अंत्योदयी समाज के अच्छे दिन - जयराम शुक्ल

दिंनाक: 02 Feb 2018 18:43:28


भोपाल(विसंके). बजट को लेकर मेरी कसौटी किसानों, गरीबों और युवाओं के लिए क्या? से शुरू होती है. बाकी मसले तो कर्मकांडी और रस्म अदायगी के होते हैं. इस बजट को सरसरी तौर पर पढ़ा तो पहली नजर में ही ऐसा लगा कि सरकार चुनावों से पहले सूटबूट की सरकार के लाँछन को पूरी तरह से खंडित कर जमींदोज करके ही मानेगी. बजट का जो मूलस्वर है वह वामपंथी सोच रखने वालों को मूक और भाजपा के गली मुहल्ला तक के नेताओं को वाचाल कर देने वाला है. मेरी जानकारी में गरीबों और किसानों की बरक्कत को ध्यान में रखकर इतिहास में पहली बार ऐसा बजट आया है. मिडिल क्लास के लिए यह जरूर घुमावदार है पर उस वर्ग के लिए जिसकी आबादी देश में साठ प्रतिशत से ज्यादा है बिलकुल साफ साफ है. गरीबों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जो बजटीय घोषणा है वह न सिर्फ ऐतिहासिक है अपितु विश्वभर में बोजोड़ होगी बशर्ते अमल पर आ जाए. विपक्ष और सरकार के आदतन विरोधी इसे चुनावी गेम करार करने के सिवाय ज्यादा कुछ नहीं कह सकते. फिर भी विरोध करने के लिए विरोध के स्वर और प्रतिटिप्पणी कुछ हफ्ते तक सुनने-पढ़ने को मिलेंगी ही.


किसान और खेती पिछले पाँच साल से चर्चा में केंद्रीय विषय रही है. कर्ज से डूबे किसानों की आत्महत्याओं के सिलसिले ह्रदय विदारक रहे हैं। ऐसा कोई भी प्रांत नहीं जहाँ किसानों के आंदोलन न चल रहे हों. मोदीजी के लिए गुजरात विधानसभा का चुनाव सबसे बड़ा आईना था. शहरों ने न सँभाला होता तो इस बार ही भाजपा की जाजम उलटनी तय थी. बजट बताता है कि मोदीजी ने गुजरात के किसानों के गुस्से से देश भर के किसानों के गुस्से को नाप लिया. कृषि उपज की लागत का डेढ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य बहुत बड़ा साहसिक फैसला है. किसान कम से कम इतना ही चाह रहे थे. मैंने कई बार अपने लेखों में किसानों की खेती की अर्थगणित के जरिए ध्यान खींचने की कोशिश की.  खेती को घाटे के सौदे से उबारे बगैर किसानों के कुशलक्षेम की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह किसी के लिए कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं था. बजट में इस फैसले के लिए मोदी-जेटली को जितना साधुवाद दिया जाए वो कम. आपरेशन ग्रीन भी खेती को सपोर्ट करने वाला प्रभावी कदम है. अन्न,फल,सब्जियों के भंडारण, प्रसंसकरण और विपणन की यह श्रृंखला किसानों को औने-पौने कीमतों की विवशता से बचाएगी. इस बजट ने मोदी के प्रति यह भरोसा मजबूत करने का कारण दिया है कि वे वाकय कृषि को 2022 तक दोगुने मुनाफे में लाने के लिए कटिबद्ध हैं. गांव व खेती के लिए बजट में 14 लाख करोड़ का प्रावधान काफी कुछ हदतक सूरतेहाल बदलेगा.

यह वर्ष भाजपा के प्रज्ञा पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी की जन्मशताब्दी वर्ष है. जिस अंत्योदयी समाज के उत्थान की उन्होंने परिकल्पना की थी बजट में उसे अंतस से महसूस किया गया है. गरीबों के लिए  एक वर्ष के लिए पाँच लाख तक के मेडिकल बीमा का प्रावधान किया गया है. इसके दायरे में कोई 50 करोड़ लोग आएंगे। सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में यह विश्व की सबसे बड़ी योजना और कार्यक्रम होगा. बेघरों को आवास देने के मामले में मोदी सरकार वैसे भी संजीदगी से काम कर रही थी. एक साल में 51 लाख आवास बनाने के लक्ष्य के साथ निराश्रितों के सपने में पंख लगाने का जतन किया गया है. बजट में मोदी की दृढ़ता और संकल्पशक्ति साफ उभर कर आती है. महात्मा गांधी को समर्पित स्वच्छता अभियान को मुकाम तक पहुंचाने के लिए जितने भी जतन होने चाहिए उनके लिए कार्यक्रम की स्पष्ट रूपरेखा है. एक साल के भीतर 2 करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

जिस दिन गुलाबी झोले में भरकर देश का आर्थिक सर्वेक्षण संसद पहुँचा था उसी दिन से यह तय लग रहा था कि सरकार देश की महिलाओं पर खास फोकस करने जा रही है. महिला उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर उपलब्ध कराने का लक्ष्य 5 से 8करोड़ किया गया है, यानी कि 3 करोड़ इसी एक साल में, यह आँसू पोछने का जतन निश्चित ही मोदी सरकार के लिए फलदायी होगा. कामकाजी महिलाओं के लिए ईपीएफ के अंशराशि की कटौती उनके पाकेटमनी को राहत देगी. कुलमिलाकर फौरीतौर पर यह बजट किसानों,गरीबों और महिलाओं के चेहरे में मुस्कान लाने वाला है. भले ही इसे चुनावी दरियादिली की संग्या दी जाए पर जब इसे यूपीए के बजटों के बरक्स देखते हैं तो यह ज्यादा मानवीय,ज्यादा संवेदनशील नजर आता है.

इस बजट में जहाँ तक युवाओं के लिए क्या? का सवाल है उसका साफ-साफ रोडमैप नहीं दिखता. अलबत्ता यह जरूर कहा गया है कि साल भर में 70 लाख नौकरियों का लक्ष्य है. जाहिर है ये नौकरियां स्वरोजगार, निजी क्षेत्र पर ज्यादा निर्भर है, वरना अकेले रेल्वे सेक्टर में 2 लाख पद रिक्त हैं केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में 7 लाख की भर्तियों की गुंजाइश है. हाल में पकौड़े वाला जुमला फैला है इस बजट में युवाओं के लिए यह तय कर पाने के कोई क्लू नहीं हैं कि उनके रोजगार के रास्ते किन गलियों से गुजर कर जाएंगे. मिडिल क्लास के लिए रहत घुमावदार है. इस साल भी यह वर्ग उम्मीद लगाए बैठा था कि टैक्स स्लैब बदलेगा पर उसे जस का तस छोड़ दिया गया. बजट में आँकड़ों की बाजीगरी न हो तो फिर वह बजट ही कैसा? इस बार स्टैंडर्ड डिडक्शन 40000 रु कर दिया गया लेकिन दूसरा कान पकड़ते हुए 15 हजार का मेडिकल रिअंबर्समेंट और 19 हजार का कन्वेस खत्म कर दिया. यानी का वास्तविक डिडक्शन होगा 6 हजार रुपये का. बजट के आलोचकों को मिडिल क्लास का मसला मिल गया है वे इसे अपने विश्लेषणों में कुछ दिन भुनाएंगे और विपक्ष इन्हें लेकर हवा बनाने की कोशिश करेगा. कारपोरेट सेक्टर में क्या लिया दिया यह अभी मेरी समझ से परे है. सट्टा और शेयर बाजार का धड़ाम से गिरने को मेरे जैसा मूरख यही मानकर चल रहा है कि उसे किसानों और गरीबों की मुस्कान नहीं सुहाई है. कुल मिलाकर यह बजट कम्युनिस्टों के सर्वहारा की बरक्कत वाले चिर एजेंडे से कई कदम आगे ही है या ये कहिए कि चुनाव तक अंत्योदयी समाज के अच्छे दिन बने ही रहेंगे.