24 अक्टूबर(शरद पूर्णिमा) - जन्म दिवस / महर्षि वाल्मीकि जयंती

दिंनाक: 24 Oct 2018 16:08:10


महर्षि वाल्मीकि वैदिक काल के महान ऋषियों में माने जाते हैं। आप संस्कृत भाषा के आदि कवि और आदि काव्य 'रामायण' के रचयिता के रूप में सुप्रसिद्ध हैं।

महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण (आदित्य) से इनका जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है, इसलिए इन्हें प्राचेतस् नाम से उल्लेखित किया जाता है। उपनिषद के विवरण के अनुसार यह भी अपने भाई भृगु की भांति परम ज्ञानी थे।

मनुस्मृति के अनुसार प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि भी इन्हीं के भाई थे।

एक बार ध्यान में बैठे हुए वरुण-पुत्र के शरीर को दीमकों ने अपना घर बनाकर ढक लिया था। साधना पूरी करके जब यह दीमकों के घर, जिसे वाल्मीकि कहते हैं, से बाहर निकले तो लोग इन्हें वाल्मीकि कहने लगे।

वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि कहते हैं कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। मनुस्मृति में प्रचेता को वशिष्ठ , नारद , पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। बताया जाता है कि प्रचेता का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्माजी के पुत्र थे। यह भी माना जाता है कि वाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे और उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनके भी दो नाम 'अग्निशर्मा' एवं 'रत्नाकर' थे।

किंवदन्ती है कि बाल्यावस्था में ही रत्नाकर को एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया और प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण किया। जिस वन प्रदेश में उस भीलनी का निवास था वहाँ का भील समुदाय वन्य प्राणियों का आखेट एवं दस्युकर्म करता था।

महर्षि वाल्मीकी का जीवन

वाल्मीकि ॠषि के जन्म को लेकर भी उसी प्रकार का विवाद है जैसा संत कबीर के बारे में है। वाल्मीकि का अर्थ चींटियों की मिट्टी की बांबी है। जनश्रुति के अनुसार एक भीलनी या निषादनी ने एक एक चींटियों की बांबी पर एक बच्चा पड़ा पाया। वह उसे उठा ले गई और उसका नाम रख दिया वाल्मीकि।

विश्व का पहला महाकाव्य रामायण लिखकर उन्होंने आदि कवि होने का गौरव पाया। रामायण प्रथम महाकाव्य है जो भगवान श्रीराम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को काव्य के रूप में सुनाता है। ज्ञान प्राप्ति के बाद महर्षि वाल्मीकि ने रामायण ग्रंथ की रचना की। किवदंती के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने एक स्थान पर बैठकर घोर तपस्या की, जिससे उनके शरीर पर मिट्टी की बांबी बन गई। मिट्टी की बांबी को वाल्मीकि कहते हैं, इसलिए उन्हें वाल्मीकि नाम से बुलाया जाने लगा।

महर्षि बनने से पूर्व वाल्मीकि, रत्नाकर नाम से जाने जाते थे। नारद मुनि ने उन्हें राम नाम जपने की सलाह दी, जब श्रीराम ने सीता का त्याग कर दिया तब महर्षि वाल्मीकि ने ही इनको आश्रय दिया। उनके आश्रम में ही माता सीता ने लव-कुश को जन्म दिया। जब श्रीराम से अश्वमेध यज्ञ किया तो लव कुश ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में यज्ञ के घोड़े को बांध लिया। सीता जी ने अपने वनवास का अंतिम काल महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही व्यतीत किया।