10 फरवरी / जन्मदिवस -महर्षि दयानन्द सरस्वती - राष्ट्रवाद के पुरोधा - हिन्दी के योद्धा सेनानी

दिंनाक: 10 Feb 2018 13:56:04


भोपाल(विसंके). 19वीं सदी में भारतवर्ष में नवजागरण का आरम्भ ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय से आरम्भ होता है राजा राममोहन राय उच्चकोटि के महान पुरूष और अनेक भाषाओं के जानकार थे. स्वामी दयानन्द उनसे लगभग 50 वर्ष पीछे आते हैं. इस शताब्दी में भारतवर्ष के इतिहास में बड़े-बड़े महापुरूषों का जन्म हुआ था. राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर,  श्री केशवचन्द्र सेन, ज्योतिबा फुले, न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे, दादाभाई नौरोजी आदि नेता और सुधारकों ने अपनी आभा से भारतवर्ष को अलंकृत किया था. इन्हीं सब महापुरूषों में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का प्रादुर्भाव हुआ था. स्वामी जी का व्यक्तित्व नेतृत्व और अपनी महिमा से अपना स्थान सबसे अलग रखता है. अरविन्दघोष ने स्वामी जी को वेदार्थ का श्रेष्ठ उद्धारक और वेदों का वास्तविक भाष्यकार बताया था राजाराम मोहनराय, केशवचन्द्र सेन, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, महादेव गोविन्द रानाडे, दादाभाई नौरोजी सभी महापुरूष अंग्रेजी विद्या के विशारद थे. किन्तु स्वामी दयानन्द अंग्रेजी भाषा साहित्य से सर्वथा अनभिज्ञ थे. भारतवर्ष में सर्वप्रथम स्वराज्य का नारा स्वामी दयानन्द ने बुलन्द किया था. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात जब महारानी विक्टोरिया ने भारतवर्ष का शासन ब्रिटानिया सरकार के हाथों ले लिया और यह घोषणा की कि अंग्रेज सरकार भारत की प्रजा के साथ पक्षपात रहित न्याय करेगी तब स्वामी दयानन्द जी ने अपने सत्यार्थ प्रकाश में बडा मुहतोड़ उत्तर दिया था.


’’विदेशी राज्य चाहे जितना अच्छा हो, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, सन्तानवत् प्रजाओं का पालन करने वाला हो, वह स्वदेशी शासन से अच्छा कभी नही हो सकता.’’

राष्ट्रवाद का त्रिसुत्री कार्यक्रम:-

स्वामी दयानन्द के अनुसार राष्ट्रवाद के तीन घटक हैं 1. एक भाषा 2. उचित अनुचित का एक विचार 3. एक धार्मिक चारित्रिक मान्यता. स्वामी दयानन्द ने एकता पर बहुत बल दिया था. उस समय भारतवर्ष में कई भाषाएं अनेकों छोटे-छोटे रजवाडे, अनेकों साम्प्रदायिक पंथ विद्यमान थे. स्वामी दयानन्द सभी को एक सूत्र में पिरोना चाहते थे. उनका निश्चित विचार था कि जब राष्ट्र के चिन्तन, विचार, मान्यता, धर्म और राज्य में एकता होती है तभी राष्ट्रवाद बलवान बनता है. स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा घोषित किया और सारे देश को जोड़ने वाली भाषा बताया. स्वामी जी ने वेदधर्म को सम्प्रदाय पंथ निरपेक्ष घोषित किया और सभी राज्य की इकाईंयां एकत्र होकर एक भारत राष्ट्र बनावें यह प्रेरणा दी. सारांश यह है कि स्वामी जी ने एकता पर बडा जोर दिया. एक हिन्दी भाषा एवं एक वेदधर्म  और एक भारत राष्ट्र, ये तीनों राष्ट्रवाद के लिए आवश्यक तत्व है.

राष्ट्रभाषा का प्रचार:-

राष्ट्रीयता के आन्दोलन के काल में स्वामी दयानन्द जी प्रथम व्यक्ति हैं जिन्होंने यह अनुभव किया कि राष्ट्रीयता की भावनात्मक एकता और राष्ट्रीय उत्थान के लिए सम्पूर्ण देश की एक भाषा होना चाहिये. इसके लिये उन्होंने सभी देशी भाषाओं में हिन्दी को सबसे अधिक उपयुक्त पाया स्वामी जी जन्म से गुजराती थे किन्तु उन्होंने अपनी मातृभाषा को भी छोडकर हिन्दी को सारे राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने के रूप में स्वीकार किया. हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ है. उन्होने अपना युगान्तकारी ग्रन्थ रत्न सत्यार्थ प्रकाश हिन्दी में लिखा. लाखों व्यक्तियों ने सत्यार्थ प्रकाश पढने के लिए हिन्दी सिखी. उन्होंने कर्मकाण्ड का ग्रन्थ संस्कार विधि का भावार्थ भी हिन्दी में लिखा. ये सारे कार्य अपने क्षेत्र के सर्वप्रथम कार्य थे. उन्होंने सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए देवनागरी लिपि में हिन्दी भाषा का प्रचार ही नहीं किया अपितु आन्दोलन भी किया.

हिन्दी के योद्धा सेनानीः-

 जिस समय स्वामी दयानन्द कार्यक्षेत्र में उतरे, उस समय हिन्दी भाषा की दो धराएं चल रहीं थीं. एक राजा लक्ष्मणसिंह की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी और दूसरी राजा शिवप्रसाद की उर्दू फारसी भरी हिन्दी. स्वामी जी ने राष्ट्रीयहित और सांस्कृतिक उत्थान की दृष्टि से हिन्दी के महत्व का अनुभव कर लिया था. स्वामी जी ने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ ’सत्यार्थ प्रकाश’ हिन्दी में लिखा जिसकी लाखों प्रतियां देश में फैल गयीं, आर्य विद्वानों और आर्यसमाज ने हिन्दी के समर्थन में जो मोर्चा लिया, उसने उर्दू को उखाड ही दिया. स्वामी जी की भाषा कठोर, कटु है किन्तु क्रान्ति मृदु, मृदुल, मधुर बात से नहीं होती, ऑपरेशन सुखद नहीं होते. स्वामी दयानन्द जी को सफलता मिली और बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश राजस्थान, पंजाब कई राज्यों में हिन्दी का खूब प्रचार हुआ और उत्तर-प्रदेश और बिहार में तो हिन्दी राज्य की भाषा हो गई.

हिन्दी के नये आयाम:-

 स्वामी जी ने सम्भवतः सर्वप्रथम दार्शनिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सामाजिक, राजनैतिक, प्रश्नों की विवेचना में हिन्दी का प्रभावपूर्ण प्रयोग आरम्भ किया. स्वामी जी से पूर्व हिन्दी गद्य कुछ कथा कहानियों और भक्ति विषयक कुछ गिने-चुने ग्रन्थों तक ही सीमित था. उसे स्वामी जी ने सर्वतोमुखी आयाम दिया. रीतिकाल के नायिका भेद वाले साहित्य की महिमा घट गयी और राष्ट्रप्रेम, देशोद्धार और समाज सुधार की भावनाएं प्रबलता के साथ आगे बढीं. निश्चित रूप् से इस सबका श्रेय स्वामी दयानन्द की सुधारवादी भूमिका को जाता है. राष्ट्र कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त की सुप्रसिद्ध स्वामी जी के लगभग सभी सुधारों का प्रबल समर्थन उपलब्ध होता है. राष्ट्रकवि दिनकर जी के शब्दों में ’साकेत’ के श्रीराम स्वामी दयानन्द के ’कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ का नारा लगाने हैं.

साभार: महाकौशल संदेश