होली मनाने से पहले जाने उसका महत्व

दिंनाक: 01 Mar 2018 18:07:34


भोपाल(विसंके). मौज और मस्ती, रंगीनी और अलमस्ती, आनंद और उल्लास की एक सम्मोहक स्मृति का नाम होली है. यह उल्लास और यौवन का त्यौहार है. यह बीते वर्ष के दुःखो, निराशाओं आदि के स्थान पर नए वर्ष के सुख एवं समृद्धि का मंगल पर्व है. इसका प्रारंभ माघ शुक्ल पंचमी से हो जाता है, जब ऋतुराज बसन्त में प्रकृति रानी का अंग-अंग फूल पत्तों से सज सँवर कर निखार पाने लगता है, जब शस्य श्यामला भूमि का वैभव और सुहावने मौसम की मधुरिमा की आनंद लेते नर-नारी एवं पशु पक्षी अघाते नहीं हैं. होली का त्यौहार फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाते है. युवा तो युवा, बूढों में भी इस समय जवानी आ जाती है. डफली, ढोल, मजीरे बज उठते हैं. और किसानों की टोलियाँ प्रातः काल से ही झूम-झूमकर नाचने-गाने में मस्त हो जाती है।. इस दिन धनी-निर्धनी, मुखिया-दुखिया, ऊँच-नीच, बालक वृद्ध के बीच की भेदक दीवार टूट जाती है और मनुष्य केवल मनुष्य रह जाता है. यह समता एवं मानवता का त्यौहार है और पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है. उत्तरी भारत में देवर, भौजाई, ननद भौजाई, भाभी-भांजे की होजी अत्यंत मस्ती भरी होती है. उसे देख राधा कृष्ण की होली याद आती है. वैसे ब्रज की होजी बहुत प्रसिद्ध है. बसन्त पंचमी के बाद से किसी एक नियत स्थान पर लकडी उपले, खर-पात आदि एकत्र किए जाने लगते हैं. और फाल्गुन की पूर्णिमा तक वहाँ लकडी का अम्बार लग जाता है. फाल्गुन पूर्णिमा की रात को गांव के वयोवृद्ध द्वारा उसकी पुजा करने के उपरान्त होलिका जलाई जाती है. उसमें लोग अपने-अपने घर से लाकर लकडी और उपले डालते हैं. और थोडी-थोडी सिहराती रात में जलती हुई होलिका का आनंद लेते हैं. इस अवसर पर लोग होलिका में लपटों में नवान्न भूनकर भी उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं. होलिका दहन के साथ ढोल-डफली के बीच सभी जातियों के लोग होली का धुल उड़ाकर एक-दूसरे पर रंग, अबीर ,गुलाल डालते और संगीत नुत्य में आत्म विभोर हो जाते हैं. सभी दिल खोलकर पुराने वैर-भाव को भुलाकर, एक दूसरे से मिलते हैं. होली के दिन घर-घर पकवान एवं मिष्ठान बनते और हर आदमी नये-नये वस्त्र पहनकर सज-धजकर बाहर निकलते और एक दूसरे की अबीर-गुलाल लगा खुलकर गले मिलते हैं. इस दिन प्रातः काल कुछ लोग दूसरों पर सडी कीचड उछालते हैं, काले पीले रंग दूसरों के चेहरे पर पोतकर वीभत्स रूप कर देते है. भद्दे और अश्लील मजाक करते हैं,  भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हैं.  ऐसा उनकी अज्ञानता एवं अबोधता के कारण होता है. हमें इससे बचना चाहिए, शिष्टता और सभ्यता को कायम रखना चाहिए. इस अवसर पर कुछ बालक नाना प्रकार के वीभत्स और निर्लज्ज स्वांग बनाते और अंट-शंट बकते हैं.  वे भूल जाते हैं कि होली शत्रुता के विरूद्ध मित्रता का  गंदगी के विरूद्ध स्वच्छता का अभियान है. होली के संबंध में अनेक पौराणिक कथाओं का उल्लेख मिलता है. एक कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु का भक्त था. उसे विष्णु-भक्ति से विमुख करने के लिए हिरण्यकश्यपु ने प्रहलाद को पहाड़ से नीचे ढकेलवाया, हाथी के पैर के नीचे कुचलवाया और अंत में स्वयं तलवार से मारना चाहा परन्तु प्रहलाद अपनी भक्ति में अटल रहा, विष्णु से विमुख नहीं हुआ जब वह उसे किसी उपाय से विमुख न कर सका और उसे मारने में सफल नहीं हुआ, तब उसने अंतिम रावण-बाण छोडा उसकी बहन होलिका थी हिरण्यकश्यपु ने उसे प्रेरणा दी कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठ गई, किन्तु प्रहलाद का बाल भी बांका न हुआ और होलिका जलकर भस्म हो गई. बाद में परमेश्वर ने नृसिंहावतार धारण कर हिरण्यकश्यपु का नाश कर डाला. यह होलिका दहन इसकी भी स्मृति में मनाया जाता है. इसके अनुसार यह पर्व नास्तिकता के ऊपर आस्तिकता की, अधर्म के ऊपर धर्म की, बुराई के  ऊपर भलाई की, दुराग्रह के ऊपर सत्याग्रह की, दानत्व के ऊपर देवत्व की, असत्य के ऊपर सत्य की और हिंसा के ऊपर अहिंसा की विजय स्मारक है. एक अन्य कथा के अनुसार होली या मदनोत्सव भगवान शिव के कामदहन का साक्षी है, तो दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दलन कर गोपबालाओं के साथ रास रचाई तो होली का प्रचलन हुआ. हमारे साहित्य में भी मस्ती लाने वाली इस होली का बडा ही चित्ताकर्षक वर्णन किया है. महाकवि सूरदास ने नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण और वृषभानु किशोरी राधा के होली खेलने का बडा ही सजीव वर्णन किया है. उनके एक पद की कुछ पंक्तियां हैं:-


नन्दनन्दन वृषभानु किशोरी, मोहन राधा खेलत होरी।

श्री वृन्दावन अतिहि उजागर, बर-बरन नव दम्पति भोरी ।।

एकनि कर है अगरू कुमकुमा, एकनि कर केसरि लै घोरी।

एक अर्थ सौ भाव दिखावति, नाचति तरू व बाल वृध भोरी।।

स्यामा उतहिं सकल ब्रजवनिता, इतहिं स्याम रस रूप लहौ री ।

क्ंचन की पिचकारी छुटति, छिरकत ज्यों सचुपावें गोरी ।।

साभार:- उत्सव मेरे प्राण