देव मन्दिर क्यों जाना चाहिए ?

दिंनाक: 29 Mar 2018 15:17:09


भोपाल(विसंके). देवालयों का मानव के मन में इस प्रकार से वातावरण का गहरा प्रभाव पडता है. साथ ही धार्मिक स्थलों तक आने-जाने में जो शारीरिक श्रम व्यक्ति को करना पड़ता है. उसका भी स्वास्थ्य पर उत्तम प्रभाव होता है. यहाँ के मनोरम और रमणीय वातावरण में मानसिक तनाव दूर होता है. ऐसे वातावरण में जीवन विकासोन्मुख होता है. दरअसल हमारे पूर्वजों ने स्वास्थ्य के लिए उपयोगी अनेक वैज्ञानिक तथ्यों को धार्मिक रूप् दे दिया है. धार्मिक स्थलों पर अनक सत्कर्म होते हैं. कल्याण की सदा प्रवृत्ति होती हैं. वहाँ का वातावरण एक विशेष ऊर्जा से सम्पन्न रहता है, जो हृदय को प्रसन्न करता है. भाव कर रोग से सीधा संबंध है, सकारात्मक भाव रोग की प्रतिरोधक-क्षमता बढाते हैं.


पूजन:-

पूजा-आराधना के धार्मिक लाभों का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखायी ही देता है. पूजा एक रासायनिक क्रिया है. इससे मंदिर के भीतरी वातावरण की पी.एच.वैल्यू (तरल पदार्थ मापने की इकाई) कम हो जाती है. इससे व्यक्ति की पी.एच.वैल्यू पर असर पडता है. यह रासायनिक प्रक्रिया है जो शारिरिक रसायनशास्त्र को बदल देती है. यह क्रिया बीमारियों को ठीक करने के लिए प्रभाव डालती है. दवाओं से भी यह क्रिया करवाई जाती है, मंदिर में यह स्वतः ही होता है. मंदिर में शिखर होते हैं. शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा -तरंगे तथा ध्वनि-तरंगे व्यक्ति के ऊपर पडती हैं. यह परावर्तित तरंगे मानव शरीर की प्राकृतिक आवृत्ति को बनाए रखने में भी सहायक होती हैं. व्यक्ति का शरीर एक तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य कर लेता है. इस प्रकार व्यक्ति नवीन ऊर्जा एवं स्फूर्ति कर अनुभव करता है और उसे विशेष आत्मबल प्राप्त होता है.

आरती:-

पूजा के अंत में आरती की जाती है. पूजन में अज्ञानतावश यदि कोई कमी रह जाए तो आरती से उसकी पूर्ति है. स्कन्दपूराण में वर्णन है-

 मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत्कृतं पूजनं हरेः।

 सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे।।

अर्थात मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी निराजन (आरती) कर लेने से पूजन में पूर्णता आ जाती है.

आरती की महिमा का वर्णन विष्णु पुराण में निम्न प्रकार से आया है-

धुपं चारात्रिकं पश्यते् कराभ्यां च प्रवन्दते।

कुलकाटिं समुद्धृत्य याति विष्णोः परं पदम्।।

जो प्राणी धूप- आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह अपनी करोड़ो पीढियों का उद्धार कर लेता है और भगवान विष्णु के परमपद को प्राप्त होता है. साधारणतः पाँच बत्तियों से आरती की जाती है, इसे पँचप्रदीप कहा जाता है, कपूर से भी आरती होती है.

घण्टा बजाते हुए आरती करनी चाहिए. आरती करते समय सर्वप्रथम भगवान प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाएँ तथा दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगो पर घुमायें. आरती अपने इष्ट देवता के लिए की जाती है. जैसे दीपक की लौ ऊपर की ओर जाती है, उसी प्रकार दीपदान-आरती करने वाले भक्त को भी ऊर्ध्वगति प्राप्त होती है. भगवान की ज्योति-आरती जिस भक्त के गात्र को स्पर्श करती है, उसे सहस्त्रों यज्ञानत अवभृथ स्नानों का फल प्राप्त होता है. भावनावाद सिद्धान्त के अनुसार भक्तजन ज्योति की निरन्तर ऊँची उठती हुई लौ को देखकर यह भावना दृढ करता है कि जैसे यह ज्योति की शिखा चारों ओर बराबर रिक्त स्थान होते हुए भी इधर-उधर न जाकर केवल ऊपर को ही जाती है.