भारत के लिए धड़कता है दिल - नवीन सविता

दिंनाक: 17 Feb 2018 19:00:27


भोपाल(विसंके). जानकी और सुरेन्द्र! ब्राजील की 40 वर्षीय नागरिक जानकी का मूल नाम कॉसमे दी पेसिया और सुरेंद्र का नाम जेओर्जेट दी पेसिया है, जानकी पेशे से इवेंट प्रमोटर है और सुरेन्द्र शिक्षक है I दोनों इन दिनों आध्यात्मिक पर्यटन हेतु भारत, विशेषकर ग्वालियर आए हुए हैं. वैवाहिक जीवन के शुरूआती पड़ाव पर आकर ही इन्होने सनातन हिंदू धर्म अपना लिया, और हिन्दू धर्म के अनुसार शादी कर ली. अब ये दोनों स्वयं को हिंदू बताते हैं और हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन ब्राजील में करते हैं. पति-पत्नी हिन्दू सनातन हिन्दू संस्कृति एवं सनातनी जीवनशैली के बहुत करीब हो गए हैं.


जानकी और सुरेन्द्र ने चर्चा करते हुए बताया कि- हम युवा अवस्था से ही ईश्वर तत्व को खोजने में लगे थे, विभिन्न माध्यमों से हिन्दू धर्म के बारे में जानकारी जुटाई, हमारी धर्म के प्रति दिलचस्पी बढती गई और अपने अंदर की प्रेरणा से हिंदू धर्म से जुड़ी पुस्तकें, साहित्य आदि का अध्ययन किया. सभी जगह से प्राप्त जानकारी के अनुसार मालूम चला कि हिन्दू धर्म में ध्यान लगाना और गुरु का विशेष महत्त्व है . इसलिए गुरु के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए गुरु बनाने का मन बनाया और तीन सप्ताह तक लगातार भगवान् का भजन एवं प्रार्थना की जिससे कोई अच्छा गुरु मिल जाए इसके लिए सनातन धर्म से सम्बंधित कई कार्यक्रमों में सहभागिता की . इसी दौरान मध्यप्रदेश के होशंगाबाद से संत तिलक महाराज एक कार्यक्रम हेतु रिओ-दी-जेनेरिओं आए हुए थे, तब उनसे मुलाकात हुई . तिलक महाराज स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का अनुसरण करते थे. उन्होंने हिन्दू धर्म और रामकृष्ण मिशन आश्रम के बारे में विस्तार से बताया.  इसलिए हम दोनों ने स्वामी तिलक महाराज जी को गुरु बनाने का निर्णय लिया, क्योंकि इस सनातन धर्म हिन्दू से ही ईश्वर तत्व को महसूस किया जा सकता है और यह मनुष्य की आत्मा को मुक्ति की तरफ ले जाता है.

जानकी और सुरेन्द्र अब पूरी तरह से हिन्दू रीतिरिवाज का पालन करते आ रहे हैं . प्रतिदिन सुबह उठकर भगवान् का स्मरण एवं गायत्री मन्त्र का जाप करने के साथ ही दैनिक पूजा पाठ से निवृत होकर अन्य कार्यों को करते हैं. उन्होंने बताया कि ब्राजीलियन को विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित कर धर्म, रीति-रिवाज एवं परम्पराओं से अवगत कराते है.  धर्म से सम्बंधित कुछ जानकारी लेने के लिए आध्यात्मिक साहित्य एवं स्वामी जी का सानिध्य मिलता रहता है और गूगल का भी नए भजन एवं श्लोक सीखने के लिए मदद लेते हैं.  इसलिए हम रहते तो ब्राजील में है और ध्यान आस्था का केंद्र भारत में रहता है. जानकी और सुरेन्द्र ने भारत के कई धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया है. कहते हैं कि मंदिर में दर्शन करने मात्र से ही शान्ति का अनुभव होता है और एक अद्भुत उर्जा मिलती है, मन में एक आशा की किरण जागती है .

2014 से प्रतिवर्ष आ रहे हैं ग्वालियर

दोनों ब्राजील निवासी की भेंट वर्तमान रामकृष्ण मिशन ग्वालियर के सचिव स्वामी राघ्वेंद्रानंद महाराज जी से वर्ष 2014 में इंदौर के आश्रम में हुई थी I उसके बाद से ही स्वामी जी से मिलने और आशीर्वाद लेने प्रतिवर्ष ग्वालियर आते हैंI कहते हैं - स्वामी जी से मिलने के बाद आध्यात्मिक जानकारी के साथ ही एक पिता की तरह मार्गदर्शन देते हैं.

वर्ष 1993 में ली दीक्षा 

जानकी और सुरेंद्र ने मध्यप्रदेश के होशंगाबाद आश्रम के स्वामी तिलक महाराज से वर्ष 1993 में दीक्षा ली, और स्वामी जी ने ही रामकृष्ण मिशन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया. हिन्दू धर्म एवं मिशन से जुड़े कुछ साहित्य भी इनको पढ़ने के लिए दिए गए और रामकृष्ण मिशन आश्रम में ले जाकर आध्यात्मिक रीति-रिवाजों से अवगत कराया. 

हर माह करते हैं धार्मिक आयोजन

जानकी और सुरेंद्र ब्राजील के रिओ-दी-जेनेरियो स्थित घर पर ही भारतीय संस्कृति से सम्बंधित विभिन्न आयोजन प्रति माह करते हैं. जिसमें प्रमुख रूप से गायत्री मंत्र का जाप एवं भगवान् राम, कृष्ण एवं गणेश जी के भजन कार्यक्रम विशेष रूप से करते हैं . इसके साथ ही योग का प्रशिक्षण भी देते हैं और होली, दिवाली, जन्माष्टमी आदि त्यौहार विशेष रूप से मनाते हैं.  

घर पर देते हैं प्रशिक्षण  

जानकी और सुरेन्द्र ने भारतीय व्यंजनों को बनाना सीखा है अब वो ब्राज़ील में ब्राजील निवासियों के लिए कुकिंग क्लास चलाती हैं और पारम्परिक भारतीय व्यंजन - मटर पनीर, आलू मटर, डोसा, इडली, ढोकला, गुलाब जामुन इत्यादि बनाने की विधि सिखाती हैं. इसके साथ ही ब्राजीलियन महिलाओं को साड़ी पहनाना, मेहंदी लगाना भी सिखाती हैं. जानकी और सुरेन्द्र दोनों प्रति वर्ष 100 से अधिक लोगो को प्रशिक्षण देते हैं.  

भारत की सामग्री करते हैं वितरित

जानकी और सुरेन्द्र प्रति वर्ष भारत आते हैं तभी यहाँ से भारत में बनी हुई वस्तुएं जैसे चूड़िया, पायल, माला, कैंडल्स, मिट्टी के दिए, साड़ी, चुनरी, मेहंदी, भगवान के चित्र एवं मूर्तियाँ, आध्यात्मिक पुस्तकें आदि खरीद कर ले जाते हैं. फिर वहां पर विक्रय कर आश्रम के लिए सहयोग निधि एकत्रित करते हैं.