19 फरवरी / छत्रपति शिवाजी जयंती

दिंनाक: 19 Feb 2018 20:03:25


दृढ-निश्चयी महान देशभक्त, धर्मात्मा, राष्ट्र निर्माता तथा कुशल प्रशासक शिवाजी का व्यक्तित्व बहुमुखी था. माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा और आज्ञाकारिता उन्हें एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है. शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था. साहस, शौर्य तथा तीव्र बुद्धि के धनी शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630, को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था. शिवाजी की शिक्षा-दीक्षा माता जीजाबाई के संरक्षण में इुई थी. माता जीजाबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं. उनकी इस प्रवृत्ति का गहरा प्रभाव शिवाजी पर भी था. शिवाजी की प्रतिभा को निखारने में दादाजी कोंणदेव का भी विशेष योगदान था. उन्होने शिवाजी को सैनिक एवं प्रशासकीय दोनों प्रकार की शिक्षा दी थी. शिवाजी में उच्चकोटी की हिन्दूत्व की भावना उत्पन्न करने का श्रेय माता जीजाबाई को एवं दादा कोणदेव को जाता है. शिवाजी की बुद्धि बडी ही व्यवहारिक थी, वे तात्कालिक सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति बहुत सजग थे. हिन्दू धर्म, गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा करना उनका उद्देश्य था. शिवाजी की प्रतिमा हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में स्थापित है. वे मुगल शासको के अत्याचारों से भली-भांति परिचित थे. वे देश को स्वतंत्र करा हिंदवी स्वराज की स्थापना करना चाहते थे. उन्होंने मावल प्रदेश के युवकों में देश प्रेम की भावना का संचार कर कुशल तथा वीर सैनिकों का एक दल बनाया. शिवाजी अपने वीर तथा देशभक्त सैनिकों के सहयोग से जावजी, रोहिडा, जुन्नार, कोंकण, कल्याणी आदि उनके किलों पर अधिकार स्थापित करने में कामयाब रहे. प्रतापगढ तथा रायगढ दुर्ग जीतने के बाद उन्होंने रायगढ को मराठा राज्य की राजधानी बनाया था. शिवाजी पर महाराष्ट्र के लोकप्रिय संत रामदास एवं तुकाराम का प्रभाव था. संत रामदास शिवाजी के आध्यात्मिक गुरू थे, और उन्होने ही शिवाजी को देश-प्रेम और देशोद्धार के लिये प्रेरित किया था. शिवाजी की बढती शक्ति  बीजापुर के लिये चिन्ता का विषय थी. आदिलशाह की विधवा बेगम ने अफजल खाँ को शिवाजी के विरूद्ध युद्ध करने के लिये भेजा था. अफजल खाँ की विशाल सेना से शिवाजी खुल्लम-खुल्ला युद्ध नहीं करना चाहते थे. अतः शिवाजी ने समझौता प्रस्ताव भेजा भयाक्रान्त अफजल खाँ शिवाजी की हत्या छल से करना चाहता था. 10  नवम्बर 1659 को भेंट का दिन तय इुआ. शिवाजी जैसे अफजल खाँ के गले मिले, अफजल खाँ ने शिवाजी पर वार कर दिया. शिवाजी को उसकी मंशा पर पहले से ही शक था, वे पुरी तैयारी से गये थे. शिवाजी ने अपना बघनखा अफजल खाँ के पेट में घुसेड दिया. अफजल खाँ की मृत्यु के पश्चात बीजापुर पर शिवाजी का अधिकार हो गया. इस विजय के उपलक्ष्य में शिवाजी ने प्रतापगढ में एक मंदिर का निर्माण करवाया जिसमें माँ भवानी की प्रतिमा को पुनः प्रतिष्ठित किया. शिवाजी एक कुशल योद्धा थे. उनकी सैन्य प्रतिभा ने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शासक को भी विचलित कर दिया था. शिवाजी की गोरिल्ला रणनीति जग प्रसिद्ध है. शाइस्तां खाँ पर सफल हमला और औरंगजेब जैसे क्रुर शासक के मांद से भाग आना, इसी प्रतिभा और विलक्षण बुद्धि का परिचायक है. शिवाजी एक सफल कूटनीतिज्ञ थे. इसी विशेषता के बल पर वे अपने श़त्रुओं पर भारी पडते थे बीस वर्ष तक लगातार अपने साहस, शौर्य और रण-कुशलता द्वारा शिवाजी ने अपने पिता की छोटी सी जागीर को एक स्वतंत्र तथा शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित कर लिया था. 6 जून 1674 (ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी ) को शिवाजी का राज्याभिषेक  हुआ था. शिवाजी जनता की सेवा को ही अपना धर्म मानते थे. हिन्दू संस्कार के कारण उन्होंने अपने प्रशासन में सभी वर्गों और सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिये समान अवसर प्रदान किये. कुशल प्रशासन हेतु उन्होंने अष्ट प्रधान की व्यवस्था बनाई थी. कुशल एवं वीर शासक छत्रपति शिवाजी का 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी का स्वर्गवास हो गया. शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता ही नहीं थे अपितु, मध्य युग के सर्वश्रेष्ठ मौलिक प्रतिभा- सम्पन्न व्यक्ति थे. महाराष्ट्र की विभिन्न जातियों के संघर्ष समाप्त कर उनको एक सूत्र में बांधने का श्रेय शिवाजी को ही है. शिवाजी के चरित्र से स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, डॅा. केशवराव बलिराम हेडगेवार, वीर सावरकर. भगत सिंह एवं सुभाषचंद्र बोस बडे प्रभावित थे. भारत की समस्त समस्याओं का व्यवहारिक हल छत्रपति शिवाजी की राह पर चलकर ही संभव है. इतिहास में शिवाजी का नाम, हिन्दू रक्षक के रूप में सदैव सभी के मानस पटल पर विद्यमान रहेगा.


साभार:- संघ प्रवाह