राम जन्मभूमि का दिव्य स्थान बदला नहीं जा सकता – आलोक कुमार

दिंनाक: 30 Nov 2018 18:15:46

नई दिल्ली (इंविसंकें). श्रीराम जन्मभूमि राष्ट्रीय धरोहर की पुनर्स्थापना विषय पर आयोजित सेमिनार में विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने कहा कि देश की आज़ादी के समय कांग्रेस ने जिस प्रकार इंडिया गेट से जार्ज पंचम की प्रतिमा, ब्रिटिश वायसरायों की प्रतिमाएं नई दिल्ली से हटा दीं, अनेक मार्ग जो ब्रिटिश दासता का बोध कराते थे उनको बदला गया, उसी प्रकार अयोध्या में गिराया गया बाबरी ढांचा भी विदेशी दासता का बोध करवाता था और देश के स्वाभिमान पर धब्बा था.

जिस प्रकार शरीर आत्मा निकलने पर मृत हो जाता है और उसे एक दिन भी घर में नहीं रखा जाता, उसी प्रकार भगवान् राम के बिना यह भारत भूमि आत्मा विहीन हो जाएगी. अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि देश की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है. श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर अध्यादेश लाकर बनना चाहिए. जिस स्थान पर श्रीराम का जन्म हुआ वो स्थान दिव्य है, यह स्थान पूज्य है. इसलिए यह बदला नहीं जा सकता, मस्जिद अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा से बाहर कितने भी बड़े स्थान पर बनाई जा सकती है. अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि में भव्य राम मंदिर देश की साम्प्रदायिक और सांस्कृतिक एकता को अक्षुण्ण बनाने का बहुत बढ़ा सुअवसर है.

उन्होंने कहा कि जैसे अभी अयोध्या में धर्म सभा हुई, वैसी दिल्ली के रामलीला मैदान में करेंगे, यह अभूतपूर्व सभा होगी. इतनी बड़ी सभा दिल्ली ने पहले कभी देखी नहीं होगी. ऐसी 543 धर्म सभाएं देश के सभी लोकसभा क्षेत्रों में एक साथ करेंगे. उसके उपरान्त सभी सांसदों के पास मतदाता के नाते राममंदिर निर्माण के लिए संसद में अध्यादेश लाने की मांग करेंगे. जनता के इतने बड़े दबाव को जब वह देखेंगे तो वह संसद में इस बिल के विरोध का साहस नहीं कर सकेंगे.

राज्य सभा सांसद प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि देश से अंग्रेजों को निकालने और आज़ादी के आंदोलन के तीन चरण थे. 1920 से 30 में असहयोग आंदोलन एक चेतावनी थी, 1930-31 में सविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ, वह तैयारी थी और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन हुआ, वह अंग्रेजों की भारत से विदाई थी. इसी तरह रामजन्म भूमि का 1990 का आंदोलन असहयोग आंदोलन था, 1992 का आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन था, जिसमें ढांचा टूटा और अब 2018 का आंदोलन क्विट इंडिया मूवमेंट है. भारत की सरकार और समाज इस बात को स्वीकार करेगा कि यह हिन्दू मुस्लिम विवाद का प्रश्न नहीं है. यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पुनर्स्थापना का यज्ञ है, हम इसे मिलकर करेंगे.

भारतीय वित्त सलाहकार समिति द्वारा आयोजित सेमिनार में समिति के चेयरमैन सुभाष अग्रवाल सहित अन्य वित्त विशेषज्ञों ने भी राम मंदिर की पुनर्स्थापना पर अपने विचार रखे.