आज की अभिव्यक्ति

दिंनाक: 17 Mar 2018 16:42:54


अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप हमारी प्रवृत्ति बहिर्मुखी हो गई. साथ ही आजीविका के लिए कलम का सहारा ही प्रमुख होने के कारण हम वीणापाणी के पवित्र सन्देश को भूल गए. हमारी रीति, नीति, विचार,व्यवहार, किसी का भी संबंध गाँवों में फैले करोड़ों लोगों से न रहा. अंग्रेजों ने इस विभेद को सब प्रकार से बढाया ही. यहाँ तक कि सन 1935 के विधान में तो हिन्दू और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था नहीं थी, अपितु शहरी और देहाती इलाकों के अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र परिसीमित हुए.
सभ्यता और संस्कृति के इस खोखलेपन के साथ ही धीरे-धीरे आर्थिक दिवालियापन भी घर कर कर गया. 

- पं. दीनदयाल उपाध्याय