19 नवम्बर – जयंती रानी लक्ष्मीबाई / सवतंत्रता संग्राम की पहली वीरांगना

दिंनाक: 19 Nov 2018 14:51:51


देश की बेटियों के लिए आदर्श  झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की आज जयंती है। उनके जीवन से जुड़ी घटनाएं उनके संघर्ष की गाथा को बयान करती हैं। गढ़ गंगा मेले में ही रानी ने रखीं थी 1857 के गदर की नींव, आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम 1857 की तैयारियों से पूर्व झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब पेशवा और तात्या टोपे के साथ कार्तिक मास में गंगा स्नान पर ही लगने वाले मेले पर स्वामी दयानंद सरस्वती से भेंट करने पहुंची थीं। ये बात 1854 की है, उन दिनों स्वामी दयानंद सरस्वती उदयपुर महाराज के यहां से लौटे थे। गंगा मेले में उन्होंने अपनी पाखंड खंडिनी पताका पहराई थी। हिंदू संप्रदाय में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ वह यहां उद्बोधन करते थे।



जब लक्ष्मीबाई, नाना साहेब और तात्या टोपे स्वामी जी से मिले तो उन्होंने उदयपुर नरेश की ओर से दी गई 300 सोने की मोहरें आजादी की लड़ाई के लिए भेंट स्वरूप दीं। इतिहास में मिले प्रमाण की मानें तो स्वामी जी ने तीनों को राजधर्म का पाठ पढ़ाया और कहा कि अपना राज कितना भी बुरा हो लेकिन वह अपना होता है। विदेशी राज कितना भी अच्छा हो लेकिन वह बुरा ही है। यहां से ही स्वराज और सुराज का नारा सबसे पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने दिया, जिसे पूर्ण करने के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी को पूर्ण रूप से अंग्रेजों से मुक्त कराने का सकंल्प लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती की ओर मिले आर्थिक सहयोग को उन्होंने सेना के राशन पर खर्च किया। 

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