एक भी यवन सैनिक जिंदा नहीं बचा : नरेन्द्र सहगल अयोध्या आंदोलन (भाग – 4)

दिंनाक: 27 Nov 2018 15:59:33


11वीं सदी के प्रारम्भ में कौशल प्रदेश पर महाराज लव के वंशज राजा सुहैल देव का राज था। उनकी राजधानी अयोध्या थी, इन्ही दिनों महमूद गजनवी ने सोमनाथ का मंदिर और शिव की प्रतिमा को अपने हाथ से तोड़कर तथा हिन्दुओं का कत्लेआम करके भारत के राजाओं को चुनौती दे दी। परन्तु देश के दुर्भाग्य से भारत के छोटे-छोटे राज्यों ने महमूद का संगठित प्रतिकार नहीं किया। गजवनी भारत को अपमानित करके सुरक्षित वापस चला गया। इसके बाद गजनवी का भांजा सालार मसूद भी अत्याचारों की आंधी चलाता हुआ दिल्ली तक आ पहुंचा। इस दुष्ट आक्रांता ने भी अपनी गिद्ध दृष्टि अयोध्या के राम मंदिर पर गाढ़ दी।


सोमनाथ मंदिर की लूट में मिली अथाह संपत्ति, हजारों गुलाम हिन्दुओं और हजारों हिन्दू युवतियों को गजनी में नीलाम करने वाले इस सालार मसूद ने यही कुछ अयोध्या में करने के नापाक इरादे से इस ओर कूच कर दिया। सालार मसूद के इस आक्रमण की सूचना जब कौशलाधिपति महाराज सुहेलदेव को मिली तो उन्होंने सभी राजाओं को संगठित करके मसूद और उसकी सेना को पूर्णतया समाप्त करने की सौगंध उठा ली।

सुहेलदेव ने भारत के प्रमुख राजाओं को अपनी सेना सहित अयोध्या पहुंचने के संदेश भेजे। अधिकांश राजाओं ने तुरंत युद्ध की रणभेरी बजा दी। सभी राजाओं ने सुहेलदेव को विश्वास दिलाया कि वह सब संगठित होकर लड़ेंगे और मातृभूमि अयोध्या की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करेंगे। मसूद ने हमारे श्रद्धा केन्द्रों को अपमानित किया है, हम उसे और उसके एक भी सैनिक को जिंदा वापस नहीं जाने देंगे। चारों ओर युद्ध के नगाड़े बज उठे। सुहलदेव के आह्वान का असर गांव-गांव तक हुआ। साधु-सन्यासी, अखाड़ों के महंत और उनकी प्रचंड शिष्य वाहनियां भी शस्त्रों के साथ इस संघर्ष में कूद पड़ी। सबके मुंह से एक ही वाक्य बार-बार निकल रहा था, ‘इस बार मसूद के एक भी सैनिक को जिंदा नहीं छोड़ेंगे, मसूद का सिर काटकर अयोध्या के चौराहे पर टांगेंगे।

देखते ही देखते 15 लाख पैदल सैनिक और 10 लाख घुड़सवार अपने-अपने राजाओं के नेतृत्व में अयोध्या के निकट बहराइच के स्थान पर पहुंच गए। बहराइच के हाकिम सैयद सैफुद्दीन के पसीने छूट गए। उसने तुरन्त सालार मसूद को अपनी सारी सेना के साथ बहराइच पहुंचने का संदेश भेज दिया। सालार अपने जीवन की अंतिम जंग लड़ने आ पहुंचा। इसी स्थान पर हिन्दू राजाओं ने सालार मसूद को घेरने की रणनीति बनाई। सालार मसूद का बाप सालार शाह भी एक बहुत बड़े लश्कर के साथ उसकी सहायता के लिए आ गया।

प्रयागपुर के निकट घाघरा नदी के तट पर महायुद्ध हुआ। यह स्थान बहराइच से करीब 7 किलोमीटर दूर है। सुहेलदेव के नेतृत्व में लगभग 25 राजाओं की सैनिक वाहनियों ने मसूद और उसके बाप सालार शाह की सेना को अपने घेरे में ले लिया। हर-हर महादेव के गगनभेदी उदघोषों के साथ हिन्दू सैनिक मसूद की सेना पर टूट पड़े। मसूद की सेना घबरा गई। उसके सैनिकों को भागने का न तो मौका मिला और न ही मार्ग। विधर्मी और अत्याचारी आक्रांता के सैनिकों की गर्दनें गाजर मूली की तरह कटकट कर गिरने लगीं।

सात दिन के इस युद्ध में हिन्दू सैनिकों ने सालार मसूद की सम्पूर्ण सेना का सफाया कर दिया। एक भी सैनिक जिंदा नहीं बचा। मसूद की गर्दन भी एक हिन्दू सैनिक ने काट दी। विदेशी इतिहासकार शेख अब्दुल रहमान चिश्ती ने सालार मसूद की जीवनी ‘मीरात-ए-मसूदी’ में लिखा है, ‘इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या तक जा पहुंचा था वह सब नेस्तेनाबूद हो गया, इस युद्ध में अरब और ईरान के हर घर का चिराग बुझा है, यही कारण है कि 200 वर्षों तक विदेशी और विधर्मी भारत पर हमला करने का मन न बना सके’।

सालार मसूद का यह आक्रमण केवलमातृ अयोध्या पर नहीं था यह तो समूचे भारत की अस्मिता पर चोट थी। इसीलिए भारत के राष्ट्रजीवन ने अपने आपको विविध राजाओं की संगठित शक्ति के रूप में प्रकट किया और हिन्दू समाज ने एकजुट होकर अपने राष्ट्रीय प्राण तत्व श्रीराम मंदिर की रक्षा की।

राम जन्मभूमि को विध्वंश करने के इरादे से आए आक्रांता मसूद और उसके सभी सैनिकों का महाविनाश इस बात को उजागर करता है कि जब भी हिन्दू समाज संगठित और शक्ति सम्पन्न रहा विदेशी ताकतों को भारत की धरती से पूर्णतया खदेड़ने में सफलता मिली। आज भी संतों के मार्गदर्शन और विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण हेतु जो अयोध्या आंदोलन चल रहा है वह भी भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का पुर्नजागरण है। मंदिर कोर्ट के फैसले से बने, सरकारी कानून से बने अथवा सहमति से बने, यह तो अब बन कर ही रहेगा। ---------शेष कल

अयोध्या आंदोलन में भारत की राष्ट्रीय पहचान और सभी भारतवासियों के आराध्य श्रीराम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर के निर्माण का महत्व स्पष्ट कर दिया है, अतः सभी भारतवासियों के साथ हमारे मुस्लिम भाइयों को भी अपने ही पूर्व पुरखों की सांस्कृतिक धरोहर का सम्मान करते हुए मंदिर निर्माण में योगदान करना चाहिए।