विजयादशमी उत्सव, नागपुर में मुख्य अतिथि कैलाश सत्यार्थी जी का संबोधन

दिंनाक: 22 Oct 2018 16:00:59

ऊँ अग्ने नय सुपथा राये, अस्मान् विष्वानि देव वयुनानि विद्वान्.

युयोध्यस्म्ज्जुहु राणमेनो भूयिष्ठां ते नम


हे अग्नि स्वरूप परमात्मा हमें सही रास्ते पर चलाएं. ताकि हम अच्छे कार्य करते हुए संसार के भौतिक और आध्यात्मिक सुखों की प्राप्ति कर सकें. हमें कुटिलता और बुराई से दूर रखें.


मैं सबसे पहले आप सभी को विजयादशमी पर्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई देता हूं. यह पर्व सिर्फ रावण पर राम की विजय का दिन नहीं है, बल्कि अहंकार पर विनम्रता की, अनीति पर नीति की और क्रूरता पर करुणा की जीत का उत्सव है. यह सत्ता, धन और शक्ति के अहंकार में चूर एक अत्याचारी शासक पर सिंहासन को ठोकर मारकर वनवासी बने तपस्वी राम और उनके नेतृत्व में भारत के जंगलों, पहाड़ों और गांवों में रहने वाले दबे-कुचले लोगों की जीत का दिन है.


आज आपने मुझे अपने स्थापना दिवस पर यहां आमंत्रित करके भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व के करोड़ों वंचित और शोषित बच्चों की तरफ सम्मान, प्रेम और करुणा का हाथ बढ़ाया है. मैं उन सबकी तरफ से आपका हृदय से आभारी हूं.


आज से लगभग 39 साल पहले एक परेशान पिता वासल खान ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी थी. गुलामी में पैदा हुई उसकी 15 साल की बेटी साबो वेश्यालय में बिकने वाली थी. तब मैं दिल्ली से एक पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करता था. वह उसमें अपनी शिकायत छपवाकर मदद मांग रहा था. उससे बात करते वक्त मेरे मन में विचार आया कि यदि वह मेरी बहन या बेटी होती तो उसे बचाने के लिए मैं एक पल का भी इंतजार नहीं कर सकता था. मैं जानता था कि भारत का संविधान गुलामी की इजाजत नहीं देता. इसीलिए मैं कुछ मित्रों को लेकर वासल खान के साथ साबो को छुड़वाने पहुंच गया. वहां से पिटाई खाकर खाली हाथ वापस लौटना पड़ा. हमने अदालत का दरवाजा खटखटाया और कुछ दिनों के भीतर ही साबो सहित 36 बंधुआ मजदूरों को मुक्त करा दिया.

न्यायालय से लौटते वक्त मुझे बच्चों के चेहरों पर आजादी की मुस्कान में और मानवता पर विश्वास खो चुकी मांओं की आंखों से झरते खुशी के आंसुओं को देखकर ईश्वर की अनुभूति हुई थी. तब यह भी अहसास हुआ कि मैं भला किसी को मुक्त कराने वाला कौन होता हूं. शायद इसी बहाने परमात्मा मुझे भीतर से मुक्त कर रहा है. बच्चों की मजदूरी और गुलामी की बुराई पूरी दुनिया में फैली थी. परंतु इसके विरुद्ध कहीं कोई अभियान नहीं चलता था. यह मेरी मातृभूमि की मिट्टी, पानी और हवाओं में बसी अंतर्निहित शक्ति ही थी, जिसने मुझ जैसे साधारण व्यक्ति को एक विश्वव्यापी आंदोलन चलाने की प्रेरणा और शक्ति दी.

पिछले 20 वर्षों में ही दुनिया में बाल मजदूरों की संख्या 26 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह गई है. लेकिन मुझे अफसोस है कि आज भी भारत में हमारी बेटियों को जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदा-बेचा जा रहा है. मैंने ऐसी कई बेटियों को गुलामी से मुक्त कराया है, जो छूटने के बाद भी अपने माता-पिता के गले से लिपटकर रोने का साहस नहीं जुटा पातीं. उन्हें लगता है कि बलात्कार और यौन शोषण से उनका शरीर और आत्मा मैले हो गए हैं. बहनों और भाईयो, हमारे महान देश में हर घंटे में चुराए जाने वाले 8 बच्चे, यौन शोषण से पीड़ित 4 बच्चे और बलात्कार के शिकार होने वाले 2 बच्चे भारत माता के नहीं, तो किसके बेटे-बेटियां हैं. हमें गर्व है कि हम गौतम, कपिल, कणाद, अनुसूईया, सावित्री, सीता, लक्ष्मीबाई, बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गांधी, भगत सिंह, सुभाष और अशफाक उल्ला की संतानें हैं. मैं आपसे पूछता हूं, सम्पूर्ण राष्ट्र से पूछता हूं कि भारत माता के सिंह सपूतो, तुम कब तक उदासीनता, तटस्थता और भय के नींद में सोते रहोगे?

दुनिया में लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं कि आपका देश तो समस्याओं की खदान है. उन्हें हर बार मेरा एक ही जवाब होता है. भले ही भारत में सौ समस्याएं हैं, लेकिन भारत माता एक अरब समाधानों की जननी है.

मैं अपने बचपन में परिवार के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में खूब भाग लेता था. हम सत्यनारायण की कथा और रामचरित मानस के अखंड पाठ के बाद पंचामृत बनाकर चढ़ाते और बांटते थे. आज मैं बड़ी विनम्रता से भारत माता के चरणों में एक पंचामृत समर्पित कर रहा हूं. मैं इस पंचामृत में संवेदनशील भारत, समावेशी भारत, सुरक्षित भारत, स्वावलंबी भारत और स्वाभिमानी भारत के निर्माण का सामर्थ्य देखता हूं.

संवेदनशीलता अथवा करुणा के बगैर किसी भी सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता. करुणारहित राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज बिना आत्मा के शरीर की तरह होते हैं. एक दूसरे की पीड़ा की अनुभूति और उसे दूर करने की इच्छाशक्ति और प्रयास के बगैर सुख और शान्ति कायम नहीं किए जा सकते.

आधुनिक विश्व में रोबोट, कम्प्यूटरों की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑग्मेंटेड तथा वर्चुअल रियालिटी बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. इनका फायदा भी हो रहा है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगले 20-30 सालों में यह टेक्नोलॉजी कहां ले जाएगी? शायद शिक्षकों, डॉक्टरों, मार्गदर्शकों और प्रेरकों की भूमिका नाममात्र की रह जाए. स्कूलों, अस्पतालों, बाजारों आदि के साथ-साथ हमारे आपसी रिश्ते भी सिकुड़ कर रह जाएंगे. ऐसे में पारिवारिक मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और करुणा के बगैर मानव जाति का क्या होगा? मेरे विचार से तब भौतिक सुख-सुविधाओं और बाजार के दर्शन से संचालित देशों को भारत की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ेगी. इसलिए हमें अभी से अपने भीतर संवेदनशीलता को विकसित करना चाहिए. पश्चिम ने बाजार, व्यापार, उपभोक्ता, उत्पादन और तकनीक का वैश्वीकरण सिखाया जिसकी गर्म आंधी में दुनिया झुलस उठी है. हमें भारत की धरती से करुणा के वैश्वीकरण की शीतल बयार चलानी चाहिए.

पंचामृत का दूसरा तत्व है, समावेषिता. भारत विविधताओं का देश है. मत-मजहबों, पूजा-पद्धतियों, खान-पान, भाषा, वेशभूषा, विचारधाराओं की विविधता एक गुलदस्ते में सजाए गए रंग-बिरंगे फूलों की तरह है. हमारे अलावा दुनिया में कोई और देश ऐसा नहीं है. समावेशिता और सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की आत्मा है. इसके बगैर विविधता में एकता नहीं रह सकती.

ऋग्वेद कहता है,

संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, संवोमनांसि जानताम्.

देवाभागम् यथापूर्वे संजानानामुपासते.’’

हम सब साथ-साथ चलें. सब प्रेम से मिलकर आपस में बातचीत करें. सब मिलकर विचार-विमर्श करें. हमारे पूर्वजों की तरह हम भी साथ मिल-बैठकर सबके लिए ज्ञान का सृजन करें. उपनिषद् तो यहां तक कहता है ’’ईशा वास्यम्दिम् सर्वम् यत किंच जगत्याम् जगत.’’ यानी संसार में सभी जगह और हर चीज में ईश्वर का निवास है.

तीसरा तत्व सुरक्षा है. समाज में सुरक्षा की व्यवस्था, वातावरण और विश्वास के बगैर किसी भी राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है. सीमाओं की सुरक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही आंतरिक सुरक्षा.

एक 15 साल की बेटी के शब्द मेरे कानों में पिघले हुए शीशे की तरह भर गए थे. पुलिस थाने से लौट रही वह बच्ची फूट-फूटकर रो रही थी. उसने कहा, मैं कल रात को बहुत थकी हुई थी. मैंने अपने पिता से मिन्नतें की थीं कि पापा प्लीज आज के लिए मुझे माफ कर दीजिए. लेकिन वे नहीं माने. इसीलिए मुझे उनके खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ी. यह एक बाप द्वारा अपनी बेटी से किया गया बलात्कार नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का, हमारी महान संस्कृति का और सदियों से चले आ रहे पारिवारिक मूल्यों का बलात्कार था. हम शक्तिरूपा दुर्गा, ज्ञान की देवी सरस्वती और धन की देवी लक्ष्मी को पूजने वाले देश हैं. फिर चरित्र के ऐसे पतन को कैसे स्वीकार या सहन कर सकते हैं?

कुछ महीनों पहले 12 साल के एक भाई ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी 7 साल की बहन के साथ सामूहिक बलात्कार किया. उसके एक दिन पहले उन लड़कों ने पोर्न फिल्म देखी थी.

ऑनलाइन पोर्नोग्राफिक फिल्मों का काला धंधा धड़ल्ले से चल रहा है. मैं लगातार इस अपराध के खिलाफ कानूनी पाबंदी की मांग करता रहा हूं. मैंने पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान कई सरकारों से मिलकर एक अंतर्राष्ट्रीय संधि की तैयारी भी शुरू की है.

हमारे बच्चे और महिलाएं घरों, स्कूलों, काम-काज के स्थानों, मोहल्लों और सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षित नहीं हैं. बालिका गृहों को चलाने वाले बच्चियों से बलात्कार और हत्याएं कर रहे हैं. बाल कल्याण और संरक्षण के ठेकेदार नौनिहालों को बेच देते हैं. लड़कियां छेड़खानी के कारण स्कूल जाना बंद कर देती हैं और हम डर के मारे बोलते तक नहीं. मैं इसे भारत माता का अपमान मानता हूं. चुप्पी सिर्फ कायरता नहीं, हिंसा होती है. पिछले वर्ष हमने ‘सुरक्षित बचपन, सुरक्षित भारत’ बनाने के संकल्प के साथ 12,000 किलोमीटर की भारत यात्रा की थी. कन्याकुमारी के विवेकानंद शिला स्मारक से शुरू हुई उस यात्रा में 12,00,000 लोगों ने शामिल होकर भारत को सुरक्षित बनाने की शपथ ली थी. हमारा यह यज्ञ अभी भी जारी है. वेद के मंत्रद्रष्टा ऋषि ने चेताया था, ‘अभयम मित्रादभयम् अमित्रादभयं ज्ञातादभयं परोक्षात्.’ हम दुश्मनों से न डरें और दोस्तों से भी न डरें. सामने के खतरों से न डरें और अनजाने खतरों से न डरें.

पंचामृत का चौथा तत्व, स्वावलंबी भारत है. सच है कि आज की दुनिया में सभी देश उद्योग, बाजार, तकनीक में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन और सामाजिक संतुलन के लिए स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता बहुत जरूरी है. हमारा देश कृषि प्रधान और मंझोले तथा कुटीर उद्योगों वाला देश है. हम विदेशी पूंजी निवेश और गिने-चुने उद्योगपतियों के और ज्यादा अमीर बन जाने से स्वावलंबी नहीं बन सकते. हमें किसानों, श्रमिकों और खुदरा व्यापारियों को सशक्त बनाना होगा. हमारे देश में अभी तक भुखमरी खत्म नहीं हुई है. करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. सबके लिए ठीक-ठीक इलाज की व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण, उपयोगी और रोजगारपरक शिक्षा हमारी बड़ी चुनौतियां हैं. भारत को पुनः जगतगुरु और सोने की चिड़िया बनने की प्रतिष्ठा हासिल करनी है, तो देश में शिक्षा से वंचित साढ़े आठ करोड़ बच्चों को अच्छी पढ़ाई उपलब्ध करानी पड़ेगी. अर्थशास्त्रियों के लिए विकास का पैमाना प्रति व्यक्ति आय, जीडीपी आदि कुछ भी हो, लेकिन मेरा पैमाना अलग है. वह दूर-दराज के गांवों के खेत-खलिहान या खदान में गुलामी और असुरक्षा की शिकार मेरी दलित और आदिवासी बेटी की खुशहाली है.

ऋग्वेद का पहला मंत्र है, ’’अग्निमीळे पुरोहितम्. यज्ञस्य देवमृत्विजम्.’ होतारं रत्नधातमम्.’’ समाज की भलाई चाहने वालो, आओ. हम ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करें. मिल-जुलकर समय की आवश्यकता के अनुसार अपने-अपने सर्वश्रेष्ठ की आहुतियां दें. और उससे उत्पन्न ज्ञान को सभी की समृद्धि में बदल दें.

राष्ट्र निर्माण का पांचवां तत्व स्वाभिमान है. सैकड़ों सालों की विदेशी गुलामी भारत की आत्मा को तो नहीं मार सकी, परंतु मन में हीनता और मानसिक दासता का भाव जरूर छोड़ गई. हम आज तक उससे नहीं उबर सके हैं. इसी हीनभावना के कारण अपनी भाषा, वेशभूषा, खान-पान, और शिक्षा के प्रति तिरस्कार बढ़ रहा है. दुर्भाग्य से इसे दूर करने के अवैज्ञानिक प्रयास या तो हमें पुरातनपंथी बनाते हैं या फिर झूठा अहंकार पैदा कर रहे हैं.

अपनी महान संस्कृति के प्रति स्वाभिमान पैदा करने के लिए हमें सांस्कृतिक मूल्यों की डोर को थामना होगा. मेरे विचार से भारत की सनातन संस्कृति के तीन प्रमुख दार्शनिक पहलू हैं. पहला, शाश्वतता, यानी न तो कभी पैदा होने और न कभी मरने का भाव. दूसरा सार्वभौमिकता, यानी हम किसी स्थान और समय की सीमा से खुद को नहीं बांधते. इसीलिए हजारों साल पहले हमारे ऋषि ’’वसुधैव कुटुम्बकम’’ का संदेश दे सके. तीसरा समग्रता, हम समाज को और संसार को टुकड़ों में बांटकर नहीं देखते.

इसीलिए हमारी संस्कृति तालाब में जमा हुए पानी की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी नदी की अविरल धारा की तरह है, जिसमें समय-समय पर स्वतःस्फूर्त, झरने निकलते रहते हैं. हमारे अंदर आत्म सुधार करते रहने की अनोखी क्षमता है.

मैं भारत की तरूणाई का आह्वान करता हूं. किसी के पिछलग्गू, याचक या आलोचक बने रहने की बजाय अपनी इस सांस्कृतिक ताकत को पहचानो. आओ, हम अभी से, संवेदनशील भारत, समावेशी भारत, सुरक्षित भारत, स्वावलंबी भारत और स्वाभिमानी भारत बनाने का संकल्प लें. इसकी शुरुआत हर बच्चे को स्वतंत्रता, सुरक्षा, शिक्षा, संस्कार और स्वास्थ्य सुनिश्चित करके की जाए. कल मेरे बाल आश्रम के बच्चे रामलीला मंचन के बाद रावण का दहन करेंगे. वे एक प्रतियोगिता करके समाज की दस बुराइयों को चुनकर रावण के पुतले पर बने दस सिरों पर लिखेंगे और गांव के सैकड़ों लोगों के साथ मिलकर उन बुराइयों को खत्म करने की शपथ लेंगे.

मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा मित्रों से प्रार्थना करता हूं कि वे भारत के वर्तमान और भविष्य को बचाने में अगुवाई करें. गांव-गांव में फैली संघ की शाखाएं, बच्चों के लिए सुरक्षाचक्र बनकर यदि इस एक पीढ़ी को बचा लें, तो बाद में आगे आने वाली सभी पीढ़ियां खुद को बचा लेंगी.

समुद्र के किनारे निराश होकर बैठे जब हनुमान अपनी पहचान तक भूल गए थे. तब जामवंत ने उन्हें याद दिलाया था, ‘पवनतनय बल पवन समाना, और का चुप साध रहा बलवाना.’ इसी ललकार का परिणाम आज विजयदशमी है. मैं भी जामवंत की तरह आपको अपनी ताकत का स्मरण करा रहा हूं. हजारों साल पहले वेदों के ऋषियों की ऐसे ही एक आह्वान को फिर से याद दिला रहा हूं – ‘वयमं राष्ट्रे जाग्रयामः पुरोहितः.’ ऐ समाज के हितचिंतकों, उठो और सम्पूर्ण राष्ट्र को जगा दो.

 

उक्तिं विधेम..