समस्या घुसपैठ और घुसपैठिये की - रमेश शर्मा

दिंनाक: 11 Dec 2018 14:46:02


भोपाल(विसंके). भारत में जितनी समस्या विदेशी नागरिकों और घुसपैठ की है उससे ज्यादा भयावह स्थिति इन दोनों की मानसिकता से है। विदेशी नागरिकों का चोरी से अथवा दादागिरी से घुसकर भारत में बसने की समस्या बहुत पुरानी है। सैकड़ों साल पुरानी। यदि हम शकों, हूणों, कुशाओं और यूनानियों की गणना न करें तो भी कम से कम हजार साल से भारत की धरती पर अतिक्रमण और आक्रमण दोनों हो रहे हैं। लोग बकायदा गोला, बारुद, तोप तमंचा, लाठी, भाला बरछी और तलवार लेकर आए। उन्होंने भारतीयों को मारा, उनकी घर संपत्ति पर कब्जा किया। भारतीय स्त्रियों का हरण किया और घर बसाकर बैठ गए।


पुरानी घुसपैठ और इस घुसपैठ में एक अंतर है। पुराने हमलों का उद्देश्य यदि राजनैतिक था तो उनके द्वारा भारत में बसने का उद्देश्य यहां की सभ्यता सीखकर अपने जीवन का विकास करना था। इसीलिए वे भारत में रच-बस गए, यहां समाज में समरस हो गए, एकाकार हो गए। लेकिन बाद के आगमनों में अनेक क्रूरताएं दिखी। दसवीं शताब्दी के बाद इन आक्रमणों और आगमनों में एक अंतर आया। यह हमले एक तरफ तो राजनैतिक विस्तार के थे लेकिन इसके साथ संपत्ति का हरण और मजहबी विस्तार के लिए भी हुए। उनका राजनैतिक और मजहबी विस्तार कब भारत में भारत के स्वरूप को बदलने की तरफ मुंड गया पता ही न चला। यदि एक व्यक्ति स्वेच्छा से या बलपूर्वक एक उपासना पद्धति बदलकर दूसरी अपनाता है तो इसमें नाम बदलने की, वेशभूषा बदलने की जरुरत क्यों होनी चाहिए। या बोलचाल में भाव-भाषा बदलने की जरुरत कहां थी, लेकिन यह सब बदलने का अभियान चलाया। वे यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने नगरों, गांवों और मोहल्लों के नाम बदलना शुरु किया। अभी यह सब चल ही रहा था कि भारत में सक्रिय कुछ विदेशी व्यापारियों के मन में राजनैतिक महत्वाकांक्षा जागी और उन्होंने न केवल अपना राज स्थापित करके अपने मत पंथ का प्रचार विस्तार अभियान चलाया बल्कि भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक, और शैक्षणिक स्वरूप को भी मिटाने का काम शुरु कर दिया। बेशक भारत में राजनैतिक दृष्टि से या सत्तात्मक स्वरूप में वे दो ताकतें नहीं बची लेकिन उनके द्वारा स्थापित परंपराएं पहले की तरह फलाफूल रहीं हैं।

आजादी के बाद भारत में स्थापित भारतीयों की सत्ता भले ही राजनैतिक दृष्टि से उनसे मुक्त रही हो लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संदर्भों में भारत के मूल स्वरूप से दूर ही नहीं कई मायनों में तो विरुद्ध बनी रही। जिसके कारण ही विदेशी नागरिक और घुसपैठ भारत को क्षतिग्रस्त कर रही है। भारत में विदेशी नागरिक दो प्रकार के हैं। एक तो जन्म से और दूसरे मानसिकता से। करोड़ों लोग ऐसे हैं जो जन्में तो भारत में हैं लेकिन उनकी मानसिकता भारतीय नहीं है। वे अपने तर्कों से सत्य और तथ्य दोनों को नकारते हैं। भारत के मानबिंदुओं की गरिमा को कम करने के अभियान में ही सतत सक्रिय रहते हैं। दूसरे क्रम पर वे लोग हैं जो आजादी के पहले भारत में नहीं रहना चाहते थे। वे भारत भूमि का ही बंटवारा करके एक नया राष्ट्र बनाकर उसमें बसना चाहते थे। भूमि का बंटवारा भी हो गया। एक नया राष्ट्र भी बन गया लेकिन कुछ लोग जा नहीं पाए। वे यहीं रह गए। उनके परिवारों का विस्तार हुआ। बेशक वे लोग भारतीय हैं लेकिन वे इस राष्ट्र की मूलचित्ति में एकाकार नहीं हो पाए। वे स्वयं अलग समूह के रूप में गोलबंद दिखते हैं, यह ठीक उसी प्रकार की मानसिकता और मनोवैज्ञानिक बीजारोपण का प्रभाव है जो हजार साल की गुलामी में भारत के भीतर भारत को तोडऩे का प्रयास हुआ।

एक आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि इस प्रकार की मानसिकता के जहां बीजारोपण का अभियान आज आजादी के सत्तर साल बाद भी चल रहा है वहीं उसके पुष्पित और पल्लवित करने के समूह भी मौजूद हैं। इन अभियान चलाने वालों और उसके संरक्षण करने वाले समूहों की पहचान के लिए अलग से कोई प्रयत्न नहीं करना।  यह सहज ही देश के विभिन्न भागों में दिखने वाली गतिविधियां में ही प्रत्यक्ष हैं, और प्रमाण भी। ऐसी मानसिकता वाले लोग ही भारत में न केवल घुसपैठ और आकर्षित कर रहे हैं। बल्कि उन्हें भारत की मूलधारा से दूर रहने में भी प्रोत्साहित करते हैं।

यह घुसपैठ किसी एक कोने से नहीं हो रही। बल्कि देश के हर कोने से हो रही है? अंतर इतना है कि कुछ लोग अपनी पहचान छुपा लेते हैं, कुछ लोग बदल लेते हैं और कुछ अपने मूल स्वरूप में बने रहते हैं। भारत के पड़ोसियों में नेपाल, म्यामार, चीन, पाकिस्तान, बंगलादेश और श्रीलंका। इनमें से कौनसा ऐसा देश है जिसके लोग भारत में न आए हों। यहां रोजी-रोटी न कमाते हों, यहां की नागरिकता प्राप्त करने के प्रपंच न करते होंं, लेकिन इनमें से किसी के भी मन में भारत के प्रति आभार का भाव नहीं, कोई यहां कानून से नहीं डरता और न यहां की संस्कृति और सामाजिक जीवन में घुलना चाहता। वह अपनी अलग दुनिया बना है और उन तमाम लोगों से तार जोड़ता है जो भारत में तो रहते हैं लेकिन भारत में घुलना नहीं चाहते।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण बंगलादेश नागरिकों का है। बंगाली मुसलमानों पर अत्याचार पाकिस्तानी सेना ने किए। उससे मुक्ति के अभियान  में भारत ने मदद की बंगलादेश एक स्वतंत्र देश बना। लेकिन भारत में बसे बंगलादेशी पाकिस्तानी घुसपैठियों से मिलकर भारत में रहकर भारत के खिलाफ अभियान चलाते हैं। हालांकि  यहां निवास करने वाले बंगलादेशियों की अधिकृत संख्या किसी के पास नहीं अलग अलग सूत्र अलग अलग संख्या बताते हैं फिर भी अनुमान है लगभग तीन से चार करोड़ लोग हैं। दूसरा उदाहरण रोहिंग्याओं का कहा जा सकता है। यह मूल रूप से म्यामार से आए। बंगलादेश ने उन्हें घुसने नहीं दिया, पाकिस्तान ने घुसने नहीं दिया। इन दोनों देशों ने इस बात का भी लिहाज नहीं किया कि ये मुसलमान हैं। इन्होंने भारत में घुसपैठ की। लेकिन अब यह भी एक प्रकार से पाकिस्तानी आतंकवादियोंं और सेना का हथियार है उनके इशारे पर काम करते हैं।

भारत में उन लोगों को भी घुसपैठ की बी श्रेणी में रखा जाना चाहिए जो लोग कभी पाकिस्तान जाना चाहते थे, उन्होंने इच्छा भी व्यक्त की थी, अपनी राय भी दी थी लेकिन किन्हीं कारणों से जा नहीं पाए। यहीं रह गए। उन्हें यहां के निवासियों ने गले लगाकर सुरक्षा दी सब प्रकार से फलने फूलने का अवसर दिया पर पता नहीं क्यों इनमें बड़ी संख्या में ऐसे लोगों की है जो आत्मा से नहीं घुल पाए और अलगाव का प्रतीक हंै, अलगाववादियों से सद्भाव रखते हैं और घुसपैठ को छिपाने की अथवा घुसपैठ के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को दबाने का प्रयास करते हैं।

एक संयोग यह है कि पाकिस्तान की घुसपैठ जहां पंजाबी लवों लहजे के कारण छिप जाती है। वहीं बंगलादेश की घुसपैठ बंगाली अंदाज के कारण। भारत में तीसरी बड़ी घुसपैठ चीन की सीमा से होती है। दार्जीलिंग शिलांग से लेकर सिक्किम तक की पट्टी चीनी वेशभूषा से मिलती-जुलती के कारण से खप रहे हैं, छिप रहे हैं। भारत में बढ़ता आतंकवाद जहां पाकिस्तानी और बंगलादेशी घुसपैठ का नतीजा है तो नक्सलवाद एवं माओवाद चीनी घुसपैठ के कारण।

यह घुसपैठ जहां सामाजिक अशांति और राष्ट्रीय तनाव उत्पन्न करती है वहीं स्थानीय निवासियों से रोजगार और रोजी रोटी छीनती है, रहने के लिए घर छीनती है, पीने का पानी छीनती है। असम, मिजोरम, नागालैंड और पश्चिमी बंगाल में ऐसे कितने गांव है, जहां घुसपैठियों ने स्थानीय नगारिकों को भगा दिया एवं उनकी जमीन मकान पर कब्जा कर लिया। कश्मीर में लाखों कश्मीरी पंडितों से मकान, जमीन और कारोबार छीन लिया गया। बावजूद इसके जितनी ताकत से आवाज घुसपैठियों के हित में मानवाधिकार के नाम पर उठती है, रोहिग्याओं के लिए उठती है, उससे आधी आवाज भी कश्मीरी पंडितों के लिए, यहां बलपूर्वक धर्मान्तरित किए गए बंगालियों के लिए नहीं उठती दुनिया का इतिहास गवाह है कि विरोधी मानसिकता से की जाने वाली घुसपैठ राष्ट्र के अस्तित्व को मिटा देती है एक अनुमान है भारत में घुसपैठ के कारण आबादी का असंतुलन बिगड़ रहा है यदि 1947 से आज तक इस बिगड़ते असंतुलन की गति यही रही तो आगे आने वाले पचास सालों में भारत में भारत कितना बचेगा यह कहना मुश्किल है।