21 फरवरी / पुण्यतिथि - रानी चेन्नम्मा

दिंनाक: 21 Feb 2018 17:44:38


भोपाल(विसंके). इतिहास में चेन्नम्मा नाम की दो वीरांगनाएँ प्रसिद्ध हैं. इनमें से एक हैं केलादि और दूसरी कित्तूर की रानी. कर्नाटक के मलवाड क्षेत्र में समुद्र तट तक फैले हुए राज्य केलादि के प्रथम राजा चैडप्पनायक जो सन् 1500 में सिंहासन हुए थे, उन्हीं के राज्य के छोटे से गाँव कोटपुर के निवासी सिदप्पा शेट्टी के यहाँ एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम चेनम्मा रखा. चैडप्प नायक की वंश परम्परा में शिवप्पनायक का छोटा बेटा सोमेश्वर सन् 1664 में केलादि की राजगद्दी पर बैठा. वह विवाह नहीं कर रहा था. एक दिन राजा ने केलादि के रामेश्वर मेले में सहेलियों सहित गई चेनम्मा को देखा. उसे देखकर लगा कि यही कन्या हमारे योग्य है. चेन्नम्मा के पिता सिदप्पा शेट्टी के पास  प्रधानमंत्री ने विवाह का प्रस्ताव भेजा जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया और राजसी ढंग ये बिदनुर  के राजमहल में विवाह सम्पन्न हुआ. थोडे ही समय में अब रानी बन चुकी चेन्नम्मा ने राजकाज के सारे गुर सीख लिये और राजा का सहयोग करने लगी.. यह साहसी के साथ दयालू, धार्मिक और भगवान की भक्त भी थी. उन्हें दान देना अच्छा लगता था. विजय नगर के समय से ही दशहरा उत्सव ’नाडहब्बा’ (राष्ट्रीय पर्व) मनाया जाता था. एक बार दशहरा उत्सव में ’जम्बुखण्डी’ की प्रख्यात नर्तकी कलावती ने राज परिवार के सामने नृत्य किया. प्रसन्न  होकर राजा ने उसे राजनर्तकी का पद प्रदान किया. धीरे-धीरे  नर्तकी कलावती और राजा की निकटता बढती गयी और आगे चलकर राजा पूरी तरह राजकाज छोड़ दूसरे स्थान पर कलावती के साथ रहने लगा. उसके पिता भरमेमाबूत की दवाईयाँ खाकर राजा अर्द्धविक्षिप्त हो गया, बहुत से रोगों ने उसे घेर लिया जानकारी पाकर बीजापुर के सुल्तान ने सौदेबाजी के लिये दूत जन्नोपंत को भेजा और उसी के पीछे आक्रमण के लिए मुजफ्फर खान के नेतृत्व भारी सेना भेज दी. रानी ने बुरा समय देख तीन लाख रूपये देकर संधि कर ली. लौटते समय जन्नोपंत ने भरमेमाबुत को फूसलाकर राजा सोमेश्वर की हत्या कर दी. तब रानी ने अपने पिता सिदप्पा शेट्टी और विश्वस्त सेनापतियो की मदद से राज्य की बागडोर अपने हाथ सम्हाली और बसप्पानायक नामक बालक को गोद ले लिया ताकि वह सोमेश्वर का उत्तराधिकारी बन सके. बीजापुर के सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया. निर्णय के अनुसार रानी खजाने सहित जंगल में बने सुरक्षित किले भुवनगिरि में गुप्तमार्ग से निकल गयी. विद्रोहियों को किले में न रानी, न खजाना कुछ भी हाथ नहीं लगा. तिम्मणनायक जो राज्य  का प्रधानमंत्री था, बच्चा गोद लेने के मतभेद के कारण राज्य छोडकर चला गया था, देशभक्त होने के कारण इस समय वह लौटकर  भुवनगिरि आया और रानी से माफी माँगी. रानी ने चतुर प्रधानमंत्री को क्षमा कर फिर से प्रधानमंत्री बना दिया. बीजापुर की सेनाएँ अब भुवनगिरि की तरफ बढीं. रानी युद्ध को तैयार थी दोनों सेनाऔं की जंगलभरी पथरीली घाटियों में भिडंत हुई. कन्नड वीरों का पलडा भारी पडा, रानी की जीत हुई. सन् 1671 में नागरिकों ने भुवनगिरी के किले में रानी चेन्नम्मा का राजतिलक किया रानी ने गद्दार जन्नोपंत व भरमेमाबुत को पकडकर मरवा दिया. मैसूर के राजा चिक्कदेवराय वोडेयर ने अंधक व्यकटनायक देशद्रोही की सहायता से केलादि पर आक्रमण किया जिसे रानी के सेनापति भद्रप्पनायक ने पराजित कर दिया. छोटे-छोटे राज्य सोदे, सिरसी, और वनवासी आक्रमणों को भी विफल कर दिया. मैसुर ने दूसरी बार फिर चढाई कर दी. अबकी बार रानी की सेना ने उसका पूरा मन भर दिया और चिक्कदेवराय को रानी से संधि करनी पडी. इधर औरंगजेब ने चढाई कर शिवाजी के पुत्र संभाजी को मार डाला, राजाराम का भी सेना पीछा कर रही थी. तभी राजाराम द्वारा शरण मांगने पर राष्ट्रभक्त रानी ने ’आये शरण तजौं नहिं ताहु़’’प्रधानमंत्री और पिता के न कहने पर भी शरण दे दी. क्रुद्ध औरंगजेब की सेना पुत्र आजम खाँ के नेतृत्व में आ पहुँची तब तक राजाराम को रानी ने सुरक्षित जिंजी के किले तक पहुँचा दिया. आजम खाँ को केलादि की सेना ने परास्त कर कई मुगल सरदारों को बंदी बना लिया. आजम खाँ  को संधि करनी पडी तब उसके सैनिक छोडे. औरंगजेब ने केलादि का स्वतंत्र राज्य स्वीकार किया. जा औरंगजेब अपने को आलमगीर, मतलब ऐसा व्यक्ति जिसने विश्व को जीत लिया हो, कहता था. समझौता करना पडा. रानी ने आय बढाने के लिए पुर्तगाली और अरबों से व्यापारिक समझौते भी किये. रानी ने रामेश्वर, काशी, श्रीशैल, एवं तिरूपति सहित कई मंदिरों को दान दिया. सन् 1671 से 1696 तक केलादि पर शासन करने वाली चिन्नम्मा सर्वगुण सम्पन्न अपने दत्तक पुत्र बसप्पनायक को राज्यधिकार दे पवित्र श्रावण में बिदनूर के कोप्पल मठ में भौतिक शरीर  छोड स्वर्ग पधार गयीं. कित्तूर (कर्नाटक में एक जागीर) की रानी चेन्नम्मा ने अपने पति की अकाल मृत्यु के बाद अंग्रेजों  की कित्तूर हडपने की योजना को विफल करने के लिए डटकर टक्कर ली. अंग्रेज संधि करने को विवश हुए. बाद में अंग्रजों ने छल करके चेन्नम्मा को बंदी बनाकर बेलहोंगल के किले में रखा. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह रानी ने जीवनोत्सर्ग कर दिया.