को विस्मृत कर परतंत्र हो जायेंगे | स्वदेशी के भावनात्मक रूप को समझकर हमें उसे सृजन का आधार एवं अवलंब बनाना चाहिए |


- पं. दीनदयाल उपाध्याय