संभावनाओं के क्षितिज में अवनि की उड़ानसाँच कहै ता.. -जयराम शुक्ल

दिंनाक: 24 Feb 2018 17:15:06


भोपाल(विसंके). शब्दचित्र कभी-कभी ही अर्थवान होते हैं लेकिन अवनि चतुर्वेदी के लिए यह बिलकुल सटीक बैठता है. अवनि यानी धरती ने व्योम की अनंत ऊँचाइयाँ नापने की ठानी है. इस अवनि की पृष्ठभूमि महानगर नहीं अपितु धूलधूसरित और सदियों से व्यवस्था से उपेक्षित वो इलाका है जहाँ भारतमाता अभी भी ग्राम्यवासिनी है, शाइनिंग इंडिया की चमकीली छाया अभी वहाँ तक नहीं पहुँच पाई है। देशभर के मीडिया ने छापा, रीवा की बेटी अवनि अकेले युद्धक विमान उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला बनी. हमारे अवनि की प्राणप्रतिष्ठा प्रतियोगी परीक्षाओं के सामान्यग्यान कोष में हो गई.


एक अखबारनवीश होने के नाते मैं यह अनुमान लगा सकता हूँ कि मीडिया ने अवनि चतुर्वेदी को रीवा के नाम से क्यों जोड़ा होगा? अमूमन आमधारणा यह बन चुकी है कि बड़ी उपलब्धियों के हकदार सिर्फ महानगर ही हैं जहाँ पब्लिक स्कूलें हैं,साधन सुविधाएं हैं जहाँ प्रतिभाओं का एक्सपोजर है. इसलिये जब किसी गुमनाम पिछड़े इलाके से कोई प्रतिभा उभरकर सामने आती है तो वह मीडिया के लिए सनसनी बन जाती है। हमारी अवनि फिलहाल ऐसी ही सनसनी है और टीवी चैनलों व इस्टमेनकलर पत्र-पत्रिकाओं में चल रहे खबरों के बकवासी दौर में आँखों को सुकून और मनोमष्तिक को  तृप्ति देने वाली है.

याद होगा कि पश्चिम-बंगाल की बुला चौधरी जब तैराकी की नेशनल चैम्पियन बनीं, उत्तराखंड के गरीब घर की बेटी बछेंद्री पाल ने एवरेस्ट के शिखर पर तिरंगा फहराया और झारखण्ड की दीपिका कुमारी अंतर्राष्ट्रीय तीरंदाज़ी जीता, सिंगरौली की अपनी बेटी नुजहत परवीन भारतीय क्रिकेट टीम की सदस्य बनी  तो भी वे मीडिया में इसी तरह उभरीं थीं। कमाल की बात यह कि ये सभी ग्रामीण व कस्बाई पृष्ठिभूमि से निकल कर आगे आईं थी. जिस दौर में जब महानगरों की कथित इंटरनेशनल पब्लिकस्कूलों में पढ़ने वाली छात्र-छात्राएं महज मौजमस्ती और छुट्टी के लिए अपने ही साथियों तक का गला रेत देनें में उफ न करती हों उस दौर में ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठिभूमि में पल बढ़कर और पढ़कर निकलीं अवनि चतुर्वेदी जैसी बेटियाँ जब शौर्य और युद्ध कौशल में पुरुष एकाधिकार को तोड़ती हैं तब तो यह गर्वपूर्वक कहना ही होगा कि भारतमाता ग्राम्यवासिनी की कोख से पैदा हुई संतानें ही इंडिया के सपनों में पंख लगा रही हैं.

नन्हीं अवनि का फ्लाइंग आफीसर अवनी चतुर्वेदी बन जाना उनके माता-पिता सविता-दिनकर प्रसाद चतुर्वेदी की साधना और संस्कार का प्रतिफल है. दिनकरजी इंजीनियर हैं पर उनकी नाल अभी भी गाँव से जुड़ी है. अवनि के अग्रज भारतीय फौज में कर्नल हैं. हमारे विंध्यक्षेत्र में अभिभावकों खासकर ब्राह्मण परिवारों में अभी तक यह मानस बना था कि बेटी को डॉक्टर बनाओ और कम से कम अध्यापक तक में संतोष कर लो. पर पिछले पाँच सालों से बेटियों की मेधा और अदम्य इच्छाशक्ति ने इस धारणा को लगातार तोड़ा है. गए साल मैहर के समीपी गाँव अमदरा की बेटी सुरभि गौतम ने आईएएस में प्रवीण्य सूची में स्थान बनाकर आने वाली पीढ़ी को रोशनी दिखाई. जितनी कम उम्र में सुरभि आईएएस बनीं उसके चलते हमसब वह सुखद दिन देख सकते हैं कि वह  मुख्यसचिव बनकर किसी प्राँत की प्रशासनिक बागडोर सँभालें.

कहते हैं कि जब राजा किसी इलाके के साथ अन्याय व पक्षपात करता है तब वहाँ के जनों को ईश्वरीय व्यवस्था सँभाल लेती है. विंध्यक्षेत्र के संदर्भ में शायद ऐसा ही है. मुगलों और अँग्रेजों के समय तक यह इलाका दुर्दम्य सामंती शोषण और अत्याचारों के लिए जाना जाता था. मध्यभारत की भांति यहाँ स्कूल कालेज नहीं खोले गए. बड़े लोगों के बच्चों के लिए, दरबार,डेली, राजकुमार जैसे कालेज थे, मध्यम और निम्नवर्ग के लिए मंदिरों में चलने वाली संस्कृति स्कूलें। जिसने हैसियत से ज्यादा सामर्थ्य दिखाया तो जघा-जमीन बेंचकर बच्चों को इलाहाबाद-बनारस में पढ़ाया. रेल पटरियाँ इसलिये नहीं बिछने दी गईं कि कहीं यह इलाका भी विकास की मुख्यधारा से न जुड़ जाए. आजादी के बाद जब अपनी सरकार आई और विंध्यप्रदेश बना तो राजनीतिक अदावत शुरू हो गई. एक अच्छे खासे फलते-फूलते राज्य का पाँच साल के भीतर ही गला घोट दिया गया.

हम लोग उस दौर में छात्र और युवा हुए जब जबलपुर,भोपाल,इंदौर में रिमाड़ी-पुर्रा कहकर हमारा मजाक उड़ाया जाता था. जबकि तब भी बात ऐसी नहीं थी, राजनीति, प्रशासन और अन्य क्षेत्रों में विंध्य के बड़े-बड़े जोधा थे और इतनी हैसियत-रसूख तो रखते ही थे कि विंध्य में तकनीकी व उच्च शिक्षा के संस्थान खोल सकते थे जैसे कि भोपाल और इंदौर में एक के बाद एक खुलते गए. यह भी एक साजिश रही क्योंकि उनके बच्चों के लिए दून,डेली कालेज और यहां तक कि विदेशों में व्यवस्था थी. गरीब किसान और निम्नमध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे पढ़कर निकलते और बड़े हाकिम- अफसर बनते तो उन रसूखदारों की संतानों का क्या होता?
लिहाजा ये स्थितियां बनाई गईं और जो भी बचे खुचे शिक्षा संस्थान थे उन्हें नकल और एढाकी अध्यापकों के अड्डों में बदलकर नष्टभ्रष्ट कर दिया गया. उद्योग-धंधे लगे नहीं सिर्फ खेती किसानी, बाबूगिरी, मास्टरी और बड़े शहरों के होटलों में चाकरी करते हुए हमारे अभिभावकों ने भावी पीढ़ी के भविष्य के सपने देखे.

आज विंध्य की मेधाओं ने रिमाड़ी तंज के उन जुमलों को भोपाल के बड़े तालाब में सिरा दिया और दिल्ली जाकर यमुनाजी में बहा दिया है. पिछले पाँच वर्षों का लेखा लगाएं तो यूपीएससी,एमपीपीएससी समेत सभी राष्ट्रीय और प्रदेशिक स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में सबसे बड़ा हिस्सा रिमाडियों ने ही अपने हक में किया है. एक लेखे इन पाँच सालों में पचास से ज्यादा आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, आईआरएस व समकक्षीय अधिकारी हमारे अपने बच्चे हुए हैं. एमपीपीएससी में ये भागीदारी और भी ज्यादा है. सामंती व्यवस्था ने जिस सीधी जिले को गन्ने की तरह चूसकर उसका टटेर बना दिया था वह सीधी आज देश के रंगजगत का स्वर्णिम नाम है. थियेटर के क्षेत्र में उसका नाम कई रेकार्डबुक में दर्ज है. हमारे बच्चे और बच्चियाँ भारतीय क्रिकेट की टीमों में शामिल हो रहे हैं. रणजी ट्राफी में मध्यप्रदेश की टीम में पिछले दस सालों से रिमाड़ियों का ही दबदबा है. विश्वविजयी गामा ने लंदन के अखाड़े में लँगोट घुमाकर और देश के प्रथम अर्जुन अवार्डी बजरंगी प्रसाद शुक्ल ने अंतर्राष्ट्रीय तरणतालों से सोना निकालकर खेल की जिस परंपरा को शुरू किया हमारे बच्चे उसे आगे बढ़ा रहे हैं.

अपना विंध्य आज की तारीख में देश के पैमाने पर ताल ठोक के यह कहने की कूव्वत रखता है कि धूलधूसरित ग्राम्यवासिनी भारतमाता की कोख से निकले और पले-बढ़े बच्चे ही तुम्हारे इंडिया के सपनों में पंख लगाकर कामयाबी की उड़ान भर रहे हैं. हमारी अवनि चतुर्वेदी अब इस मिशन की ध्वजवाहक के रूप में देश और दुनिया के सामने है. उसे अब सलाम ठोकिए.