गीता जयंती विशेष : समग्रता का उपदेश देता गीता का दर्शन – राजेश पाठक

दिंनाक: 18 Dec 2018 18:57:35


‘क्रोध से सम्मोहन होता है, सम्मोहन से स्मृति लोप. स्मृति के लोप हो जाने से बुद्धि का नाश, और बुद्धि के नाश होने से व्यक्ति का नाश हो जाता है.’-[गीता:२-६६]. जीवन के नाश से बचने के लिए क्यों व्यक्ति को क्रोधादि अपने मानसिक आवेगों पर संयम रखना चाहिए उपरोक्त श्लोक इस बात का हमें बोध कराता है. वर्तमान दौर में पर्यावरण का चक्र बेलगाम उपभोग से ज्यादा बिगड़ा है. और यहाँ भी संयम के साथ-साथ त्याग  के पालन का गीता में अपनी तरह से प्रतिपादन किया गया है-

 ‘‘ये जगत का चक्र लेन-देन  पर चलता है;पर जो बिना दिये,लेता ही रहता हैऔर इस चक्र को तोड़ने का भागी बनता है उस इन्द्रिय लम्पट का जीवन पाप रूप है, व्यर्थ है.’[गीता:३-१२,३-१६]

 सयंम, त्याग पर अधिक आग्रह होने के कारण एक धारणा यह भी बनी की हिन्दू धर्म में सांसारिक-सुख या कर्म का महत्व कम है. जबकि गीता में कर्म उनके लिए भी जरूरी बताया गया है जो कि वैराग्य धारण कर सन्यास मार्ग पर निकल पड़े  हैं. ‘ जिस प्रकार अज्ञानी स्वार्थ पूर्ती के लिए कर्म करता रहता है , उसी प्रकार ज्ञानी लोक-कल्याण चाहता हुआ कर्म करे.’[गीता-३-२५]