वीर शिवाजी गाथा : आने वाली अमावस - सोनाली मिश्र

दिंनाक: 12 Dec 2018 15:04:59


पैदल न चल पाने के कारण उन्होंने एक बार पुन: कहारों को इशारा किया और पालकी में बैठ गए. 


जैसे जैसे मिर्जा राजे का शिविर और शिवाजी के मध्य दूरी कम हो रही थी, शिवाजी की स्वयं से दूरी बढ़ती जा रही थी. नहीं नहीं, यह तो उनका लक्ष्य नहीं था! उनके कानों में माँ जीजाबाई की स्वराज्य की शिशु लालसा उलाहना कर रही थी। उनके ह्रदय पर शिला सी कोई अपना स्थान बनाकर पसरती जा रही थी। शिवाजी इस विषय से अत्यंत ही विचलित थे कि न जाने मिर्जा राजे संधि में संधि में वह क्‍या शर्तें लिखवाएगा। जून की रात वैसे तो दक्खन के पहाडों की बहुत ही शांत व ठंडी होती हैं पर शिवाजी के मन में आज जो व्यथा थी वह इस ठंडक से कम होने का नाम नहीं ले रही थी। पुरंदर के दुर्ग में जो हुआ वह उससे अत्यधिक विचलित थे। वह कभी कभी पालकी में बैठते, कभी बाहर आ जाते! उनके ह्रदय की इसी उद्विग्नता के कारण उनके मित्र उन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहते थे और हर क्षण उनके निकट रहकर उन्हें एक साथ का आश्वासन देना चाहते थे. 

वज्रगढ़ के दुर्ग के मुगलों के हाथों में चले जाने से शिवाजी बहुत व्यथित थे और आज ही मिर्जा राजे ने उनके साथ भेंट वाले दिन ही पुरंदर के दुर्ग की घेराबंदी कर उन्हें हर प्रकार से तोड़ दिया था. शिवाजी इस रणनीति के लिए तैयार नहीं थे. दुर्ग से अधिक उन्हें बार बार उन सैनिकों की मृत्यु से पीड़ा हो रही थी, जो अकारण ही इस रण में खेत रहे थे. 

शाइस्ता खान की पराजय ने औरंगजेब को अत्यंत ही कुपित कर दिया था. और शाइस्ता खान पर हमला करते समय शिवाजी को इस बात का भलीभांति भान था कि उनके इस कदम का औरंगजेब पर प्रतिकूल प्रभाव होगा। शाइस्ता खान न केवल मुग़ल सेनापति था बल्कि औरंगजेब का मामा भी था. शाइस्ता खान की दक्कन में नियुक्ति का एक मात्र कारण शिवाजी थे। और उन्हीं के कारण वह इस पूरे क्षेत्र में अशांति उत्पन्न कर रहा था।

शिवाजी को अचानक से चक्कर आ गया. पालकी में बैठे बैठे वह न जाने क्या सोच रहे थे, क्या उतरा जाए पालकी से? उन्होंने अपने मन से प्रश्न किया। उन्होंने पालकी को रुकने का आदेश दिया एवं बाहर निकल आए।

‘बहुत उद्विग्‍नता है क्या महाराज’ उनके वकील से रहा नहीं गया। जो संधि के लिए उनके साथ थे। आप पालकी से क्यों बाहर आ गए हैं? जलवायु भी आपके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है!’ उनके विश्वासपात्र साथियों को उनकी वास्तव में चिंता हो रही थी।

पालकी से उतर कर शिवाजी ने हवा में तलवार घुमाई और हवा में ही मां भवानी को प्रणाम करते हुए बोले ’क्या पता अब इस धरती पर अपना कहने का अधिकार कब मिले? यह क्षण कब इस जीवन में प्राप्त होगा मित्र?’

शिवाजी ने टहलते हुए कहा

’क्यों महाराज! हम संधि ही तो करने जा रहे हैं!’ शिवाजी के मित्र ने चौंक कर कहा! और फिर कुछ किया अफजल की भांति तो, हम सब हैं न!’

’नहीं, यह अफजल नहीं है। यह वीर राजपूत है, जिसकी तलवार वही करती है जो वह चाहती है। यह मुझे धोखे से नहीं मारेगा। यही एक चिंता का कारण है। अफजल के विषय में जो सूचना प्राप्त हुई थी उस के अनुसार वह क्रूर, घमंडी, अधर्मी तथा दुष्ट था, जिसे अपने शत्रुओं को मारने के लिए छल से भी गुरेज नहीं था। जबकि आज हमारे सामने एक राजपूत है। वह राजपूत जिनकी आन, बान और शान किसी से छिपी नहीं है। वह मर जाएगा पर अपने शत्रु पर पीछे से या धोखे से वार नहीं करेगा! यही मेरे लिए चिंता का विषय है। अफजल हो या शाइस्ता दोनों पर वार करना सरल रहा क्योंकि हमने उनके अनुसार रणनीति बनाई थी। परंतु मिर्जा राजे जय सिंह की राजपूताना रणनीति के सम्मुख हमें अपनी रणनीति को बदलना पड़ा!’

शिवाजी नेपथ्य में बोलते चले जा रहे थे!

तारों ने अपनी चादर अब पूरे आसमान पर फैला दी थी। आज तक शिवाजी को रात्रि का यह प्रहर बहुत ही सुंदर लगता था। आज तारों की इस छाँव ने उन्हें पुणे में लालमहल के दुर्ग में अपने बचपन में भेज दिया जहां वह अपनी माँ के आँचल में ही सारे चाँद सितारे पा लेते थे। पर शायद अब अमावस आ रही थी।                                                   

(क्रमश: लेखमाला : भाग - 3)