17 नवम्बर – पुण्यतिथि - विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष / अशोक सिंघल

दिंनाक: 17 Nov 2018 14:30:55


भोपाल(विसंके). विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल का जन्म 27 सितम्बर, 1926 को आगरा में एक सम्पन्न उद्योगपति परिवार में हुआ। परिवार का वातावरण धार्मिक होने के कारण उनके मन में बचपन से ही हिन्दू धर्म के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया। उनके घर संन्यासी और धार्मिक विद्वान आते रहते थे। अशोक सिंघल आईआईटी बीएचयू के पासआउट थे। सिंघल को भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी। इसीलिए उन्होंने हिंदूस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा पंडित ओमकारनाथ ठाकुर से ली थी।



1942 में प्रयाग में पढ़ते समय संघ के प्रचारक रज्जू भैया ने उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कराया। वे भी उन दिनों वहीं पढ़ते थे। उन्होंने अशोक सिंघल की माता को संघ के बारे में बताया और संघ की प्रार्थना सुनाई। इससे उनकी माता काफी प्रभावित हुईं और सिंघल को संघ के शाखा में जाने की अनुमति दे दी। इस प्रकार शाखा जाने का जो क्रम शुरू हुआ, तो फिर वह बढ़ता ही गया।

1948 में तत्कालीन सरकार द्वारा संघ पर प्रतिबन्ध लगा तो सिंघल सत्याग्रह कर जेल गये। वहां से आकर उन्होंने बी.ई अन्तिम वर्ष की परीक्षा दी और प्रचारक बन गये। प्रचारक जीवन में लम्बे समय तक वे कानपुर में रहे। यहां उनका सम्पर्क श्री रामचन्द्र तिवारी नामक एक व्यक्ति से हुआ। वेदों के प्रति उनका ज्ञान विलक्षण था। अशोक सिंघल अपने जीवन में इन दोनों व्यक्तियों का प्रभाव स्वीकार करते हैं।

1975 से 1977 तक देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबन्ध रहा। इस दौरान अशोक सिंघल इन्दिरा गांधी के विरुद्ध हुए संघर्ष में लोगों को जुटाते रहे। आपातकाल के बाद वे दिल्ली के प्रान्त प्रचारक बनाये गए। 1981 में डा. कर्ण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ; पर उसके पीछे शक्ति अशोक और संघ की थी। उसके बाद अशोक को ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के काम में लगा दिया गया।

1984 में सिंघल को विहिप में बतौर महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गयी। सिंघल के नेतृत्व में ही विश्व हिंदू परिषद ने 200 से ज्यादा मंदिरों का निर्माण किया। आज विहिप की जो अन्तरराष्ट्रीय ख्याति है, उसमें अशोक सिंघल का योगदान सर्वाधिक रहा है।

15 सितम्बर 1926 को आगरा में जन्में अशोक सिंघल के पिता एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत थे। बाल अवस्था से लेकर युवावस्था तक अंग्रेज शासन को देख कर बड़े हुए और उसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गये। 1942 में आरएसएस ज्वाइन करने के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। समाज को अपना जीवन समर्पित कर चुके सिंघल ने 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से मटलर्जी साइंस में इंजीनियरिंग पूरी की।

कक्षा 9 में ही जुड़ गये आरएसएस से

घर के धार्मिक वातावरण के कारण उनके मन में बालपन से ही हिन्दू धर्म के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया। उनके घर संन्यासी तथा धार्मिक विद्वान आते रहते थे। कक्षा नौ में उन्होंने महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी पढ़ी। उससे भारत के हर क्षेत्र में सन्तों की समृद्ध परम्परा एवं आध्यात्मिक शक्ति से उनका परिचय हुआ। 1942 में प्रयाग में पढ़ते समय प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) ने उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कराया। उन्होंने अशोक सिंघल की माता जी को संघ के बारे में बताया और संघ की प्रार्थना सुनायी। इससे माता जी ने अशोक सिंघल को शाखा जाने की अनुमति दे दी।

 

इंजीनियर की नौकरी करने के बजाये उन्होंने समाज सेवा का मार्ग चुना और आगे चलकर आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश और आस-पास की जगहों पर आरएसएस के लिये लंबे समय के लिये काम किया और फिर दिल्ली-हरियाणा में प्रांत प्रचारक बने।

शास्त्रीय गायन में भी थे निपुण

1947 में देश विभाजन के समय कांग्रेसी नेता सत्ता प्राप्ति की खुशी मना रहे थे; पर देशभक्तों के मन इस पीड़ा से सुलग रहे थे कि ऐसे सत्तालोलुप नेताओं के हाथ में देश का भविष्य क्या होगा? अशोक सिंघल भी उन युवकों में थे। अतः उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित करने का निश्चय कर लिया। बचपन से ही अशोक सिंघल की रुचि शास्त्रीय गायन में रही है। संघ के अनेक गीतों की लय उन्होंने ही बनायी है।

1948 में संघ पर प्रतिबन्ध लगा, तो अशोक सिंघल सत्याग्रह कर जेल गये। वहाँ से आकर उन्होंने बी.ई. अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और प्रचारक बन गये। अशोक सिंघल की सरसंघचालक श्री गुरुजी से बहुत घनिष्ठता रही। प्रचारक जीवन में लम्बे समय तक वे कानपुर रहे। यहाँ उनका सम्पर्क श्री रामचन्द्र तिवारी नामक विद्वान से हुआ। वेदों के प्रति उनका ज्ञान विलक्षण था। अशोक सिंघल अपने जीवन में इन दोनों महापुरुषों का प्रभाव स्पष्टतः स्वीकार करते हैं।

आपातकाल में सिंघल

1975 से 1977 तक देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबन्ध रहा। इस दौरान अशोक सिंघल इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरुद्ध हुए संघर्ष में लोगों को जुटाते रहे। आपातकाल के बाद वे दिल्ली के प्रान्त प्रचारक बनाये गये। 1981 में डा. कर्ण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन हुआ; पर उसके पीछे शक्ति अशोक सिंघल और संघ की थी। उसके बाद अशोक सिंघल को विश्व हिन्दू परिषद् के काम में लगा दिया गया।

 

इसके बाद परिषद के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत, परावर्तन, गोरक्षा.. आदि अनेक नये आयाम जुड़े। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन, जिससे परिषद का काम गाँव-गाँव तक पहुँच गया। इसने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा बदल दी। भारतीय इतिहास में यह आन्दोलन एक मील का पत्थर है। आज वि.हि.प. की जो वैश्विक ख्याति है, उसमें अशोक सिंघल का योगदान सर्वाधिक है।

1992 का राम जन्म भूमि आंदोलन

1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में एक धर्म संसद का आयोजन किया गया। सिंघल इस के मुख्य संचालक थे। यहीं पर राम जन्म भूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई। यहीं से सिंघल ने पूरा प्लान बनाना शुरू किया और कार सेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया। 1992 में बाबरी मस्ज‍िद तोड़ने वाले कार सेवकों का नेतृत्व सिंघल ने ही किया था।

सिंघल ने देश भर से 50 हजार कारसेवक जुटाये। सभी कारसेवकों ने राम जन्म भूमि पर राम मंदिर स्थापना करने की कसम देश की प्रमुख नदियों के किनारे खायी। बात अगर सिंघल की करें तो उन्होंने अयोध्या की सरयु नदी के किनाने राम लला की मूर्ति स्थापित करने का संकल्प लिया था। सिंघल ने एक इंटरव्यू में कहा था, "अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिये हमने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। रही बात मस्ज‍िद तोड़ने की तो हम मस्ज‍िद तोड़ने के मकसद से नहीं गये थे। उस दिन जो कुछ भी हुआ वह मंदिर के पुनरनिर्माण कार्य का एक हिस्सा था।"

विहिप में सबसे बड़ा योगदान सिंघल जी का

अशोक सिंघल परिषद के काम के विस्तार के लिए विदेश प्रवास पर जाते रहे हैं। इसी वर्ष अगस्त सितम्बर में भी वे इंग्लैंड, हालैंड और अमरीका के एक महीने के प्रवास पर गये थे। परिषद के महासचिव श्री चम्पत राय जी भी उनके साथ थे। पिछले कुछ समय से उनके फेफड़ों में संक्रमण हो गया था। इससे सांस लेने में परेशानी हो रही थी। इसी के चलते 17 नवम्बर, 2015 को दोपहर में गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में उनका निधन हुआ।

इस लेख में बिंदु विहिप की वेबसाइट से लिये गये हैं।