1000 साल पुराना राजा भोज का नगर नियोजन आज भी झलकता है भोपाल में - विजय मनोहर तिवारी

दिंनाक: 31 Dec 2018 17:01:19


1000 साल पुराने नक्शे पर देश के शायद ही किसी और शहर की बसाहट इतनी स्पष्ट हो, जितना मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की है। यह बात तो सब जानते हैं कि परमार वंश के महान् राजा भोज ने भोपाल शहर को बसाया था। भोपाल नाम की उत्पत्ति भी भोज से ही है। भोपाल का बड़ा तालाब भी जिस विशाल बांध पर बना, वह भी राजा भोज ने ही बनवाया था। सिर्फ यही नहीं, भोपाल से भोजपुर के बीच ऐसी कई संरचनाएँ आज भी नज़र आती हैं, जिनका निर्माण भोज के समय हुआ। लेकिन मंदिरों और तालाबों से हटकर शहर की प्लानिंग का एक अलग ही महत्त्व है। खुशकिस्मती है कि समय का इतना अंतराल होने के बावजूद अपने मूल डिज़ाइन में भोपाल आज भी दर्शनीय है।


आज वर्ष 2018 में हम 1000 साल के फासले में इस छोर पर खड़े हैं। इस बीच भारत के इतिहास में बड़े भयानक अंधड़ गुजर चुके हैं, जिनमें हमारा काफी कुछ बरबाद हुआ है। बड़े पैमाने पर हमारी पहचानें बदली हैं। पुरानी रियासतों पर बेहिसाब कब्जे हुए हैं। फिर उनमें मनमाने ढंग से नाम परिवर्तन, पुरानी इमारतों, महलों, मंदिरों में व्यापक तोड़फोड़ और उनकी जगह उन्हीं के मलबे से हर कहीं नए बदशक्ल निर्माण हुए। समय की कई परतों में असल इतिहास छुपा हुआ है या हमारी याददाश्त से ही गुम है। लेकिन भोपाल की सच्चाई मटमैले पानी के भीतर किसी पत्थर पर खुदी साफ इबारत की तरह आज भी पढ़ी जा सकती है। भोज के नक्शे के भोपाल की कुछ रेखाएँ ज़रूर धुंधला चुकी हैं। जैसे, लोहा बाज़ार से लेकर इतवारा होकर पीरगेट तक वह पुरानी खाई गायब है। लेकिन पुराने अवशेष कहीं-कहीं दुकानों-मकानों से झाँकते हैं। बदले हुए नामों के साथ चंद पुराने दरवाजों का वजूद अब तक कायम है।

हर दीवार 660 मीटर लंबी- राजा भोज का समय है ईसवी सन् 1010 से 1050 बीच। यानी पूरे एक हजार साल पहले। तब भोज ने जिस शहर का डिज़ाइन बनाया था, वह आज के जुमेराती गेट, पीरगेट, इब्राहिमपुरा और इतवारा के बीच था। वह एक स्मार्ट टाउन प्लानिंग की आदर्श मिसाल है। गूगल मैप से आज भी उस नक्शे को एकदम स्पष्ट देखा जा सकता है। वह छोटा-सा भोपाल तब 12 दरवाज़ों के साथ एक चौकोर चारदीवारी से घिरा हुआ था। हर एक दीवार की लंबाई 660 मीटर थी। दुर्ग की चारदीवारी से सटकर चारों तरफ शहर को घेरने वाला एक रिंगरोड भी था। दुर्ग की दीवार के बाहर एक गहरी खाई सुरक्षा के मद्देनज़र थी। खास बात यह है कि बड़े तालाब का पानी इस खाई  से होकर चारों तरफ बहता हुआ नीचे की तरफ ओवरफ्लो होता था। उस डिज़ाइन के अनुसार बनाए गए शहर के बीचों-बीच था एक विशाल चौराहा, जो आज का चौक बाज़ार है।

डिज़ाइन का आधार समरांगण सूत्रधार- ख्यात शोधकर्ता संगीत वर्मा और नेहा तिवारी ने पाँच साल पहले एक केस स्टडी की-“सिटी प्लानिंग ऑफ़ राजा भोज इन समरांगण सूत्रधार।” राजा भोज और उनके बनाए तालाब और भोपाल शहर का सामान्य ज्ञान इसके पहले सबको था। इस केस स्टडी से भोज की कल्पना के भोपाल का असल डिज़ाइन पहली बार सामने आया। संगीत वर्मा का कहना है कि 660 मीटर लंबाई की चारों दीवारों के भीतर 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटती सड़कों का जाल बिछाया गया था और इनके बीच अलग-अलग इस्तेमाल के लिए बसाहटें तय हुई थीं। अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी, कारीगर, पुरोहित और सेना के ठिकाने कहाँ होंगे, यह तय था। किसी आपात स्थिति में अगर शहर को खाली करना पड़े तो हर ब्लॉक से बाहर जाने के लिए दो दिशाओं में दरवाजे थे। भोज के वास्तु ज्ञान और भोपाल के डिजाइन की पुष्टि “समरांगण सूत्रधार” नाम की एक किताब से की गई है। यह राजा भोज की ही लिखी वास्तु पर बेशकीमती किताब है। इसमें बताए गए तरीकों से बाकायदा वही डिज़ाइन बनता है, जैसा पुराने भोपाल का हमने देखा। भोपाल के स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने तो इस केस स्टडी के बाद समरांगण सूत्रधार को पीजी कोर्स में शामिल किया था। इतना ही नहीं स्कूल के तत्कालीन डीन प्रोफेसर अजय खरे ने राजा भोज की राजधानी धार पर भी ऐसी ही एक केस स्टडी कराई थी।

शहर के केंद्र में ब्रह्मस्थान की कल्पना- शहर के एकदम बीच सबसे बड़ा चौराहा आज का चौक बाजार है, जहाँ चारों दीवारों के बीच में बने प्रमुख प्रवेश द्वारों से आए रास्ते एक दूसरे को 90 डिग्री पर काटते हैं। मप्र आदिवासी एवं लोककला अकादमी के पूर्व निदेशक और भारतीय संस्कृति के जाने-माने अध्येता डॉ. कपिल तिवारी का मानना है कि राजा भोज सिर्फ एक शासक नहीं थे। वे कई विषयों के ज्ञाता भी थे। वास्तु और सिटी प्लानिंग की उनकी समझ अद्भुत है। मैं शहर के बीचों-बीच ब्रह्मस्थान की कल्पना से अभिभूत हूँ। एक शहरी बसाहट में यह एक दार्शनिक शाासक की संसार को सबसे बड़ी देन है। सवाल यह है कि इस ब्रह्मस्थान पर भोज के समय क्या बनाया गया था? सन् 1720 के बाद भोपाल में नवाबों की सल्तनत शुरू हुई। यहाँ कई बेगमों ने भी नवाब की गद्दी से राज किया है। कुदसिया बेगम ऐसी ही एक नवाब हुई हैं। उनकी एक किताब है-हयाते कुदसी। इसमें जामा मस्जिद के निर्माण की जानकारी है। इसका निर्माण 1832 में शुरू हुआ और 1857 में पूरा हुआ था। यह किताब इस जगह पर मिले एक प्राचीन शिलालेख का ब्यौरा इन शब्दों में देती है-इस स्थान पर प्राप्त पुराने सभामंडल के एक शिलालेख पर लिखा था कि राजा उदयादित्य की पत्नी रानी श्यामली ने सभा मंडल नाम से पत्थर का एक विशाल मंदिर बनवाया था। सन् 1151 ईसवी में इसका निर्माण शुरू हुआ और 1184 में पूरा हुआ। राजा और रानी ने यहाँ 500 ब्राह्मणों को नियुक्त किया था, जो यहाँ पूजा के अलावा चार वेद, छह शास्त्र और 18 पुराणों के अलावा संस्कृत की अन्य शाखाओं की शिक्षा देते थे।

इल्तुतमिश के हमले में तबाही- संभवत: भोज के जीवन के अंतिम वर्षों में भोपाल में ये विशाल निर्माण कार्य हुए। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि अपनी वैभवशाली धारा नगरी से बाहर भोज इस पैमाने पर खुद को यहाँ क्यों केंद्रित कर रहे थे। क्या वे धार से राजधानी को बाहर स्थानांतरित करना चाहते थे? अगर हाँ तो इसका कारण क्या है? धार पर कौन से संकट आ गए थे? राजा भोज के बाद ढाई-तीन सौ सालों तक परमार राजाओं का सितारा बुलंद रहा। लेकिन पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ ही दिल्ली पर गुलाम वंश के सुलतानों के काबिज होने के चालीस साल के भीतर पहली बार सन् 1235 में इल्तुतमिश ने इस इलाके पर भीषण हमला बोला था। पूरे भूभाग के सारे पुराने महल-मंदिर मिट्‌टी में मिला दिए गए थे। उज्जैन का प्रसिद्ध महाकाल मंदिर इसी धावे में ध्वस्त किया गया था। इस इलाके से हुई बेहिसाब लूट के विवरण तत्कालीन लेखकों ने लिख छोड़े हैं।

हेरिटेज सिटी का दावा- परमार राजाओं की मंदिर निर्माण शैली के विशेषज्ञ इतिहासकार डॉ. रहमान अली का कहना है कि परमार राजाओं ने भोपाल में शहर, बांध और मंदिर के हैरतअंगेज निर्माण कराए हैं। भोज की कल्पना के आधार पर भोपाल यह दावा कर सकता है कि यह भारत की एक ऐसी हेरिटेज सिटी है, जिसकी प्लानिंग दस्तावेज पर भी है और आप शहर को भी देख सकते हैं। पुरातत्वशास्त्री पूजा सक्सेना के अनुसार भोज के समय छोटा तालाब नहीं था। बड़े तालाब का पानी शहर के चारों तरफ खाई में होकर बहता था। यह नगर की सुरक्षा के लिए एक बाहरी इंतजाम था।

परमार वंश के आखिरी राजा महलकदेव थे, जिनके बाद भोज की महान विरासत इतिहास के अंधेरे में खोने लगती है। भोपाल में उनके बाद क्या हुआ, इसके विवरण न के बराबर मिलते हैं। फिर 1720 के आसपास गोंड वंश की रानी कमलापति पटल पर आती हैं, जिनके समय दिल्ली से भागकर आए अफगान दोस्त मोहम्मद खान के किस्से इतिहास में जुड़ने लगते हैं। वह भोपाल के