11 फरवरी/ पुण्यतिथि / पंडित दीनदयाल उपाध्याय - पंडित दीनदयाल की कल्पना, राजनीति को जोड़क संधि सुधा बनाने की थी – भारतचंद्र नायक

दिंनाक: 12 Feb 2018 15:07:30


भोपाल(विसंके). लोकतंत्र को प्राणवान बनाने के लिए लोकतंत्र प्रेमी में सत्ता के प्रति अनासक्तिका भाव होना आवश्यक है. पं. दीनदयाल उपाध्याय कहा करते थे कि प्रभु रामचन्द्र ने लोकतांत्रिक भावना को जीकर दिखाया है. जब उनके राज्यारोहण की अयोध्या में तैयारी हो रही थी उनका मन इस बात को लेकर विचलित था कि चार भाईयों में उन्हें ही राजसत्ता सौंपने की तैयारी क्यो? प्रभु रामचन्द्र ने राज सत्ता से सहर्ष विमुख होकर जिस अनासक्त भावना से वन गमन किया यह जनमत का सम्मान था. पंडित जी चाहते थे कि जिस तरह एक आदर्श खिलाड़ी यश पाने की लालसा से खेलता और और विजय की अभिलाषा तो रखता है लेकिन पराजय को भी हंसते हंसते स्वीकार करता है और विजेता को बधाई देता है गले लगाता है वह सच्चा लोकतांत्रिक है.


पंडित जी के जीवन का लक्ष्य राजनीति को लोकनीति बनाना था जिससे राजनीति का लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं राष्ट्र का संवर्घन हो. राजनीति राष्ट्र के लिये समर्पित हो. उसका स्वभाव जोड़ने का हो, लेकिन सोचनीय विषय हे कि यह आज विपरीत क्रम चल रहा है. आज राजनीति समाज में विग्रह का सबब बन गई है जिसका पंडित जी ने जीवन पर्यन्त परिष्कार करने का यत्न किया. दलीय राजनीति में भी पंडित जी के जीवन में एक मौका ऐसा आया जब डॉ. श्यामाप्रसाद मूखर्जी के अवसान के बाद जनसंघ का सत्तासूत्र संभालते हुए अध्यक्ष मौलीचन्द्र शर्मा ने पं. दीनदयाल को पदावनत करने का कुचक्र चलाया. पंडित दीनदयाल समझ गये, लेकिन कतई विचलित नहीं हुए. न ही उनका हिन्दू राष्ट्रवाद से किंचित मोह भंग हुआ. अपितु अपनी शक्ति नागपुर में बनाये जा रहे पूज्यनीय डॉ. हेडगेवार के स्मृति मंदिर के निर्माण में लगा दी. बाद में उन्होंने अपने लेख में समकालीन पीढ़ी को संबोधित लेख में कहा कि विडंबना है कि राजनीति जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करने लगी है, जो उचित नहीं है. जोड़ने वाली कड़ियों को समर्थ बनाने की आवश्यक है. विचार भिन्नता का उपयोग विभाजन के लिए नहीं किया जाना चाहिए. चुनावों को लेकर अक्सर मत भिन्नता हो जाती है, लेकिन इस मत भिन्नता को जीवन में संस्कार नहीं बना लेना चाहिए. इसे आकस्मिकता मानकर विस्मृत कर देना चाहिए. लोकतंत्र में अपनी गैर सहमति में भी गरिमा बनाये रखना लोकतंत्र प्रेमी का फर्ज है. अपितु राष्ट्र की एकता, समाज की एकता, दल की एकता के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ को तिलांजलि देने का सामर्थ्य विकसित करना चाहिए. समाज हित में बाधक होने तक व्यक्तिगत लालसा, व्यक्तिगत हित को, व्यक्तिगत असहमति को नहीं बढ़ने देना चाहिए.

विरोध के प्रति सहिष्णुता उनका आग्रह था वे मानते थे कि हमारा आज का विरोधी आने वाले कल का मतदाता कल का मतदाता परसों का सदस्य और सक्रिय कार्यकर्ता होगा. इसके लिए हमारी निष्ठा, हमारी क्षमता, समाज हित कसौटी बनेगी जिस पर हमें खरा उतरना होगा. वे जनहित की पूर्ती में आन्दोलन को पूरक मानते थे लेकिन कहते थे कि आंदोलन अंतिम विकल्प होना चाहिए. इससे जन जाग्रति पैदा होती है. आन्दोलन का अस्त्र अपनाने के पहले हमें संवाद, संपर्क, सभा, सम्मेलन प्रदर्शन का, चौपाल का मौका एक माध्यम भी खंगालना चाहिए. पंडित जी कहते थे कि आंदोलन के कारण लोकतंत्र की मर्यादा आहत न हो. संवैधानिक गरिमा को चोट न पहुंचे. लोकतंत्र में विचार विनिमय को पर्याप्त स्थान होना चाहिए. यदि संवाद में गरिमा, विरोध का सम्मान होगा तो सहमति का रास्ता भी खुल सकता है. क्रांति विध्वंस के साथ नवनिर्माण करने में सक्षम हो. केवल विध्वंस करने वाली क्रांति उन्हें अभिप्रेत नहीं थी. वे कहते थे कि देश की दुरावस्था का राजनैतिक लाभ उठाना राजनैतिक दलों का कर्त्तव्य नहीं हो सकता. पंडित जी के इन्ही उच्च विचारों के कारण उनकी लोक संग्रही राजनेताओं में गणना हुई. जब भी देश पर आंच आई पंडित दीनदयाल ने यह नहीं देखा कि सत्ता शिखर पर कौन है? उन्होंने अपने सारे आंदोलन स्थगित करने का आदेश दिया और मानव संसाधन को सरकार के पूरक के रूप में कार्य करने में शक्ति साधन झौक दिये. चाहे चीन का युद्ध हो या पाकिस्तानी आक्रमण भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने घरेलु मोर्चा पर जो सेवाएं दी उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना हुई. इससे जनसंघ की स्वीकार्यता बढ़ी और विस्तार हुआ. तभी पंडित नेहरू जो कभी राष्ट्रवादी संगठन को कुंचल देने का दंभ भरते थे उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित कर मान्यता दी थी.

आंदोलन को समस्या के समाधान का विकल्प मानने के साथ पंडित जी ने आग्रह और दुराग्रह को भी स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखा. इसका एक उदाहरण पर्याप्त होगा, इससे जनसंघ का सोच विशिष्टता लिये दिखाई देगा. उत्तरप्रदेश में 1958 में अकाल की स्थिति पैदा हो गई. भारतीय जनसंघ ने अकाल पीड़ितों के समर्थन में अन्न सत्याग्रह का ऐलान किया. उनकी तीन मांगे थीं। 1. अकाल ग्रस्त क्षेत्रों में लगान स्थगित हो. 2. हर पांच हजार जन संख्या पर एक अनाज की दुकान खोले. 3. छात्रों का शुल्क माफ हो. दूसरे राजनीतिक दल प्रजा समाजवादी पार्टी की मांग देखे जो दुराग्रह के अंतिम छोर तक जाती है. उसने अन्न भंडारों पर अधिकार करने का ऐलान कर डाला था. नतीजा यह हुआ मथुरा और फरूखाबाद में अन्न भंडार लूट लिये गये, अराजकता फैल गई.

पं. दीनदयाल को राजनीति का सूक्ष्म अध्ययन था. परिस्थिति की पदचाप सुन लेते थे. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का लोकतंत्र प्रेम स्थाई भाव नहीं है. लोकतंत्र कांग्रेस की सूरत और सीरत नहीं है. कांग्रेस का लोकतंत्र प्रेम सत्ता तक सीमित होगा. 1961 में उन्होंने चेतावनी दी थी कि लोकतंत्र प्रेमियों को सोचने का समय आ गया है. नई दिल्ली लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र और कमला नगर निगम निर्वाचन क्षेत्र में उपचुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस ने लोकतंत्र विरोधी कार्य करके अपनी असलियत सामने रख दी. कांग्रेस बहुमत मिलने तक लोकतंत्र प्रेमी होती है. लेकिन पराजित कर दिये जाने के बाद वह जनता के फैसले का सम्मान नहीं करती. अपनी कुंठा और पराजय का ठीकरा संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने में देर नहीं करती. वर्तमान परिस्थितियां इसकी साक्षी हैं. कृषि-खेती देश में एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है जिससे देश की आत्मनिर्भरता बनी हुई है. सामाजिक तानाबाना बना है, लेकिन पं. नेहरू के युग में इस खेती पर भी सामुदायिक खेती सहकारी खेती का भूत सवार हो गया था. पं. नेहरू, महान समाजवादी अशोक मेहता, राजाजी से लेकर वामपंथी नेता नम्बुद्रीपाद तक सहकारी खेती का गीता गा रहे थे. निजी उद्यम, सरकारी उद्योग, निजी व्यापार सरकारी व्यापार प्रश्नों पर बहस जारी थी।.बिना सहकार नहीं उद्धार के बोर्ड चारों ओर लगे थे. तब पं. दीनदयाल ने इसे वामपंथी विचारधारा का विस्तार बताया था. इसे अवैज्ञानिक और भौतिकवादी मानते हुए उसका विरोध किया था. केरल में कम्यूनिस्ट ऐसा कर चुके थे और कांग्रेस इसे आदर्श व्यवस्था मानकर अपनाने पर आमादा थी जिसका पंडित जी के नेतृत्व में जनसंघ ने विरोध किया था. यदि कृषि में प्रगति हुई है इसका श्रेय अन्नदाता किसान को है. यदि सहकारी सरकारी खेती होती तो ढाक के तीन पात आज दुख देते. अन्न के मामले आत्म निर्भरता देश में अधूरा स्वप्न बनकर रह जाती. पं. दीनदयाल का विरोध दूरदर्शितापूर्ण सिद्ध हुई है.

जब एक कार्यकर्ता ने पंडित जी से सामुदायिक सहकारी, सरकार खेती के विरोध का कारण पूछा और कहा कि इसके अपनाने से जनसंघ को इससे दलीय लाभ होगा। तब पं. दीनदयाल ने कहा था कि क्या दलीय लाभ के लिए हम राजनीति करते हैं. क्या दलीय नफे के लिए राष्ट्र के भविष्य को खतरे में डालना हमारी राजनैतिक नैतिकता होगी. पंडित जी राज्य सत्ता साधक राजनेता नहीं थे। उनकी मान्यता थी कि सहकारीकरण और सरकारीकरण से न उद्यम का लाभ होगा और न जनता को। बाद में उन्होंने मध्यप्रदेश का उदाहरण भी दिया था कि केंद्र और सरकार ने दावा किया कि वे प्रदेश की जनता के हित में गेहॅू की खरीद कर रहे हैं। प्रदेश में गेहूं की खरीद किसानों से 13 रू. प्रतिमन (करीब 37 कि.) के हिसाब से की गई। फिर केंद्र सरकार नेप्रदेश सरकार से 19 रू. मन से खरीदा। बाद में जब मध्यप्रदेश को नागरिक उपयोग के लिए गेहॅू का कोटा आवंटित किया तो केंद्र ने राज्य से 24 रू. मन का मूल्य बसूला. सरकारी खरीद बिक्री में प्रति मन 11 रू. का फर्क. किसान को सिर्फ 13 रू. मन का मूल्य मिला और उपभोक्ता से 24 रू. मन की कीमत बसूली गई तब समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने भी पं. दीनदयाल के तर्क को न्याय संगत माना था. समाजवाद को कांग्रेस ने पुनीत शब्दावली के रूप में अख्तियार किया और धडाधड़ राष्ट्रीयकरण कर सरकार पर बोझ डाल दिया. उसका खमियाजा देश की जनता आज तक भुगत रही है। राजनीति में रहकर भी राजनीति से विरक्त, अनासक्त हरपल राष्ट्र चिन्ता उनकी प्रतिबद्धता थी.

पं. दीनदयाल ने पं. नेहरू को चेताया था कि विदेश नीति पर रक्षा मंत्रालय की निर्भरता के खतरनाक नतीजे होंगे. तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन का दृष्टिकोण वामपंथी होने से कभी भी देश पर जोखिम आ सकता है और उनकी भविष्यवाणी 1962 में सही साबित हुई। पं. जी ने मेनन को हटाने के लिए आंदोलन का आव्हान किया था. उन्होंने कहा था कि पं. नेहरू जनता के धैर्य की परीक्षा लेकर भविष्य को खतरे मे डाल रहे हैं. रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन के आचरण से आहत होकर ही पं. दीनदयाल ने उनके विरोध में बड़ा आंदोलन किया था और उस आंदोलन का सटीक कारण था. मेनन ने एक भेंट वार्ता में राष्ट्र की संप्रभुता के प्रतिकूल दो बाते कहीं थीं. मेनन ने कहा कि भारतीय फौज सशक्त होते हुए भी चीन की सेना का सामना करने में असमर्थ है. दूसरे भारत संविधान में संशोधन किये बगैर चीन या पाकिस्तान को अपना भूभाग नहीं दे सकती. इसे पंडित दीनदयाल ने राष्ट्र के साथ दोगलापन बताते हुए धिक्कारा था कि पं. नेहरू के विश्वस्त, चहेते रक्षामंत्री ने देश का मनोबल गिराया है, लेकिन यह विचार देश की पीढ़ियों को करना होगा कि पं. नेहरू के नेतृत्व में एक रक्षामंत्री के ये विचार क्या संविधान सम्मत और उसकी राष्टभक्ति के अनुकूल माने जा सकते हैं। देश की संप्रभुता के प्रति संदिग्ध सोच और आचरण करने वाले को संवैधानिक पद पर बनाये रखना कांग्रेस की खोखली राजनैतिक नैतिकता मानी जायेगी.