राष्ट्रीय चेतना का उदघोष : अयोध्या आंदोलन – नरेन्द्र सहगल (भाग -1)

दिंनाक: 24 Nov 2018 14:29:41


जिसे युद्ध में कोई जीत न सके वही अयोध्या है। हिमालय की गोद में अठखेलियां खेलती हुई पण्य-सलिला सरयु अविरल चट्टानी रास्तों को तोड़कर मैदानी क्षेत्रों को तृप्त करती चली आ रही है। वैदिक काल से आज तक निरंतर चला आ रहा यह पुण्य प्रवाह अपने अंदर भारत राष्ट्र के सहस्राब्दियों पुराने इतिहास को संजोए हुए है। इसी पतित पावनी नदी ‘सरयु मैया’ के किनारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की क्रीडास्थली अयोध्या नगरी बसी है। यही राम की जन्मस्थली है। राम भारतीय संस्कृति की सशक्त और चिरंतन अभिव्यक्ति हैं। इसलिए अयोध्या भी इस मृत्युंजय संस्कृति का एक अमिट हस्ताक्षर है। राम और अयोध्या परस्पर प्रयाय हैं।


दशरथनंदन राम के जन्म के उपरांत तो अयोध्या का संबंध सम्पूर्ण सृष्टि के साथ जुड़ गया। संसार के प्राणी मात्र के लिए स्वर्ग का द्वार बन गई अयोध्या। विश्व के प्राचीनतम उपलब्ध ज्ञान के भंडार वेद के रचियता ने अयोध्या के महात्मय को निम्नलिखित श्लोक में प्रकट किया है -

    अष्ट चक्रा नव द्वारा देवानां यूः अयोध्या।

तस्या हिरण्यमयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।। (अथर्व वेद, 10-2-32)

भारत और भारतीय जीवनमूल्यों के गगनस्पर्शी ध्वज यदि राम हैं तो अयोध्या को इस ध्वज (भारतीय संस्कृति) का ध्वजस्थान मान लेना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अतः राम, अयोध्या और भारत यह तीनों ही एक ही भावधारा को प्रकट करते हैं और तीनों ही अवध्य अर्थात परास्त नहीं किए जा सकते।

इतिहास साक्षी है कि सरयु के पवित्र तट पर मनु के द्वारा बसाई इस अयोध्या नगरी ने वैभव और पतन के कई कालखंड देखे। परन्तु अपने नाम को सदैव सार्थक रखा। विदेशी आक्रमणकारियों की गिद्धदृष्टि प्राचीनकाल से ही अयोध्या पर रही है। भारत पर आक्रमण करने वाले प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी ने अयोध्या को अपना लक्ष्य बनाया। अयोध्या को विजित किये बिना भारत विजय की कल्पना भी अधूरी थी। यह महानगरी मानो भारत राष्ट्र का प्राणतत्व थी। यही कारण है कि भारत के राजाओं और प्रजा ने सहस्रों बार अपने प्राणों की आहूति देकर अयोध्या की रक्षा की। एक समय तो ऐसा भी था जब अयोध्या के सूर्यवंशी पुत्रों ने अयोध्या के परम्परागत शत्रु महापापी पौलस्त्य वंशीय दसग्रीव (रावण परम्परा) के घर जाकर उसकी समस्त पापमयी लंका को ही भस्म कर दिया।

हिन्दू समाज जिन सात तीर्थों को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी यात्रा को अपना अहोभाग्य मानता है। जिनकी यात्राओं को मोक्ष प्राप्ति हेतु आवश्यक समझा जाता है, उनमें अयोध्या की गणना सर्वपरि है। अयोध्या को भगवान विष्णु का शीर्ष कहा जाता है। अयोध्या को महाऋषियों ने मोक्षदायिनी कहा है।

अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका।

पुरी द्वारावतीश्चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः।।

जैन मत और अयोध्या

अयोध्या जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण श्रद्धा केन्द्र है। जैन धर्म में तीर्थकारों का एक विशेष स्थान है। यह कहना सत्य ही होगा कि जैन धर्म के सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार का आधार स्तम्भ यह तीर्थकर ही थे। जैन धर्म के 22 तीर्थकर सूर्यवंशी थे। इनमें से अधिकांश अयोध्या के ही थे। यह भी उल्लेखनीय है कि जैन धर्म की स्थापना अयोध्या में ही हुई थी। अतः अयोध्या भगवान राम के साथ-साथ जैन धर्म की भी जन्मस्थली है।

बौद्ध मत और अयोध्या

अयोध्या बौद्ध संस्कृति का भी एक सशक्त और विशाल केन्द्र रहा है। कौशल प्रदेश की प्राचीन राजधानी अयोध्या ने अनेक बौद्ध भिक्षुओं एवं पंडितों को जन्म दिया। प्रसिद्ध बौद्ध दानशीला विशाखा, महादानी पिडिक और कौशल प्रदेश के सम्राट बौद्ध धर्मावलम्बी महाराजा प्रसैनजित यह सभी अयोध्या के निवासी थे। बौद्ध स्तूपों के खण्डहर तो आज भी अयोध्या के बड़े-बड़े टीलों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।

भगवान बुद्ध भी अयोध्या को पवित्र नगरी मानते थे। बुद्ध चार्तुमास में (वर्षाकाल) विशेष रूप से साधनारत रहते थे। इस तपस्या हेतु वे पवित्र एवं किसी विशेष आध्यात्मिक स्थल की तलाश करते थे। बौद्ध साहित्यानुसार उन्होंने अपने जीवन के 25 चार्तुमास अयोध्या के निकट श्रावस्ती में और 16 चार्तमास अयोध्या में बिताकर अपनी तपस्या को पूर्ण किया था।

सिख पंथ और अयोध्या

अयोध्या में ब्रह्मकुंड नामक स्थान पर सिख बंधुओं का एक प्रसिद्ध गुरुद्वारा भी है। कहा जाता है कि जब श्री गुरुनानक देव जी भारत भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुंचे तो उन्होंने यहां अनेक दिनों तक अकाल पुरुष की आराधना में जप किया और अयोध्यावासियों को एक ओंकार के अस्तित्व का उपदेश दिया। सिख मान्यतानुसार श्री गुरुनानक देव जी को यहां ब्रह्मकुंड नामक स्थान पर ब्रह्मा के दर्शन हुए।

दशमेश पिता श्री गुरुगोविंद सिंह जी ने भी अयोध्या की तीर्थयात्रा की थी। औरंगजेब के काल में श्री गुरुगोविंद सिंह जी महाराज ने अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि की मुक्ति हेतु युद्ध भी किया था। उन्होंने अपना सम्बन्ध भगवान राम के सूर्यवंश से जोड़ा है। श्रीगुरु की आत्मकथानुसार बेदी और सोढ़ी वंश दोनों का सम्बंध राम के पुत्रों लव और कुश से है।

अतः समस्त भारत के आध्यात्मिक जीवन के साथ अयोध्या का इतिहास भारत के सांस्कृतिक राष्ट्र जीवन की निर्विवाद अभिव्यक्ति है। भारत राष्ट्र का वैभव और पराभव अयोध्या के उत्थान और पतन के साथ जुड़ा हुआ है। राम इसी राष्ट्र जीवन के नायक हैं। जैसे राम और अयोध्या को बांटा नहीं जा सकता, उसी प्रकार राम और राष्ट्र को बांटा नहीं जा सकता। राम भारत के राष्ट्र जीवन की सरल, स्पष्ट और अद्वितीय परिभाषा है। अयोध्या इसी राष्ट्र जीवन (राम) की जन्मस्थली है। इस जन्मस्थली पर श्रीराम का भव्य मंदिर पहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा।

 ---------------शेष कल