वीर शिवाजी गाथा : अफज़ल का जाल - सोनाली मिश्र (लेखमाला : भाग -2)

दिंनाक: 10 Dec 2018 16:05:56


भोपाल(विसंके). जून के महीने में एक अजीब सी घुटन शिवाजी के जीवन में छा रही थी, हवाएं स्थिर थीं और उस जून के महीने में शिवाजी अजीब पसीना हो रहे थे। जैसे-जैसे उनका कदम आगे बढ़ रहा था वैसे वैसे कोई शक्ति उनसे संवाद कर रही थी। बार-बार वह उन्हें धिक्कार रही थी, हवा इसीलिए शायद रुक गयी थी जिससे वह शक्ति उनकी हड्डियों में उस सरसराहट को और अनुभव करा सके जो शिवाजी को भीतर ही भीतर मार रही थी। एक-एक कदम आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अपने बचपन से लेकर अब तक का एकत्रित बल प्रयोग करना पड़ रहा था। ह्रदय की व्यग्रता उन्हें सिर पटकने पर विवश कर रही थी। यह सब उन्हें कुछ वर्ष पूर्व अफजल खान के साथ हुए संघर्ष के दौरान तनाव नहीं हुआ था जबकि अफजल की क्रूरता जगजाहिर थी। शिवाजी के समक्ष वह पूरा चक्र एक बार फिर से आ रहा था। दक्खन में शिवाजी की शक्ति का निरंतर विस्तार बीजापुर में बड़ी साहिबा के चेहरे पर तनाव में वृद्धि कर रहा था। उन्हें अपने साम्राज्य की चिंता थी। बड़ी साहिबा के ह्रदय में अपने छोटे वारिस को देखकर तनाव हिलोरे मारता कि कहीं दक्खन में स्थापित उनका साम्राज्य उस काफिर शिवा के हाथों नष्ट न हो जाए। क्या यही दिन देखने के लिए वह जीवित हैं? 


बड़ी साहिबा का दर्द बार बार अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरते फेरते झलक उठता। शिवा की भगवा तलवार की आंच बीजापुर को झुलसाने के लिए पर्याप्त थी। बीजापुर के दरबार में यही चिंता बलवती हो रही थी कि कहीं दक्‍कन में स्थापित उनका साम्राज्‍य उस काफिर शिवा के कारण नष्ट न हो जाए। काफिर शिवा भगवा बांध कर मां भवानी करता हुआ आगे ही आगे बढता आ रहा था। उनकी चिंता का निवारण क्रूर अफजल के रूप में सामने आया। पूरे भारत में अफजल खान जितना क्रूर सेनापति नहीं था। अफजल खान अपने शत्रुओं को मारकर ही दम लेता था। उसका एक मात्र लक्ष्य होता था अपने शत्रुओं का विनाश। बडी साहिबा ने अफजल खान के सामने शिवाजी को मारने की बात की। शिवाजी के गुप्‍तचर बीजापुर में हुए एक एक घटनाक्रम के विषय में शिवाजी को पूरी जानकारी दे रहे थे। शिवाजी को यह भलीभांति ज्ञात था कि आमने सामने की लडाई का अभी समय नहीं हुआ था। स्वराज्य अभी अपने शैशव काल में था। नन्हे शिशु को इतने बडे शत्रु के सम्मुख खुले मैदान में छोड देना अभी उचित नहीं था। बीजापुर की सेना एक उन्मुक्त और मदांध सिंह की भांति थी जो अवसर प्राप्त होते ही अपने शत्रु को फाड़ देती। जैसे ही शिवाजी के सम्‍मुख यह समाचार आया कि अफजल को उन्‍हें मारने के लिए नियुक्‍त किया जा रहा है, उनके मस्तिष्क में योजनाओं का निर्माण अपने आप ही होने लगा था। मां भवानी पर शिवाजी को पूरा विश्वास था। उनके कानों में यह बात आ गई थी कि ज्‍योतिषयों पर भरोसा रखने वाले अफजल खान को ज्‍योतिषियों ने यह बता दिया था कि वह शिवाजी के साथ युद्ध में से जीवित वापस नहीं आ पाएगा। अत उसने अपनी 63 बेगमों को बावडी में डुबो कर मौत के घाट उतार दिया था। एक बेगम ने विद्रोह किया तो उसे बहुत ही दर्दनाक मृत्‍यु अफजल खान ने दी थी। अपनी सभी बेगमों को मौत की गोद में सुलाने के बाद उसने शिवाजी का रूख किया था। इस दुर्दांत शत्रु से निपटने के लिए शिवाजी ने योजना का ताना बाना बुनना आरंभ कर दिया था। 

गुप्‍तचरों के द्वारा क्षण प्रतिक्षण की जानकारी पाने के बाद शिवाजी ने शत्रु की तरफ से वार्ता की प्रतीक्षा की। सैकडों मंदिरों को ध्‍वस्‍त करने वाले अफजल खान ने जल्‍द ही शिवाजी के पास वार्ता का प्रस्‍ताव भेजते हुए बीजापुर की अधीनता स्‍वीकारने के लिए कहा। शिवाजी ने पत्र का उत्‍तर लिखकर अधीनता स्‍वीकार करने के लिए सहमति व्‍यक्‍त की। वह 10 नवंबर 1659 का दिन था जब दो योद्धा अपने अपने मन में शत्रु का खात्‍मा करने की योजना के साथ प्रतापगढ के पास मिल रहे थे। शर्त के अनुसार कुछ ही अंगरक्षकों के साथ दोनों को मिलना था। जैसे ही अफजल खान ने शिवाजी को देखा उसने उन्हें गले लगाने के बहाने अपने विशाल शरीर का फायदा उठाते हुए मारना चाहा। शिवाजी महाराज पूरी तरह से तैयार थे, और इससे पूर्व कि वह कुछ कर पाता वैसे ही शिवाजी ने सतर्कता बरतते हुए अफज़ल खान का पेट बाघनख (बाघ के नाखून से बना हथियार) से चीर दिया। यह देखकर अफजल खान के वकील ने शिवाजी पर तलवार से प्रहार किया। परंतु शिवाजी के साथ आए साथियों ने इसे विफल कर दिया। किसी नशेडी की तरह अफजल खान शिविर से बाहर भागा मगर शिवाजी ने जल्‍द ही उसका खात्‍मा कर दिया। मरते हुए अफजल के कानों में ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणी गूंज रही थी। जिस बेगम को तलवार से मारा था उसकी चीख उसके कान में बार बार कंपित हो रही थी। जिन 63 बेगमों को बावडी में डुबोया था उनकी बाहें उसे बुला रही थीं। जिनकी बाहों में जाने के लिए वह उत्सुक रहता था आज उसे वह भयभीत कर रही थीं। आज तक जिन जिन राजाओं को उसने धोखे से मारा था वह सब उसके आसपास तलवार लेकर खडे थे और तुलजा पुर में उसके द्वारा ध्‍वस्‍त मां भवानी का मंदिर अट्टाहास कर रहा था। अफजल मारा जा चुका था और उसकी सेना एक ऐसे चक्रव्‍यूह में फंसी थी जहां से जीवित नहीं निकला जा सकता था। 

आज इतने वर्षों के उपरांत भी शिवाजी वह क्षण भूले नहीं हैं, और संभवतया मिर्जा राजे भी नहीं भूला होगा, तभी वह ऐसी कुशल रणनीति बनाकर आया है। 

शिवाजी के कदम एक बार फिर थम गए। मिर्जा राजे का शिविर और निकट आ गया था।