त्रेतायुग के राम और कलयुग की अयोध्या – विजय मनोहर तिवारी

दिंनाक: 14 Dec 2018 15:14:36


भारत के ज़ख्मों से भरे इतिहास की एक धूलधूसरित कड़ी है अयोध्या। अंधेरे अतीत में एक रोशन मशाल जैसी, जो अपने बीते हुए कल की एक शानदार झलक दिखाती है। अयोध्या की स्मृतियों में क्या-क्या दर्ज होगा? दशरथ के महलों में राम की पहली किलकारी अयोध्या को याद होगी। कौशल्या की गोद में वे रथ पर सवार होकर अयोध्या के राजमार्गों से निकले होंगे। ठुमककर चलते राम के नन्हें पैरों की पदचाप और पायलों का बजना सरयू नदी के तटों ने सुना ही होगा। सरयू ने युवा होते राम को भी कभी किसी किनारे पर मौन में बैठे देखा होगा। राम ने अपने भविष्य की भूमिका पर यहीं-कहीं कुछ सोचा-विचारा होगा। राम के समय की अयोध्या कैसी होगी? वनवास के लिए प्रस्थान करते हुए राम को देखकर अयोध्या पर क्या बीती होगी और जब चौदह साल के वनवास के बाद वे लौटे होंगे तो अयोध्या में क्या दृश्य रहा होगा? आज अगर राम अपनी अयोध्या में आकर देखें तो उनके मन में क्या भाव आएँगे?


अयोध्या की अंतहीन कहानी में कौन जाने कितने अध्याय हैं। कितने किरदार हैं। एक तरह से अयोध्या की आहत स्मृतियाँ उतनी ही पुरानी हैं, जितनी भारत की। अयोध्या जब कुछ कहेगी तो अपने आसपास कुछ वाराणसी से भी पूछेगी, कुछ प्रयागराज से भी कानाफूसी करेगी और मथुरा के पास भी कहने-बताने को उतना ही कुछ होगा। श्रावस्ती से लेकर कौशंबी और सारनाथ भी कई किस्से लेकर आएँगे। मगर इनके वैभव के अध्याय सदियों पहले खत्म हो चुके हैं। ये सदियों के सताए हुए शहर हैं। गंगा, यमुना और सरयू के तटों पर इन बस्तियों ने अपने सबसे चमकदार दौर भी देखे और फिर गहरी अमावस में भी दाखिल हुए।


भारत की एक हजार साल की गुलामी सिर्फ बेरहम बहेलियों की हुकूमत का ही स्याह दौर नहीं था। दस सदियों के बाद जब यह दौर गुजरा तब तक यह देश तीन टुकड़ों में टूट-फूटकर दुनिया के सामने आया। अयोध्या देखकर सहमी होगी। इस टूटफूट में उसके लिए कुछ भी नया नहीं था। अयोध्या की भूमिगत परतों में टूट-टूटकर बिखरी हुई अनंत स्मृतियाँ हैं। राम तो युगों पुरानी कथाओं में अपनी जगह बना चुके थे और उनकी अयोध्या का नाम भी उनके साथ अटूट और अमर हो चुका था। राम तो अपने हिस्से की भूमिका पूरी कर कब भारत की चेतना में जा समाए, कोई नहीं जानता। लेकिन अयोध्या कहाँ जाती? उसे तो यहीं रहना था। भारत की कष्टप्रद यात्रा का एक पड़ाव अयोध्या भी बनी रही। जो कुछ भारत ने अपने हर हिस्से में भोगा-भुगता, अयोध्या के हिस्से में भी वही आया। अयोध्या कैसे बचती और कब तक बचती?

सातवीं सदी में सिंध की सरहदों के लहूलुहान होते ही सामने अखंड भारत वहशियों के निशाने पर आ चुका था। ग्यारहवीं सदी तक लूटपाट और हमलों की बेरहम दास्तानें दिल्ली से कन्नौज और श्रावस्ती तक पसरने लगी थीं। अयोध्या ने उन लुटेरे और खूनी काफिलों को अपने आसपास से धूल उड़ाते और खून बहाते हुए अवश्य ही देखा होगा। एक दिन दिल्ली में चंद खरीदे हुए गुलाम काबिज़ हुए और भारत के आसमान पर सदियों तक चलने वाला ग्रहण फैल गया। दूर होकर भी अयोध्या तक ये बदली हुई हवाएँ आई होंगी। लेकिन 500 साल बीतने के बाद बाबर नाम के एक और लुटेरे हमलावर का नाम अयोध्या से जा चिपका।


विष्णु हरि के एक प्राचीन और भव्य मंदिर की रौनक उस दौर में भी अयोध्या को राम की स्मृतियों से तरोताज़ा रखती होंगी। यह गढ़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र ने बनवाया था। देश के अनगिनत राजवंशों ने हर सदी में अयोध्या में कुछ न कुछ जोड़ा था। मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं थीं। मगर एक समय अयोध्या में कुछ टूटा। कुछ बिखरा। कुछ खत्म हुआ। मलबे में से कुछ नया खड़ा हुआ। अब मंदिर नहीं एक ढाँचा था, जो साढ़े चार सौ साल तक अयोध्या में सीना तानकर खड़ा रहा। इसके साथ राम नहीं, बाबर का नाम था। आज़ाद भारत में यह ढाँचा एक विवाद के रूप में अदालत में जा अटका, जहाँ न्यायालयीन श्रमिक छानबीन करके सच को तलाशने में लग गए। साठ साल तक दो पीढ़ियों के इंतजार के बाद लखनऊ से एक फैसला आया। फिर मामला दिल्ली में जा अटका।

स्वराजप्रकाश गुप्त और ठाकुरप्रसाद वर्मा पुरातत्व के जानकार हैं। अयोध्या के कई कोनों में उन्होंने खुदाइयाँ की हैं। दस्तावेज खंगाले हैं। एक किताब उन्होंने लिखी-अयोध्या का इतिहास एवं पुरातत्व, ऋग्वेद काल से अब तक। इस किताब में उन्होंने 70 से ज्यादा तस्वीरें छापीं। ये किसी मंदिर के टुकड़ों की शानदार तस्वीरें हैं। ये टुकड़े उन्हें ढाँचे के आसपास जमीन की परतों में मिले थे। इनमें एक शिलालेख भी था, जिसमें यह खुलासा हुआ कि ढाँचे की जगह पर बने मंदिर को किसने और कब बनवाया था। यह ढाँचा एक लावारिस और वीरान इमारत की शक्ल में था, जो मंदिर की जगह पर खड़ा था। इसकी वजह से अंग्रेजों तक 78 जानलेवा झगड़ों का रिकॉर्ड भी अयोध्या की याददाश्त में है।

अयोध्या में क्या था और क्या हुआ था, इसका पता बहुत लोगों को न चल पाता लेकिन एक रथयात्रा ने आहत अयोध्या का यह अध्याय दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। वह लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से निकली रथयात्रा थी। भारत के गाँव-गाँव और गली-गली में कई जोशीले नारे गूंज उठे थे। वह यात्रा तो अधबीच में रोक दी गई थी लेकिन अयोध्या का आँसू भारत के गालों पर ढुलक गया था। दिसंबर 1992 में वह 500 साल पुराना ढाँचा बेकाबू भीड़ ने जमीन पर ला दिया।

साभार:- स्वराज्य