27 फरवरी / बलिदान दिवस - चन्द्रशेखर आजाद, जो सदा आजाद रहे

दिंनाक: 27 Feb 2018 19:17:28


चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को ग्राम माबरा (झाबुआ, मध्य प्रदेश) में हुआ था. बचपन से ही चन्द्रशेखर का मन अंग्रजों के अत्याचार देखकर सुलगता रहता था. किशोरावस्था में वे भागकर अपनी बुआ के पास बनारस आ गये और संस्कृत विद्यापीठ में पढने लगे. बनारस में ही वे पहली बार विदेशी सामान बेचने वाली एक दुकान के सामने धरना दते हुए पकडे गये. थाने में हुई पूछताछ में उन्होंने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्र, और घर का पता जेलखाना बताया. इस पर बौखलाकर थानेदार ने इन्हें 15 बेंतो की सजा दी. हर बंेत पर ये ’भारत माता की जय’ बोलते थे. तब से ही इनका नाम ’आजाद’ प्रचलित हो गया. आगे चलकर आजाद ने सशस्त्र क्रान्ति के माध्यम से देश को आजाद कराने वाले युवकों का एक दल बना लिया. भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरूए बिस्मिल, अशफाक, मन्मथनाथ गुप्त, शचीन्द्रनाथ सान्याल, जयदेव आदि उनके सहयोगी थे. आजाद तथा उनके सहयोगियों ने नौ अगस्त, 1925 को लखनऊ से सहारनपुर जाने वाली रेल को काकोरी स्टेशन के पास रोककर सरकारी खजाना लूट लिया. यह अंग्रेज शासन को खुली चुनौती थी, अतः सरकार ने क्रान्तिकारियों को पकडने में पुरी ताकत झोंक दी. पर आजाद को पकडना इतना आसान नहीं था. वे वेष बदलकर क्रान्तिकारियों के संगठन में लगे रहे. 27 फरवरी, 1931 के दिन पुलिस को किसी मुखबिर से समाचार मिला कि आज प्रयाग के अल्फ्रेड पार्क में चन्द्रशेखर आजाद अकेले थे और उधर कई जवान. जब आजाद की पिस्तौल में एक गोली रह गयी, तो उन्होंने देश की मिट्ठी अपने माथे से लगायी और उस अन्तिम गोली को अपने माथे से लगायी और उस अन्तिम गोली को अपनी कनपटी में मार लिया. उनका संकल्प था कि वे आजाद ही जन्में हैं और मरते दम तक आजाद ही रहेंगे. उन्होंने इस प्रकार अपना संकल्प निभाया और जीते जी पुलिस के हाथ नहीं आये.