वीर शिवाजी गाथा - सोनाली मिश्र (लेखमाला : भाग -1)

दिंनाक: 05 Dec 2018 19:03:22


भोपाल(विसंके). वर्ष 1665 का समय था। 1659 में अफजल खान का वध करने के उपरान्त पूरे भारत में शिवाजी के पराक्रम की चर्चाएं जोरो पर थीं। दक्‍क्‍न का भगवा उत्‍तर में मुगलिया सल्‍तनत के माथे पर रोज ही बल पैदा कर रहा था। विरासत में मिले इस साम्राज्‍य के दम पर औरंगजेब खुद को आलमगीर घोषित किए बैठा था। बार-बार वह सोचता कि आखिर शिवाजी में ऐसा क्‍या खास है जो महान चंगेज खान का वंशज, अपने पिता और भाइयों को मौत की नींद सुलाने वाला, पूरे संसार में अपनी क्रूरता का डंका बजाने वाला आलमगीर औरंगजेब भी उसके विजय रथ को रोक नहीं पा रहा था। बार बार वह अपना चेहरा आईने में देखता और पूछता कि क्‍या मैं कभी दक्षिण में जा नहीं पाउँगा। उसके मन में नैराश्‍य भर रहा था। वह बार बार अपने महल की सीढियों पर चलता, कभी उतरता। शाइस्‍ताखान पर हुए हमले ने औरंगजेब को भयभीत भी कर दिया था। रत्‍न जड़ित उसका मुकुट न जाने कितनों के खून से सना हुआ था, न जाने कितने मंदिरों को ध्‍वस्‍त कर उनकी राख से अपने मुकुट व राज सिंहासन को नहला चुका था। क्या मुगलों का गौरव इसी प्रकार अधूरा रह जाएगा। दुनिया उसकी ओर देख रही थी। ईरान आदि स्‍थानों से संदेशे आ रहे थे। शिवाजी के द्वारा सूरत पर आक्रमण के उपरांत मुगलों की जग हंसाई हो चुकी थी। ब्रिटेन में सूरत पर शिवाजी के आक्रमण को अखबारों में प्रमुखता से स्‍थान दिया था। चूहा इतना बड़ा जाल काट रहा था, क्‍या यह जाल पूरी तरह कट जाएगा? और बिखर जाएगा सब कुछ? आलमगीर के संताप का पारावार न था। उसके दिल में पीड़ा पूरी तरह अपना साम्राज्‍य स्‍थापित कर चुकी थी। उसने अपने सबसे विश्‍वासपात्र मिर्जा राजे जयसिंह को शिवाजी को कैद करके लाने का जिम्‍मा सौंपा। ‘दोस्‍त अब मुगल साम्राज्‍य की इज्‍जत तुम्‍हारे हाथ में है।‘ राजपूत ने वचन दिया और चल दिया मराठों की तरफ। दो वीर, दो रणनीतिकार, मां की दो संतानें अतिशीघ्र ही एक दूसरे के सामने थीं। एक तरफ उत्‍तर की मुगल सेना थी जिसमें लाखों की संख्‍या में पैदल, घुडसवार तथा हाथी सहित गोला बारूद था और दूसरी तरफ स्‍वराज्‍य का संकल्‍प लिए भगवा ओढे मराठा। मिर्जा जय सिंह न केवल वीर था बल्‍कि वह कुशल योजनाकार भी था। उसने ऐसी रणनीतिक चाल चली व घेराबंदी की मराठा सेना को न केवल पीछे होना पडा बल्‍कि शिवाजी महाराज को वार्ता के लिए आना पड़ा। 


केसरिया स्‍वराज्‍य का स्‍वप्‍न लिए शिवाजी महाराज बहुत ही टूटे मन से मिर्जा जयसिहं के शिविर में पहुंच रहे थे। एक एक कदम उन्‍हें अपनी मां से दूर करता जा रहा था। मां भवानी अपने पुत्र के साथ इतना अन्‍याय नहीं कर सकती। वह खाली खाली आंखों से आकाश को देखते और एक बार फिर से आंखों में आए आंसू को गाल पर आने से रोकते। क्‍या बस स्‍वराज्‍य इतना ही रह जाएगा। नहीं नही। मां ऐसा नहीं करेगी। पुरंदर के दुर्ग में अपने सैनिकों के शवों की सूचना ने उन्‍हें विचलित कर दिया था। शिवाजी को अपनी मां की याद आई। उन्‍हें अपने कंधे पर जीजाबाई का स्‍पर्श अनुभव हुआ। शिवाजी भूमि पर बैठ गए। क्‍या यह भूमि कल उनके पास नहीं रहेगी? उनके अंतस में दर्द का पारावर न था। मिर्जा जय सिहं उनकी प्रतीक्षा मे था। उदास और क्‍लांत शिवाजी को जीजाबाई ने जैसे कहा ‘कभी कभी आगे बढने के लिए एक कदम पीछे लेना होता है। यह देह देश के लिए है, स्‍वराज्‍य हित जीवन है तुम्‍हारा, तुम पर इस भूमि का ऋण है तथा हर हाल में यह चुकाना है। मां भवानी तुम्‍हे शक्‍ति देंगी।‘ 

चूहे को अपने दांत नुकीले करने के लिए समय चाहिए था, संधि संभ्‍वतया दांत नुकीला करने का समय दे। 

शिवाजी एक नई मुस्‍कान के साथ मिर्जा जय सिंह के शिविर की तरफ चल पडे थे।