अन्न की अपव्ययता पर अंकुश आवश्यक (विश्व खाद्य दिवस पर विशेष) – रितेश दुबे

दिंनाक: 16 Oct 2018 15:10:42



भारतीय संस्कृति में अन्न को ब्रम्हा कहा गया है। शायद इसीलिए भारत कृषि प्रधान देश है। किसी भी फसल को तैयार होने में छह से चार माह लगते है। लेकिन हम न किसान की मेहनत को समझते है और न ही अन्न की उपयोगिता को, आज शादियां, उत्सवों और त्यौहारों में हम न जाने कितने टन भोजन बर्बाद करते है, आजकल आधुनिक बुफे सिस्टम में दोबारा भोजन लेने के लिये लाईन में न लगना पड़े यह सोच कर कई लोग एक बार में इकठ्ठा भोजन ले लेते है, और न खिलाने पर उसे कूड़े में डाल देते है, इन मौको पर बहुत सारा खाना कचरे में चला जाता है। इसी तरह होटल रेस्त्रां में भी हजारों टन भोजन बर्बाद  होता हैं ।

भारतीय संस्कृति में अन्न को देवता का दर्जा होने के कारण ही भोजन को झूठा छोड़ना या उसका अनादर करना पाप माना जाता है। मगर आज के आधुनिक समय में हम अपना यह संस्कार भूल गए है। पारंपरिक पंगत में व्यक्ति उतना ही भोजन लेता था, जितनी जरूरत होती थी कही न कही आसपास बैठे लोगों के संकोच के कारण भोजन छोडने में इंसान सोचता था। हमारी संस्कृति में ताजा खाना खाने के पीछे भी एक संकल्पना है कि भोजन जितनी जरूरत हो उतना ही बने बर्बाद न हो।

दुनिया में करोडों लोग भोजन न मिलने के कारण रोज भूखे सोते है। भोजन के दुरूपयोग पर अंकुश लगाने के लिए खाद्य मंत्रालय ने 2011 में कहा था कि वह शादियों  पार्टियों में परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या समिति करने पर विचार कर रहा है। हम सोचते है कि हम हमारे यहां होने वाली शादी पार्टियों में जितनी ज्यादा वैरायटी का भोजन रखेगें तो हमारी शान शौकत बढ़ेगी लेकिन सच्चाई यह है कि भोजन के अपव्यय से जल ,जमीन और जलवायु के साथ साथ जैव विवधता पर बेहद नकारात्मक असर पड़ता है। भोजन का अपव्यय भी प्रकृति का शोषण है।  खाद्य पदार्थों के महत्व को समझाने के लिए एवं खाद्यान्न की समस्या को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने प्रत्येक वर्ष अक्टूबर 16 को विश्व खाद्य दिवस मनाने का आगाज़ किया। संयुक्त राष्ट्र ने 16 अक्टूबर 1945 को रोम में खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना की। कांफ्रेंस ऑफ़ द फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन ने वर्ष 1979 से विश्व खाद्य दिवस मानने की घोषणा की।

दुनिया में भुखमरी की समस्या के प्रति लोगों में जागरूकता बढो और भूख ,कुपोषण और गरीबी के खिलाफ संघर्ष को मजबूती देना इस दिवस का उद्धेश्य है। दुनिया भर के 150 देश खासतौर पर विकासशीलल एवं पिछडे देष इस दिन विशेषतः मनाते है। यदि दुनिया से भुखमरी की समस्या खत्म होती है तो 3.1 मीलियन बच्चों का जीवन बचाया जा सकता है।


भोजन का अपव्यय रोकने की दिशा में समाज बहुत कुछ कर सकता है ,खासकर परिवार के बडों को बच्चों में यह आदत बचपन से ही डालनी होगी कि जितनी भूख हो थाली में उतना ही ले, अच्छी बात यह है सरकारी के साथ साथ निजी विधालयों में जहां मध्यान्ह भोजन दिया जाता है वहां बच्चों को इस बारे मे जागरूक किया जा रहा है,। मितव्यता रखते हुए मिलबांट कर खाने से अपव्यय रोका जा सकता है।


प्रकृति हमें हर साल इतना खाद्यान्न देती है कि कोई भूख न रहे लेकिन फिर भी उचित प्रबंध न होने के कारण दुनिया भर में करोडों लोग भूखे सोने को मजबूर है। हमारे देष की बात करें तो सरकारी दुकानों में अन्न के सार्वजनिक वितरण सहित भूखमरी मिटाने के लिये अनेक योजनाऐं चल रही है। लेकिन फिर भी पेट्रोल डीजल के बढ़ते दाम भी खाद्य पदार्थों को महंगा कर देते है। वेयर हाउसेस की कमी होने के कारण कई टन अन्न खुले में सड़ जाता है, वहीं उचित प्रबंध न होने के कारण भी कई बार खाद्य सामग्री वेयर हाउसेस या कोल्ड स्टोरेज में भी सड़ती रहती है या उसे चूहे खा जाते है लेकिन जरूरतमंदों के पास भोजन नहीं पहुंच पाता है। कुल मिलाकर सरकार के साथ समाज की जागरूकता ही खाद्यान का उचित प्रबंध कर सकती है।