ईसा पूर्व छठीं शताब्दी तक संपूर्ण विश्व में फैली हुई थी भारत की संस्कृति : प्रो. मिश्र

दिंनाक: 14 Nov 2018 15:47:45


भोपाल(विसंके). संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और संस्कृत साहित्यकार प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कहा कि ईसा पूर्व छठीं शताब्दी तक संपूर्ण विश्व में भारत की ही संस्कृति फैली हुई थी| आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान ग्रीक, रोमन, हिब्रू सभ्यताएँ ईसा पूर्व एक से ढेड हजार वर्ष पहले की है| इसके पहले सुमेरु, बेबीलोन, असीरिया, मिस्र संस्कृतिया थी| यह सब भारत की संस्कृति से ही प्रभावित थी|


      दत्तोपन्त ठेंगडी शोध संस्थान द्वारा राज्य संग्रहालय में आयोजित दो दिवसीय दत्तोपन्त ठेंगडी स्मृति राष्ट्रीय व्याख्यानमाला के अंतिम दिन "भारतीय ज्ञान परंपरा का वैश्विक स्वरूप" विषय पर वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रो मिश्र ने कहा कि भारत से प्रभावित संस्कृतियाँ 3000 वर्षों तक फली-फूली| इस बात के प्रमाण मौजूद है| बेबीलोन के राजा ने मनुस्मृति के आधार पर अपनी स्मृति लिखवाई| उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की उम्र बताना कठिन है। मैक्समूलर ने कहा था कि ऋग्वेद 2200 वर्ष पुराना है। बाद में फ्रांस की एक सभा में उन्हें इस बात का खंडन करना पड़ा और कहना पड़ा कि वेदों का समय निर्धारित नही किया जा सकता। जीवन की समस्त विधाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा रही है| वेद ज्ञान का स्रोत है| मीमांसा के द्वारा वेद का अर्थ समझाया जा सकता है। वेदों को समझने-समझाने के लिए 6 वेदांगों की रचना हुई।  इतिहास और पुराणों के माध्यम से वेदों के रहस्यों को सुलझाने के प्रयास हुए। रामायण, महाभारत की रचना भी वेदों के रहस्यों को समझाने के लिए की गई। आज भी वेदों के तकनीकी पक्ष जानना कठिन है। जब अंग्रेज भारतीय ज्ञान को समझ नही पाए तो इसे सुपर नेचुरल, काल्पनिक कह दिया। हमारे यहाँ योग मार्ग से ज्ञान प्राप्त करने की परंपरा रही है| गृहस्थों और सामान्य जनों के लिए अनासक्त योग की बात भी कही गई है| यानि कर्म योग द्वारा ज्ञान प्राप्ति का मार्ग। कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। इच्छा रखने, और पूर्ति न होने पर क्षोभ होता है। पुण्य, कर्म के बाद ही पैदा होता है| यज्ञ के माध्यम से कर्म करने की बात भी कही गई| यज्ञ से अपूर्व पैदा होता है अर्थात जो पहले नहीं था और जिसका अहसास भी नहीं था| श्राप की अवधारणा भी भारत की ही है। किसी घटना को देखकर बुरा क्यों लगता है? प्रतिक्रिया पूर्व निर्धारित होती है। देव और असुर संस्कृति एक साथ पल्लवित हुई है।

  


उन्होंने कहा कि ज्ञान का कोई पंथ नहीं होता- न दक्षिण पंथ न वाम पंथ| सत्य, सत्य होता है| वह किसी के पक्ष विपक्ष में खड़ा नहीं होता| ये तो हम हैं जो सत्य अथवा असत्य के साथ खड़े होते हैं। देवताओं से ज्ञान प्राप्त करने की परंपरा भी भारत मे ही है| दुर्गा, सरस्वती, हनुमान, आदि से ज्ञान प्राप्त करते है। उन्होंने कहा कि भारत आत्मवादी रहा और दुनिया देहात्मवादी रही है। चेतना जव पंचभूत से निकल जाती है तब देह गंध देने लगती है। यही आत्मवाद है, जो भारत की ज्ञान परम्परा क़ा मूल है| आज यूरोप के लोग भी मानने लगे है कि आत्मा देह से अलग है। भारतीय ज्ञान परम्परा का संक्रमण हुआ। भारत की संस्कृति विश्व की रक्षा करने की संस्कृति रही है। आज कई देश अपनी, अपने समाज, अपने परिवार की रक्षा नही कर पा रहे है।


समाज के आश्रय से ही पोषित होंगी भारतीय ज्ञान परंपरा: श्री उपासने

      अध्यक्षीय उद्बोधन में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री जगदीश उपासने ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने से कुछ कमी को पूरा किया जा सकता है लेकिन सही मायने में समाज के आश्रय से ही यह परंपरा पोषित होंगी| हजारों सालों के परतंत्रता के काल में समाज और विद्वानों ने ही इसे संरक्षित किया और आगे बढ़ाया| उन्होंने आव्हान किया कि इसके लिए समाज को आगे आना चाहिए| उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेजों के समय इस परंपरा का सर्वाधिक नुकसान हुआ| आश्रम व्यवस्था में चल रही शास्त्रार्थ की परंपरा बंद हो गई| आज हमारे सामने चुनौती यह है कि हम कैसे इसे आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करें| हमारे पाठ्यक्रम विचार शून्य पीढियां तैयार कर रहे है| कार्यक्रम का संचालन संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्र ने किया| आभार सह सचिव श्री दीपक शर्मा ने माना| श्री शर्मा ने प्रतीक चिन्ह और पुस्तक भेंट कर प्रो. मिश्र और श्री उपासने को सम्मानित भी किया|

 

भोपाल संतुलित शहर प्रो. मिश्र

प्रो. मिश्र ने कहा कि अन्य शहरों की तुलना में भोपाल संतुलित शहर है| बनारस, उज्जैन शहरों में धर्मं अधिक मिलता है, दिल्ली जाओ तो राजनीति वातावरण अधिक मिलता है| लेकिन भोपाल में स्थिति ऐसी है कि यहाँ साहित्य, दर्शन, राजनीति, लोक संस्कृति का सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है| वो भी बिना किसी बैर-विरोध के|