पीलिया रोग की अचूक औषधि है, सफेद मदार - संत भास्कर दास

दिंनाक: 11 Oct 2018 16:13:45


भोपाल(विसंके). मानव जीवन की सफलता का रहस्य है, स्वस्थ्य जीवन। अस्वस्थ्य व्यक्ति न तो अपनी बुद्धिमता का पूरा उपयोग कर पाता है, एवं न ही सुखी जीवन जी सकता है। ऋषि मुनियों की पावन भूमि भारत में अनादि काल से अनेक संत महात्मा एवं बुद्धिजीवियों ने जन्म लेकर तत्कालीन समाज को अपने ज्ञान की सेवाये अर्पित की। कृषि प्रधान भारत की अधिकतर जनसंख्या गांवों में निवास करती है। पुराने समय में हर एक गांव में एक कुशल वैद्य निश्चित रूप से रहता था। जो निःस्वार्थ भाव से अपने गांव एवं आस-पास के लोगों का निःशुल्क रूप से सेवा भाव की दृष्टि से सेवा करता था। गांव वासी भी वैद्य का पूरा सम्मान करते थे। छोटी-मोटी व्याधियों का इलाज हर परिवार में घर की बुजुर्ग महिला के द्वारा ही हो जाता था। बीच में मुगल एवं अंग्रेजों के षासन काल में कुछ कुप्रथायें समाज में आयी। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार का चलन बढ़ने लगा। आजादी के बाद देश में अनेक महा पुरुषों एवं समाज सेवियों ने समाज को नयी दिशा देने का प्रयास किया। इन्ही में से एक है राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख ।


जिन्होंने अपने मित्र पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की स्मृति में उन्ही के नाम से ‘‘दीनदयाल शोध संस्थान‘‘ की स्थापना कर स्वावलम्बन अभियान के तहत, कोई अशिक्षित न रहे, कोई बेकार न रहे, कोई गरीब न रहे, कोई बिमार न रहे एवं हरा भरा विवाद मुक्त गांव।



       स्वास्थ्य की दृश्टि से कोई बिमार न रहे इस हेतु दीनदयाल शोध संस्थान चित्रकूट के अन्र्तगत आरोग्यधाम की स्थापना की गयी। जहां पर आयुर्वेद के साथ-साथ योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा विभाग के अन्तर्गत अपनी पुरातन भारतीय चिकित्सा पद्धति से स्वास्थ्य लाभ की व्यवस्था। स्वावलम्बन अभियान के तहत चित्रकूट की 50 किमी. की परिधि में आने वाले ग्राम आबादियों के कोई भी व्यक्ति अस्वस्थ्य न रहे इस दृष्टि से परम्परागत वैधों की खोज कर संस्थान के द्वारा आधुनिक परिपेक्ष में उन्हें समय-समय पर कुछ नयी जानकारी देकर उनके ज्ञान का लाभ सम्बधित क्षेत्र के आबादियों को मिले यह प्रयास प्रारम्भ किया गया। जिसके अन्तर्गत स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रशिक्षण एवं वैद्य सम्मेलनों का आयोजन संस्थान के आरोग्यधाम परिसर में सतत् चले ऐसी परिकल्पना की गयी।

      
ऋषि की परिकल्पना अनुसार ही 10 एवं 11 अक्टूबर को दो दिवसीय वैद्य सम्मेलन संस्थान के आरोग्यधाम परिसर में किया गया। जिसमें उ.प्र. के चित्रकूट एवं म.प्र. के सतना जिले के 40 गांवों के 65 वैद्यों की सहभागिता रही जिसमें दो महिला वैद्य भी थीं। इस दो दिवसीय सम्मेलन में अलग-अलग क्षेत्रों से आये वैद्यों ने अपने ज्ञान का अदान -प्रदान किया संस्थान द्वारा तैयार की गयी 600 औषधि वाटिका का प्रत्यक्ष अवलोकन वैद्यों द्वारा किया गया। वैद्यों में से संत भास्कर दास जी ने अपने अनुभव बताते हुये बताया कि पीलिया रोग की अचूक औषधि है, सफेद मदार का दूध‘‘। मदार के दूध की दो बूंद मिश्री के साथ रोगी देने से पीलिया रोग में काफी फायदा मिलता है। इसी प्रकार अन्य वैद्यों ने अपने -अपने विचार व्यक्त किये। इस दो दिवसीय वैद्य सम्मेलन में आये हुये वैद्यों ने संकल्प लिया कि अब वे भविष्य में अपने ज्ञान को आगे की पीढ़ी को बतायेगें जिससे उनके भौतिक रूप से इस संसार में न रहने पर उनके ज्ञान का लाभ आगे की पीढ़ी को मिलता रहे।


इस दो दिवसीय वैद्य सम्मेलन में संयोजक के दायित्व का निर्वाहन हरीराम सेानी ने किया तथा वैद्य राजेन्द्र सिंह पटेल सम्मेलन के नियंत्रक तथा आरोग्यधाम के डॉ. विजय प्रताप सिंह जी ने व्यवस्था प्रमुख के रूप रहे। संस्थान के संगठन सचिव अभय महाजन जी ने सभी वैद्यों के समक्ष नानाजी की परिकल्पना को रखते हुये बताया कि इस सम्मेलन की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब आप सभी वैद्य जन अपने -अपने क्षेत्र में नये वैद्य तैयार कर समाज की सेवा में लगायेगें। इस दो दिवसीय वैद्य सम्मेलन को सफल बनाने में दीनदयाल शोध संस्थान के  सभी कार्यकर्ताओं की सहभागिता रही।