प्रबुद्धजनों के सवाल, भागवत जी के जवाब

दिंनाक: 02 Oct 2018 18:28:42


व्याख्यानमाला के तीसरे दिन अलग-अलग क्षेत्रों के प्रबुद्धजनों ने सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत से करीब दो दर्जन विषयों पर सवाल पूछे। एक ही प्रश्न में कई प्रश्न समेटे, करीब दो दर्जन विषयों पर श्री भागवत ने विस्तारपूर्वक, सारगर्भित उत्तर दिए:-

क्या हिन्दुत्व को हिन्दुइज्म कहा जा सकता है? देश में अन्य मत-पंथों के साथ हिन्दुत्व का तालमेल कैसे संभव है? क्या जनजातीय समाज भी हिन्दू है?

हिन्दुइज्म ये गलत शब्द है, क्योंकि इज्म एक बंद चीज मानी जाती है। इसलिए ये कोई इज्म नहीं है। गांधी जी ने कहा कि सत्य की अनवरत खोज का नाम हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। मोस्ट डायनामिक है और उसमें सबका योगदान है। इसलिए हिन्दुत्व को हिन्दुइज्म नहीं कहना चाहिए। ऐसा मेरा मानना है। रही अन्य मत-पंथों के साथ तालमेल की बात तो भारत की विचारधारा में सभी समाहित हैं, क्योंकि तालमेल का आधार मूल एकत्व और विविधता होना अवश्यम्भावी है। क्योंकि प्रकृति विविधता को लेकर चलती है, विविधता ये भेद नहीं है, विविधता ये साज-सज्जा है, प्रकृति का शृंगार है। ऐसी अनुभूति को आधार देने वाला एकमात्र देश हमारा देश है और इसलिए हिन्दुत्व ही है जो सबके तालमेल का आधार बन सकता है। तीसरा प्रश्न जनजातीय समाज भी हिन्दू है। भारत में रहने वाले सब लोग हिन्दू ही हैं। पहचान की दृष्टि से, राष्ट्रीयता की दृष्टि से। ये कुछ लोग जानते हैं और गर्व से कहते हैं। 

  • पूरे हिन्दू समाज में समरसता के लिए रोटी-बेटी का संबंध होना चाहिए। संघ इसके लिए क्या करेगा? अंतरजातीय विवाह तथा अंतरपांथिक विवाह के संबंध में संघ क्या सोचता है? क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि हिन्दू समाज जातियों में बैठेगा? 

रोटी-बेटी व्यवहार का हम पूरा समर्थन करते हैं। लेकिन जब इसको करने जाते हैं तो रोटी व्यवहार तो आसान है और बहुत लोग आजकल कर भी रहे हैं। यह मन से होना चाहिए इसकी आवश्यकता है। इसलिए समझदारी ठीक करनी पड़ेगी। बेटी व्यवहार थोड़ा कठिन इसलिए है कि उसमें केवल सामाजिक समरसता का विचार नहीं, दो परिवारों के मिलन का भी विचार है। वर-वधू के भी मिलने का विचार है। ये सब देख कर हम उसका समर्थन करते हैं। महाराष्ट्र में पहला अंतरजातीय विवाह 1942 में हुआ। अच्छे सुशिक्षित लोगों का था इसलिए उसकी प्रसिद्धि हुई। उस समय उसके लिए जो शुभ संदेश आए थे, उसमें पूजनीय डॉ़ बाबा साहब आम्बेडकर का भी संदेश था और पूजनीय श्री गुरुजी का भी संदेश था। गुरुजी ने उस संदेश में कहा था कि आपके विवाह का कारण केवल शारीरिक आकर्षण नहीं है। आप ये भी बताना चाह रहे हैं कि समाज में सब एक हैं, इसलिए आप विवाह कर रहे हैं। मैं आपका इस बात के लिए अभिनंदन करता हूं और आपको दाम्पत्य जीवन की सब प्रकार की शुभकामनाएं देता हूं। इसलिए मानव, मानव में भेद नहीं करना। प्रत्येक की अपनी रुचि और अरुचि होती है। पूरा जीवन साथ में चलाना है। यह ठीक से चल सकता है कि नहीं, इतना देखना चाहिए। तो बेटी व्यवहार के लिए भी हमारा समर्थन है। मैं तो कभी-कभी कहता हूं कि अंतरजातीय विवाहों की गणना करके प्रतिशत निकाला जाए तो ऐसा करने वाले शायद सबसे ज्यादा प्रतिशत संघ के स्वयंसेवकों का मिलेगा। इस रोटी-बेटी व्यवहार का चलन बढ़ाने से, यानी केवल विवाह और केवल साथ बैठकर खाने की बात नहीं। जीवन की हर व्यवस्था में उसको अभेद दृष्टि से देखना। ये जब करते हैं तो हिन्दू समाज जातियों में नहीं बंटेगा। इसको हम सुनिश्चित कर सकते हैं। वह बंटेगा नहीं ये मैं जानता हूं, इसलिए कि प्रत्येक हिन्दू की जो आत्मा है वो आत्मा एकता में ही विश्वास करती है और मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि आत्मा से अलग होकर ज्यादा चल नहीं सकता। 

  • हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था को संघ कैसे देखता है? संघ में अनुसूचित, जनजातियों का कैसा प्रतिनिधित्व और स्थान है? घुमंतू और विमुक्त जातियों के लिए संघ ने क्या कोई पहल की है?

जब जाति व्यवस्था कहते हैं, उसमें गलती होती है। आज व्यवस्था कहां है, वह अव्यवस्था है। कभी ये जाति व्यवस्था उपयुक्त रही होगी, नहीं रही होगी। आज उसका विचार करने का कोई कारण नहीं है, वह जाने वाली है। जाने के लिए प्रयास करेंगे तो जाएगी। अंधकार को लाठी मार-मार कर भगाएंगे तो अंधेरा नहीं जाएगा। एक दीपक जलाओ, वह भाग जाएगा। इसलिए एक बड़ी लाइन खींचो तो सारे भेद विलुप्त हो जाएंगे। यही संघ कर रहा है। रही बात घुमंतू जातियों की तो हमने उनके लिए काम किया है। मैं मानता हूं कि स्वतंत्रता के बाद उनके बीच काम करने वाले हम पहले होंगे। महाराष्ट्र में ये काम शुरू हुआ और उसके चलते बहुत सारी बातें हुईं। इस समाज के बच्चों को शिक्षा देना, शिक्षा प्राप्त करके वे कैसे आगे बढ़े, इसकी चिंता करना। अखिल भारत में जितनी घुमंतू जातियां हैं, उनके लिए बढ़ाने का भी हमने उपक्रम पिछले वर्ष से प्रारंभ किया है और हम उनके लिए और काम करेंगे। 

  • शिक्षा में परंपरा और आधुनिकता का समन्वय वेद, रामायण, महाभारत आदि का शिक्षा में समावेश सह शिक्षा आदि विषयों पर संघ की क्या राय है? उच्च शिक्षा का स्तर लगातार घट रहा है। भविष्य के भारत का निर्माण कैसे होगा?

देखिए, धर्मपाल जी का ग्रंथ आप पढ़ेंगे तो ध्यान में आयेगा कि अंग्रेजों के आने के बाद उन्होंने जब सर्वे किया तो उन्होंने पाया कि परम्परा से हमारी शिक्षा पद्धति ज्यादा प्रभावी, अधिक लोगों को साक्षर बनाने वाली, मनुष्य बनाने वाली और अपना जीवन चलाने योग्य बनाने वाली थी। वह अपने देश में ले गए और ऐसा सबकुछ एक साथ न कर सकने वाली अपनी पद्धतियां लाईं। ये इतिहास है और इसलिए आज की दुनिया में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जो लेने लायक है, वह लेते हुए अपनी परम्परा से जो लेना है, वह लेकर हमको एक नई शिक्षा नीति बनानी चाहिए। आशा करता हूं कि नई शिक्षा नीति आने को हुई है। उसमें ये सब बातें होंगी। रही उच्च शिक्षा के स्तर घटने की बात तो मैं कहता हूं कि शिक्षा देने वालों का स्तर घटता है। लेने वालों का घटता है। छात्र शिक्षा के लिए अपने जीवन की कमाई पर दृष्टि रखकर उसके लिए आवश्यक डिग्री लेने के लिए आता है। हरेक की अपनी क्षमता और रुचि होती है। उसको जो अच्छा लगता है उसको करने को मिले और जो वह करे, वह उत्कृष्ट करे। शिक्षकों के स्तर का और कोर्स की सामग्री भी ये प्रश्न है। कई बार ऐसा होता है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों से लोग डिग्री लेकर तो निकलते हैं, लेकिन कर्मचारी नहीं रहते हैं। डिग्रियां बहुत मिल रहीं, उच्च शिक्षा के संस्थान चल रहे हैं। लेकिन हमारे यहां शोध कम हो रहे हंै। विषय को पढ़ाने वाले प्राध्यापक, शिक्षक कम हो रहे हैं। तो इस दृष्टि से एक सर्वांगीण विचार करके सभी स्तरों की शिक्षा का एक अच्छा प्रारूप हमको खड़ा करना पड़ेगा। इसलिए शिक्षा नीति का आमूलचूल विचार हो और आवश्यक परिवर्तन इसमें किया जाए, ये संघ बहुत सालों से कह रहा है।

  • नीति नियामक संस्थाओं में अंग्रेजी का प्रभुत्व दिखाई देता है। ऐसे में संघ का भारतीय भाषाओं और हिन्दी के प्रति क्या विचार है? संस्कृत के विद्यालय भी घट रहे हैं और इसे महत्व भी नहीं दिया जाता। संघ इस स्थिति को कैसे देखता है? हिन्दी पूरे देश की भाषा कब बनेगी? क्या संस्कृत को हिन्दी से अधिक वरीयता नहीं दी जानी चाहिए?

अब ये जो अंग्रेजी के प्रभुत्व की बात है वह नीति में यानी संस्था में कहां, वह तो हमारे मन में है। आज ये सामान्य अनुभव है कि भारत का उच्च वर्ग जो भारतीय भाषाओं में जो बोल सकता है, हिन्दी भी जानते हैं, लेकिन जब मिलते हैं तो अंग्रेजी में बात करते हैं। तो हम अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देना शुरू करें। भाषा भाव की वाहक होती है, संस्कृति की वाहक होती है। और इसलिए भाषाओं का रहना ये अनिवार्य बात है मनुष्य जाति के विकास के लिए। अपनी भाषा का पूरा ज्ञान हो, किसी भाषा से शत्रुता करने की जरूरत नहीं। अंग्रेजी हटाओ नहीं, अंग्रेजी रखो, यथास्थान रखो। अंग्रेजी का जो डर हमारे मन पर है उसको निकालना। भाषा के नाते किसी भाषा से शत्रुता हम नहीं करते, लेकिन देश की उन्नति के नाते हमारी मातृभाषा में शिक्षा हो, इसकी आवश्यकता है। मेरा अनुभव ऐसा कहता है, हिन्दी ठीक है कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन हिन्दी में काम करना पड़ता है, इसलिए देश में अधिकांश भाग में अन्य प्रांतों के बहुत से लोग हिन्दी सीख रहे हैं। हिन्दी बोलने वाले लोगों को भी दूसरे किसी प्रांत की एक भाषा को सीखना चिाहए। इससे मन मिलाप जल्दी होगा। रही बात संस्कृत के विद्यालय घटने और महत्व नहीं देने की तो, कौन नहीं देता? हम महत्व नहीं देते इसलिए भी सरकार भी नहीं देती। अगर हमारा आग्रह रहे कि अपनी परंपरा का सारा साहित्य लगभग संस्कृत में है तो हम संस्कृत सीखें, हमारे बच्चे सीखें। इस दिशा में संघ के स्वयंसेवक लगे हैं। फिर वरीयता का प्रश्न ही गलत है। भारत की सारी भाषाएं मेरी भाषा हैं। जहां मैं रहता हूं वहां की भाषा बोलता हूं, ये होना चाहिए। अपनी मातृभाषा पूरी आनी चाहिए।

  • लड़कियों व महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संघ की क्या दृष्टि है। संघ ने इस दिशा में क्या-कुछ किया है?

लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दो-तीन बातें करनी पड़ेंगी। पुराने जमाने में जब महिलाएं घर में रहती थीं तो परिवार पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी रहती थी। लेकिन अब महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। तो उनको अपनी सुरक्षा के लिए सजग और सक्षम बनाना पड़ेगा। इसलिए किशोर आयु के लड़के और लड़की दोनों का प्रशिक्षण करना पड़ेगा। किशोरी विकास, किशोर विकास। ये काम संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं क्योंकि महिला असुरक्षित कब हो जाती है, जब पुरुष उसकी ओर देखने की अपनी दृष्टि को बदलता है। हमारी परंपरा है कि अपनी पत्नी छोड़कर बाकी सबको माता के रूप में देखना। ये अपना आदर्श है। उन संस्कारों को पुरुषों में भी जगाना पड़ेगा। महिलाओं को आत्मसंरक्षण की कला सिखाने वाले क्रम भी बढ़े हैं। इसमें भी स्वयंसेवकों ने काम प्रारंभ किया है। बड़ी मात्रा में स्कूल, कॉलेज की छात्राओं को इसका प्रशिक्षण देना और फिर प्रशिक्षण की स्पर्धाएं भी आयोजित करना, ऐसा पिछले वर्ष से उपक्रम शुरू हुआ है। यह देश के सब राज्यों में आगे चलकर शुरू होगा।

 

  • यदि हिन्दुत्व की व्याख्या इतनी ही श्रेष्ठ और सुंदर है, जैसे कि बताई गई तो आज विश्व और भारत के भीतर भी हिन्दुत्व को लेकर आक्रोश और हिंसा क्यों दिखाई देती है? संघ इसके लिए क्या करेगा?

विश्व में हिन्दुत्व को लेकर आक्रोश और हिंसा नहीं है। उलटा है। विश्व में हिन्दुत्व की स्वीकार्यता बढ़ रही है। भारत में जो आक्रोश है वह हिन्दुत्व विचार के कारण नहीं है। विचार को छोड़कर गत 1500, 2000 वर्षों में हमने जो आचरण से एक विकृत उदाहरण प्रस्तुत किया, उसको लेकर। हमारे मूल्यबोध के अनुसार जो आचरण करना चाहिए, वह न करते हुए हम पोथीनिष्ठ बन गए, रूढि़निष्ठ बन गए, हमने बहुत सारा अधर्म, धर्म के नाम पर किया। तो आज की देशकाल परिस्थिति के अनुसार धर्म का आचार, धर्म का रूप बदलकर हमको उस आचरण को करना पड़ेगा, तो सारा आक्रोश विलुप्त हो जाएगा। क्योंकि विचार के नाते हिन्दुत्व का विचार श्रेष्ठ, उदात्त, शुद्ध है। हमको विचार के अनुसार चलने का अभ्यास करना पड़ेगा और संघ यही करता है। इसलिए हिन्दुत्व के मूल्यबोध के आधार पर पहले हिन्दू अच्छा, पक्का, सच्चा हिन्दू बनें। इसके लिए संघ चलता है। हम इन्हीं संस्कारों को प्रत्येक व्यक्ति में भरने का प्रयास लगातार 92 साल से कर रहे हैं। 

  • गाय के प्रश्न पर मॉब लिन्चिंग (भीड़ द्वारा हत्या) क्या उचित है? गोरक्षा कैसे होगी? गोरक्षा कानून लागू नहीं होते हैं। गो तस्करों के हौसले बहुत बढ़े हुए हैं। गोरक्षा करने वालों पर हमले होते हैं। इन सबका क्या समाधान है?

गाय ही क्यों, किसी भी प्रश्न पर कानून हाथ में लेना, हिंसा करना अत्यंत अनुचित और अपराधपूर्ण है। इसलिए इस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और अपराधियों को सजा होनी चाहिए। लेकिन गाय हमारे लिए श्रद्धा और परंपरागत विषय है। इसके अतिरिक्त अपने देश के छोटे किसान जो बहुसंख्या में हैं। उनके अर्थायाम का आधार गाय बन सकती है और ऐसे ही अनेक ढंग से गाय उपकारी है। अब सारी बातें बाहर भी आ रही हैं। ए-2 दूध की बात होती है जो पहले नहीं थी। इन सब बातों को देखते हुए गोरक्षा तो होनी चाहिए और जो संविधान का मार्गदर्शक तत्व है, उसका भी पालन करना चाहिए। लेकिन गोरक्षा केवल कानून से नहीं होती। गोरक्षा करने वाले देश के नागरिक गाय को पहले रखें। गाय को रखेंगे नहीं और खुला छोड़ देंगे तो उपद्रव होगा। इसलिए गोसंवर्धन होना चाहिए। दूसरी बात जो गोरक्षा की बात करते हैं, वे लिन्चिंग करने वालों में नहीं हैं। वे सब समाज की भलाई के लिए काम कर रहे हैं, सात्विक प्रवृत्ति के लोग हैं। पूरा का पूरा जैन समाज इस पर अडिग है। ऐसे ही अच्छी और भक्ति से गोशालाएं चलाने वाले मुसलमान भी अपने देश में बहुत जगह हैं। इन सब लोगों को लिन्चिंग के साथ कभी जोड़ना नहीं चाहिए। इनके कार्य को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, क्योंकि वे अपने देश के सामान्य व्यक्ति के हित का काम कर रहे हैं। आज एक दोमुंहा रवैया दिखाई देता है कि जब गोतस्कर पर हमला होता है लिन्चिंग की आवाज आती है, पर जब गोतस्कर हमला करते हैं, हिंसा करते हैं उस पर कहीं आवाज नहीं होती है। यह प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए। इन सबका समाधान यही है। 

  • क्या कन्वर्जन छल, बल, धन से हो रहा है? क्या इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनना चाहिए। अगर सभी मत-पंथ समान हैं तो संघ कन्वर्जन का विरोध क्यों करता है?

मैं इसे इस तरह कहता हूं कि अगर सभी मत-पंथ समान हैं तो कन्वर्जन की आवश्यकता क्यों है? क्यों आप इधर से उधर ले जाने का प्रयास कर रहे हो। जिसमें जो है वह उसमें पूर्णत: प्राप्त करेगा। जब आप उसको इधर से उधर लाते हो तो आपका उद्देश्य उसको अध्यात्म सिखाना नहीं है। भगवान न तो बाजार में बेचा जाता और न ही जबरदस्ती स्वीकार कराया जाता है। यह सब छल, बल से होता है, जो नहीं होना चाहिए। क्योंकि उसका उद्देश्य मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति नहीं है, दूसरे कुछ उद्देश्य इसमें छिपे हैं। इसलिए संघ वाले ही इसका विरोध क्यों करें, पूरे समाज को कन्वर्जन का विरोध करना चाहिए। 

  • देश के कई हिस्सों में बदलता जनसांख्यकीय स्वरूप और हिन्दू जनसंख्या की घटती वृद्धि दर को संघ कैसे देखता है? क्या जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। 50 साल बाद भारत में हिन्दुओं की स्थिति क्या होगी? जनसंख्या से क्या विकास प्रभावित हो रहा है?

संघ का इसके बारे में प्रस्ताव है और मैं उसी का वर्णन करता हूं। जनसंख्या का विचार जैसे एक बोझ के रूप में होता है- मुंह बढ़ेंगे तो खाने को तो देना ही पड़ेगा। रहने को जगह देनी पड़ेगी, पर्यावरण का उपयोग ज्यादा होगा। लेकिन जनसंख्या काम करने वाले हाथ भी देती है। अभी भारत तरुणों का देश है। 56 प्रतिशत तरुण हैं और हमको बड़ा गर्व है कि दुनिया में सर्वाधिक तरुण भारत में हैं। 30 साल बाद यही तरुण जब बूढ़े हो जायेंगे, तब इनसे ज्यादा तरुणों की संख्या नहीं होगी नहीं तो भारत बूढ़ों का देश हो जायेगा, जैसे आज चीन का है। इसलिये जनसंख्या का विचार दोनों दृष्टि से करना चाहिए। तात्कालिक नहीं एक पचास साल का लक्ष्य मन में लाकर। यह सोचना चाहिए कि कितने लोगोें को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य यह जो गृहस्थ की आवश्यकताएं होती हैं, वह दे सकते हैं? दूसरी बात जनसंख्या पर चर्चा तो हम सब करते हैं लेकिन जन्म देने का काम माताओं को करना पड़ता है। तो वह कितनी सक्षम हैं, कितनी प्रबुद्ध हैं, उनके भरण-पोषण की व्यवस्था कितनी है, इसका विचार करते चलना है। इसके अलावा भौगोलिक संतुलन भी रहना चाहिए। इसको ध्यान में रखकर एक जनसंख्या के बारे में नीति हो और यह समान रूप से सब पर लागू की जानी चाहिए। इसमें एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि जन्मदर एक बात है, अब हिन्दुओं की जन्मदर घट रही है या बढ़ रही है जो भी आप कहेंगे इसके लिए केवल नीति जिम्मेवार नहीं रहती। वह सोच भी रहती है। उचित सोच क्या हो, परिवार में संतान यदि कितनी हैं, यह केवल देश का ही प्रश्न नहीं है। यह एक-एक परिवार का भी प्रश्न है। तो उसका संतुलित विचार कैसे करना है, इसका भी प्रशिक्षण समाज को मिलना चाहिए। लेकिन दूसरी दो बातें हैं। भौगोलिक असंतुलन कन्वर्जन के कारण भी होता है। घुसपैठ के कारण भी होता है। कन्वर्जन पर बोल चुका हूं। घुसपैठ सीधा-सीधा अपने देश की संप्रभुता को आह्वान देने वाला विषय है,इसलिए उसका कड़ाई से बंदोबस्त होना चाहिए। 

 

  • आरक्षण पर संघ का क्या मत है और आरक्षण कब तक जारी रहेगा। क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण को संघ मान्यता देता है। आरक्षण के कार्य में जो समाज में अनेक संघर्ष हो रहे हैंं, उनका हल क्या है? क्या क्रीमीलेयर और अल्पसंख्यकों को आरक्षण मिलना चाहिए?

सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में सबके लिए अवसरों की बराबरी प्राप्त हो, इसलिये आरक्षण का प्रावधान है। संविधानसम्मत सभी आरक्षणों को संघ का पूरा समर्थन है। और आरक्षण कब तक चलेगा, इसका निर्णय वही करेंगे जिन्हें आरक्षण दिया गया है। उनको जब लगेगा कि अब आवश्यकता नहीं है, इसकी तब वह देखेंगे। लेकिन तब तक इसको जारी रहना चाहिए, ऐसा संघ का बहुत सुविचारित और जब से ये प्रश्न आया है तब से मत है। उसमें बदलाव नहीं हुआ है। संविधान में सामाजिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है, संप्रदायों के आधार पर नहीं। क्योंकि अपने यहां सभी समाज कभी न कभी अग्रणी वर्गों में रहे हैं तो उनके आरक्षण का क्या करना। अब और भी जातियां आरक्षण मांग रही हैं, तो उनका क्या करना। इस पर विचार के लिए संविधान पीठ बनी हैं। दरअसल आरक्षण की राजनीति समस्या है। ऐसा संघ को लगता है।

  • अत्याचार निरोधक कानून पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से जो दूसरे वर्गों की ओर से प्रतिक्रिया और आक्रोश निर्मित हुआ है, क्या वह उचित था? क्या सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को संसद को बदलना चाहिए था? सवर्ण और अनुसूचित जाति में जो खाई तैयार हो गई है, क्या वह ठीक है और यह कैसे दूर होगी?

अपने सामाजिक पिछड़ेपन के कारण और अपनी जातिगत अहंकार के कारण एक अत्याचार की परिस्थिति तो है। उस परिस्थिति से निपटने के लिए अत्याचार निरोधक कानून बना। वो ठीक से लागू होना चाहिए। उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। कई बार दुरुपयोग भी होता है। ये भी है। और इसलिये संघ मानता है कि उस कानून को ठीक से लागू करना चाहिए और उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। लेकिन ये होगा कैसे। ये केवल कानून से नहीं होगा। समाज में सद्भाव और समरसता इसमें काम करती है। इसलिए सद्भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है। 

  • हाल में आये फैसले के बाद धारा 377 और समलैंगिकता का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। संघ का इस पर क्या मत है? इसके साथ ही किन्नरों की भी सामाजिक स्थिति एक प्रश्न है। इस पर आपका क्या विचार है?

समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषा मानता है। तो जाति अपने सम्प्रदाय के साथ समाज का एक अंग है। तो ये जो विशिष्टता है, उसके साथ ऐसी कुछ बातें भी समाज में कुछ लोगों में हैं, लेकिन वो हैं तो समाज के अंग। उनकी व्यवस्था करने का काम समाज में करना चाहिए और अपनी परम्परा में अपने समाज में ये काम हुआ है। अब समय बदला है तो अलग प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ेगी। उसको बड़ी चर्चा और समस्या बनाकर हो हल्ला से काम नहीं होगा। ये सहृदयता से देखने की बाते हैं। 

  • अल्पसंख्यकों को जोड़ने के विषय में संघ क्या सोचता है? बंच ऑफ थॉट्स में मुस्लिम समाज को शत्रु रूप में सम्बोधित किया गया है? क्या संघ इन विचारों से सहमत है। संघ को लेकर मुस्लिम समाज में जो भय है, वह कैसे दूर होगा? 

अपने यहां अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। अंग्रेजों के आने के पहले अल्पसंख्यक शब्द का उपयोग नहीं किया गया। हम सब एक समाज के थे। एक मान्यता लेकर चलते थे। हां ये बात जरूर है कि दूरियां बढ़ी हैं। तो मैं विचार करता हूं कि अल्पसंख्यकों को जोड़ना ऐसा नहीं है। अपने यहां समाज के बंधुओं को जो बिखर गये हैं उनको जोड़ने की बात ठीक है। जुड़ने से कल्याण होगा। तो क्या कल्याण नहीं होगा तो एक दूसरे को छोड़ देंगे क्या? अरे भाई हम एक देश की संतान हैं । भाई- भाई जैसे रहे। सब अपने हैं। और रही बात मुस्लिम समाज में भय की तो मैंने कहा कि आप आइये और संघ को अंदर से देखिये। जहां-जहां संघ की अच्छी शाखाएं हैं, वहां पर यदि पास में मुसलमान बस्ती है तो मैं आपको दावे के साथ बताता हूं कि वे वहां अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। इसलिये आप देखिये कि हमारा आह्वान राष्ट्रीयता का है। जो भारत के मुसलमानों की, ईसाइयों की सबकी परम्परा का है उसका है। उसके प्रति गौरव का है। मातृभूमि के प्रति गौरव का है, वही हिन्दुत्व है। बिना कारण भय बनाकर रखना यह ठीक नहीं, एक बार आकर देखिये। बात करके देखिये। संघ के कार्यक्रमों में आकर देखिये। मेरा तो अनुभव है जो-जो आते हैं उनके विचार बदल जाते हैं। आप आइये, देखिये और हमारी कोई बात गलत है या आपके विरोध से प्रेरित है तो फिर हमको पूछिये। लेकिन सही बात आपको पसंद नहीं आएगी तो भी हम बोलेंगे। परम्परा से, राष्ट्रीयता से, मातृभूमि से, पूर्वजों से हम सब लोग हिन्दू हैं। यह हमारा कहना है और यह हम कहते रहेंगे, उस शब्द को हम नहीं छोड़ेंगे। लेकिन इसका मतलब हम आपको अपना नहीं मानते ऐसा नहीं है। हम आपको अपना मानने के लिए ऐसा कह रहे हैं। इसलिए संघ में आकर देखिए। कई बार कुछ बातें परिस्थिति विशेष के संदर्भ में बोली जाती हैं और वे शाश्वत नहीं रहती हैं। गुरुजी के शाश्वत विचार, उनका एक संकलन-'गुरुजी विजन एंड मिशन' प्रसिद्ध हुआ है। इसमें तात्कालिक संदर्भ से आने वाली सारी बातें हटाकर उनके सदाकाल के उपयुक्त विचार रखे गए हैं। उसे पढि़ए। दूसरी बात है समय बदलता है तो संगठन की स्थिति भी बदलती है। सोच भी बदलती है और बदलने की स्वीकृति डॉ. हेडगेवार से मिलती रही है।

  • अनुच्छेद 370 तथा अनुच्छेद 35 ए के सम्बन्ध में संघ का क्या मत है? क्या जम्मू-कश्मीर राज्य का तीन भागों में विभाजन होना चाहिए। घाटी के भटके हुए युवाओं में राष्ट्र भाव जगाने के लिए संघ ने क्या प्रयास किये हैं?

अनुच्छेद 370 और 35 ए के सम्बन्ध में हमारे विचार सर्वपरिचित हैं। हम उनको नहीं मानते और यह नहीं रहना चाहिए, ऐसा हमारा मत है। राज्य के निर्माण, विभाजन आदि की जो बात है, उसके पीछे विचार कौन सा रहता है। देश की अखण्डता, एकात्मता, सुरक्षा और प्रशासन की सुलभता का। अब इसको देखकर जब लगेगा कि तीन राज्य होने चाहिए तो उस समय का शासन निर्णय करे। अगर लगता है कोई जरूरत नहीं तो रहे। लेकिन वहां की जो परिस्थिति है, उसमें इन राज्यों को भारत के साथ और भारत की कुल मिलाकर एकात्मता, अखण्डता, सुरक्षा के लिए क्या करना चाहिए इसका विचार करना चाहिए और यह विचार शासन-प्रशासन करेगा। आपने बिल्कुल सही पूछा कि भटके युवाओं में कुछ करना चाहिये तो मैं बताता हूं कि हम कर रहे हैं। हमारे से निकले स्वयंसेवक समाज के लिए जो-जो आवश्यक है, वह करने के लिए दौड़ते रहते हैं। ऐसे युवकों ने वहां पर कार्य चलाये हैं। एकल विद्यालय चलाये हैं। उसमें राष्ट्रीयता की बात होती है, उसमें वंदेमातरम्, जनगणमन भी होता है। इसमें 26 जनवरी, 15 अगस्त भी मनाया जाता है। और वहां के विद्यालयों में आने वाले छात्र और अभिभावकों दोनोें का बहुत अच्छा सहयोग और समर्थन हमको मिलता है। इसका फल आने में समय लगेगा। लेकिन हमने इसमें कुछ किया नहीं है ऐसा नहीं है। वैसे काश्मीर के सामान्य समाज का शेष भारत के साथ मिलना- मिलाना भी होना चाहिए। 

  • आंतरिक सुरक्षा एवं आतंकवाद के मुद्दे पर संघ कैसे समाधान देखता है?

कानूनों के अमल में सुरक्षा को खतरा उत्पन्न करने वाले, कानून तोड़ने वाले, देशद्रोह की भाषा करने वालों की तरफ से अपने ही समाज से उनका समर्थन करने वाले खड़े न हों, यह भी आवश्यकता है। तो समाज का मन ऐसा बने कि ऐसी बात करने वाले आइसोलेट हो जायें। यह भी साथ साथ होना चाहिए। यह दोनों बात जब होती हैं तो फिर आन्तरिक सुरक्षा मजबूत रहती है। 

  • समान नागरिक संहिता के सम्बन्ध में संघ का क्या मत है।

संविधान का मार्गदर्शक तत्व तो है और इस दृष्टि से इसको कहा जाता है कि एक देश के लोग एक कानून के अंतर्गत रहें। एक कानून के अंदर रहने का मन बने समाज का। समान नागरिक संहिता की जब चर्चा होती है तो इसका अर्थ लोग हिंदू और मुसलमान से लगाते हैं। लेकिन केवल इतना नहीं है। सबकी परम्पराओं में कुछ न कुछ परिवर्तन आयेगा। हिन्दुओं की भी। ध्यान में रखकर किसी एक के लिए समाज का मन बने ये प्रयास होना चाहिए और वास्तव में देश की एकात्मता को समान नागरिक संहिता की बात पुष्ट करती है। 

  • नोटा के प्रावधान को संघ किस तरह देखता है? संविधान के अनुसार यदि सभी समान हैं तो अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान क्यों? क्या भारत में भी अमेरिका और रूस की तरह राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली होनी चाहिए?

नोटा पर मेरा मानना है कि जो उम्मीदवार उपलब्धता में सबसे अच्छा हो उसे चुनें। नोटा का प्रयोग बिल्कुल नहीं करें। संविधान सभा में चर्चा चली तो कुछ, जिन्हें आज हम अल्पसंख्यक कहते हैं, उनके प्रतिनिधियों में भी यह बात चली थी कि अल्पसंख्यक शब्द निकाल दिया जाए। क्योंकि इसी पर देश का विभाजन हुआ था। इसलिए अब आगे कोई और बंटना नहीं चाहता। लेकिन मुझे लगता है कि ये बात संविधान निर्माताओं के मन में आती होगी कि जिनकी संख्या ऐसी कम है, उनको जरा विशेष अवसर दिये जायें। इसलिये ऐसा प्रावधान किया गया। लेकिन जैसा मैं कह रहा हूं कि अल्पसंख्यक शब्द बहुत संदिग्ध है तो कश्मीर में अल्पसंख्यक कौन है? इसी तरह देश में हर जगह अलग अलग स्थिति है। ऐसी बातें निकालते हैं तो फिर से मनमुटाव शुरू हो जाता है। समाज में ये प्रयोग चलना चाहिए कि कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक नहीं है। हम सब एक-दूसरे के भाई-भाई हैं और अलग-अलग प्रकार रहना ये हमारी विशेषता है उसको साथ लेकर चलें। भारत की प्रणाली भारत जैसी हो, अमेरिका जैसी क्यों हो? भारत के लोग मिलकर जो तय करते हैं, वैसा हो, क्योंकि कैसी प्रशासन की पद्धति लागू करने से मैं उसका लाभ लेकर अपने जीवन को बना सकता हूं यह भारत का सामान्य व्यक्ति जानता है। उससे बात करनी चाहिए और जो साझा सहमति बनती है, उस पर अमल करना चाहिए। 

  • यदि संघ और राजनीति का सम्बन्ध नहीं है तो भाजपा में संगठन मंत्री हमेशा संघ ही क्यों देता है? क्या संघ ने दूसरे दलों को या अन्य संगठनों को आज तक कभी समर्थन दिया है?

संघ से जो संगठन मंत्री मांगते हैं, उनको देता है। अभी तक और किसी ने मांगा नहीं है। मांगेगे तो विचार करेंगे। काम अच्छा है तो जरूर देंगे। क्योंकि हम किसी दल का समर्थन नहीं करते। हां, नीति का समर्थन जरूर किया है और हमारी नीति का समर्थन करने का लाभ जैसे हमारी शक्ति बढ़ती है, वैसे राजनीतिक दलों को मिलता है। जिसको इसका लाभ मिलता है वे ले जाते हैं और जो लाभ नहीं ले जा पाते वे रह जाते हैं। 

  • ग्राम विकास, स्वदेशी आधारित अर्थनीति और बेरोजगारी पर संघ की क्या राय है? क्या 2014 के बाद हुए विकास को संघ अपने विचारों के अनुरूप पाता है?

ग्राम विकास का काम तो हम करते ही हैं। गांव का विकास होना ही चाहिए। लेकिन वहां की जो वृत्ति है वहां प्रकृति के प्रति मित्रता है, उसमें परस्पर सहयोग है, सद्भाव है ये सारी बातें कायम रखकर गांव का विकास होना चाहिए। गांव के विकास में भारत का विकास है, ऐसा हम मानते हैं और ग्राम विकास के लिए अपने स्वयंसेवक काम भी करते हैं। संघ के प्रयासों से हमारे देश में इस क्षेत्र में जो दिखने लायक काम हैं उनकी संख्या 500 के आसपास पहुंची होगी और हम इसे बढ़ा रहे हैं। स्वदेश आधारित अर्थनीति सबकी ही होनी चाहिए। क्योंकि अर्थनीति में अर्थसुरक्षा स्वावलंबन के आधार पर होती है तो जब तक हम स्वेदशी का अनुगमन नहीं करेंगे, तब तक वास्तविक विकास होगा ही नहीं। आज दुनिया पास में आई है और पास में नहीं थी तब से अंतरराष्ट्रीय व्यापार चलता है और वह लेन-देन के तत्वों पर ही चलता है और वह तो चलेगा ही चलेगा। लेकिन लेन-देन में केवल देन-देन ही हमारे तरफ आए और लेन-लेन न आए, ऐसा नहीं। हमारी कोशिश रहेगी कि लेन-देन में अपनी शर्तें मनवाएंगे। अब 2014 के बाद क्या विकास हुआ है, तो आप यह विचार कीजिये। लेकिन मुझे लगता है कि हां उस दिशा में विकास हुआ है, क्योंकि समाज में हवा बदली है। आज हमारे देश के ज्यादातर लोग समझ रहे हैं कि हम अपने देश में चीजें बनायेंगे। आज हमारे देश की कंपनियां स्पर्द्धा करने के लिए आगे जा रही हैं। उद्यमिता बढ़ी है,कौशल प्रशिक्षण बढ़ा है। आज बहुत से लोग विदेशों से शिक्षा लेकर वापस आकर भारत में काम कर रहे हैं। खेती में काम कर रहे हैं। कौशल प्रशिक्षण में काम कर रहे हैं। तो कुछ आशा बनी है। देश अपने पैरों पर खड़ा करना है, इसलिये तो हुआ है। इसलिए आज की तारीख में यह तो कह सकते हैं कि हां इस दिशा में अपने देश ने कदम तो बढ़ाये हैं।

  • आस्था का प्रश्न कानूनी मामला बना है। क्या राम मंदिर मुद्दे पर शाहबानो प्रकरण की भांति अध्यादेश लाया जा सकता है?

अब अध्यादेश का मामला सरकार के पास है और आयोजन का मामला रामजन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति के पास है। दोनों में मैं नहीं हूं। तो आन्दोलन में क्या करना है, वह उच्चाधिकार समिति है वह तय करती है। वह सलाह पूछेगी तो मैं बताऊंगा। हां, जरूर संवाद करना चाहिए ऐसा मेरा मत है। करते भी हैं। अध्यादेश लाना है कि नहीं लाना, कानूनन ला सकते हैं क्या? अध्यादेश लाने के बाद उसको चुनौती नहीं मिलेगी, यह पक्का है क्या? चुनौती मिलने के बाद यह कहा जाएगा कि चुनाव के चलते यह काम किया गया है? ये सब उनके सोचने की बातें हैं। संघ के स्वयंसेवक और सरसंघचालक के नाते और रामजन्मभूमि आन्दोलन के हिस्से के नाते मेरा मानना है कि रामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर जल्दी बनना चाहिए। राम अपने देश के बहुसंख्य लोगों के लिए भगवान हैं, लेकिन वह केवल भगवान नहीं हैं। अपने देश में अन्य लोग भी ऐसे हैं जो भगवान को नहीं मानते, लेकिन उनको आचरण की भारतीय मर्यादा के जनक मानते हैं। उनको इमामे-हिन्द मानते हैं। इसलिये समाज के सभी वर्गों में एक आस्था जुड़ी है। जहां राम की जन्मभूमि थी, बहुत राम के मंदिर हैं और बहुत टूटे भी हैं लेकिन सबकी बात नहीं उठाते। जहां उनका जन्म हुआ वहां पहले मंदिर था और अब मंदिर होना चाहिए। और अगर ये हो गया तो हिन्दू और मुसलमानों के बीच झगड़े का एक बड़ा कारण समाप्त हो जायेगा। यह सद्भावना से हो गया तो जो मुसलमानों के ऊपर बार-बार उंगली उठती है, उसमें बहुत कमी आ जाएगी। देश की एकता और देश के आदर्शों को पुष्ट करने वाली बात है और करोड़ों लोगों की आस्था का ये सवाल है। तो इसको इतना लटकना ही नहीं चाहिए था। देश हित की बुद्धि से विचार होता, राजनीति इसमें नहीं आती, तो इसको पहले ही बन जाना था। खैर देर आए दुरुस्त आये। श्री रामजन्मभूमि में भव्य राममंदिर का निर्माण जिस किसी उपाय से हो सकता है, शीघ्र होना चाहिये। 

  • पर्यावरण के नाम पर हिंदू त्यौहारों में परंपराओं का विरोध करने का जो प्रचलन चल पड़ा है, इस पर संघ का क्या मत है?

ऐसे किसी नाम पर किसी बात को करना यह तो गलत ही है न। जो करना है वह सीधा सीधा करना चाहिए। पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों का विरोध तो सही है, बहुत से लोगों के बहुत से त्यौहार ऐसे हैं। लेकिन वास्तव में कोई पर्यावरण का प्रश्न है तो चर्चा होनी चाहिए। लेकिन केवल हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही, क्यों? अगर हिन्दुओं के किसी त्योहार से पर्यावरण को खतरा होता है तो हमारे यहां सुधार की परम्परा है। और इस पर मिलकर विचार करना चाहिए, तो लोग मानेंगे भी। लेकिन जिस ढंग से यह किया जाता है, वह ढंग मन में शंकाएं पैदा करता है।

  • संघ में कहा जाता है कि सूचना मिली तो सोचना बंद। क्या यह तानाशाही नहीं है? संघ में सरसंघचालक का चुनाव क्यों नहीं होता है? क्या संघ का पंजीकरण है? क्या संघ के हिसाब-किताब का ऑडिट होता है? हिन्दू धर्म की रक्षा में सिखों का बड़ा योगदान रहा है, लेकिन संघ केवल महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज का ही गुणगान करता है ऐसा क्यों है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युवाओं को दिशा देने के लिए क्या कर रहा है?

हम सिख बंधुओं का गौरवमयी इतिहास के कारण आदर करते हैं और विशेष संत मानकर उनके गुरुओं को देखते हैं यह हमारा मन है। गुरु सिख पंथ में हो गए परंतु वे देश दुनिया के लिए, हम सबके गुरु हैं। हम प्रात:स्मरण में अन्य श्रेष्ठ ग्रंथों के साथ गुरुग्रंथ साहिब का नित्य स्मरण करते हैं। अब संघ पंजीकृत क्यों नहीं है, क्योंकि जब संघ शुरू हुआ था तो स्वतंत्र भारत की सरकार नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद के कानूनों में हर एक संस्था का पंजीकरण करना चाहिये था। संघ का एक स्टेटस है, उसके तहत हम चल रहे हैं। उस स्टेटस के आधार पर कानूनन कर नहीं देते हैं। इसलिए सरकार हमारा हिसाब-किताब नहीं मांगती है। लेकिन हम एक-एक पाई का हिसाब रखते हैं। प्रतिवर्ष ऑडिट करते हैं और इसमें कोई नरमी नहीं बरतते हैं। अगर सरकार ने कभी हिसाब मांगा तो हमारा हिसाब तैयार है। हम कानून को मानकर चलने वाले लोग हैं। हमारा ऑडिट आंतरिक होता है, इसके लिए हम चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करते हैं। सारा व्यवहार बैंक खाता के द्वारा चलता है। अब सरसंघचालक का चुनाव क्यों नहीं होता, क्योंकि सरसंघचालक डॉ़ हेगडेवार रहे। उनके बाद गुरुजी जैसे लोग रहे। इसलिए वह श्रद्धा का स्थान है। मेरे बाद सरसंघचालक कौन होगा, यह मेरी मर्जी पर है। मैं कब तक सरसंघचालक रहूंगा, यह भी मेरी मर्जी पर है। लेकिन मैं ऐसा हूं तो संघ ने एक होशियारी बरती कि मेरा अधिकार संघ में क्या है, कुछ नहीं है। मैं केवल मित्र, गाइड एंड फिलॉसफर हूं। सरसंघचालक को और कुछ करने का अधिकार नहीं है। संघ का चीफ एग्जीक्यूटिव अधिकारी सरकार्यवाह है। उसके हाथ में सब अधिकार हैं, वो अगर मुझे कहेगा कि ये बंद करो और तुरंत नागपुर चलो तो अभी मुझे उठकर जाना पड़ेगा। हर तीन साल में सरकार्यवाह का विधिवत चुनाव होता है। संघ ने सरकार को अपना लिखित संविधान दिया तब से आज तक हमारा एक भी चुनाव, एक दिन भी देरी से नहीं हुआ। शाखाएं प्रांतों को प्रतिनिधि बनाती हैं और अन्य स्तर के संघचालकों का चुनाव जिला और क्षेत्र से होता है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि हर तीन साल में सरकार्यवाह को चुनते हैं। सबसे नियमित चुनाव वाला संगठन दुनिया में शायद संघ ही है। जब संघ पर प्रतिबंध था, उस समय चुनाव का वर्ष आपातकाल में आया था। उस साल चुनाव नहीं हुए, लेकिन प्रतिबंध हटने के बाद सबसे पहले हमने चुनाव ही करवाया। इसके अलावा सूचना मिली तो सोचना बंद ये बात सही है। लेकिन सूचना मिलने के पहले का मामला इसमें नहीं है। सूचना बहुत चर्चा के बाद ही मिलती है। मैं जो बोल रहा हूं वह संघ की सहमति बोल रही है। यही संघ की पद्धति है। लोकतंत्र का सार तत्व है सर्वसहमति। जैसे अपना संविधान बना, उसी तरह संघ में हर बात सर्वसहमति बनाकर होती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि सूचना हो गई, सोचना बंद। किसी आदमी को कहो आप वो करेगा क्या, नहीं करेगा। ये हो नहीं सकता, सोचना बंद नहीं कर सकते आप। कब कर सकते हैं, जब सबका विचार लेकर एक समन्वित सर्वसहमति बनी रहे।

 साभार:- पाञ्चजन्य