ग्वालियर में 7 दिवसीय राष्ट्रीय रामायण मेला में संतों और श्रद्धालुओं का जमघट

दिंनाक: 03 Mar 2018 17:52:41


ग्वालियर. राष्ट्रीय रामायण मेला ग्वालियर के मंच पर देश के श्रेष्ठ संतों की उपस्थिति और विशाल तुलसी मंडपम में अपने मस्तक पर रामचरितमानस धारण किये रामभक्तों का अपार जनसमूह, संतों की ओर से संकल्प विधि की घोषणा और इसको दोहराते हजारों नर-नारी–‘मैं संकल्प करता हूँ कि नित्य रामचरितमानस के कम से कम दो दोहे का पारायण करूंगा’ l किसी कुम्भ मेला के बड़े अखाड़े की तरह ग्वालियर में केसरिया पताकाओं से सुसज्जित अयोध्या धाम परिसर सात दिनों में पूरे ग्वालियर अंचल में एक  संस्कार अभियान की तरह अमिट छाप छोड़ गया l कुम्भ मेले की तर्ज पर यहाँ संत नगर बसाया गया था l 

भारत में चित्रकूट और अयोध्या के बाद अपने प्रकार के अनूठे रामायण मेला में देश के विभिन्न भागों के श्रद्धालुओं ने भी हिस्सा लिया l  23 फरवरी को लगभग एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया l यह सब देखकर कहा जा सकता है कि यह मेला ग्वालियर-चम्बल अंचल में आस्तिकता के पुनर्जागरण का कीर्तिमान बना गया l  दरअसल इस मेले के द्वारा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और उनके आदर्शों जिस प्रकार से प्रस्तुत किया गया उससे लोगों ने यह महसूस किया कि दुनिया में तो लोग भगवान राम और उनके आदर्शों से जुड़ रहे हैं, लेकिन भारत में हम राम से दूर हो गए हैं l अगर बात ग्वालियर अंचल की करें तो यहाँ बिड़ला समूह द्वारा 25 वर्ष पूर्व  इस तरह का धार्मिक आयोजन कराया जाता था l  यह फिर से नए कलेवर में शुरू हुआ है l
वर्षों से विश्व के कई देशों में रामलीला का आयोजन किया जाता है l भारत के विभिन्न हिस्सों में रामलीला और रामचरित मानस के पारायण की परम्परा रही है l लेकिन गत कुछ दशकों में यह परम्परा कमजोर हुई और कई स्थानों पर तो लुप्त होने की कगार पर आ गई है l  एक जमाने में दूरदर्शन पर रामानंद सागर निर्मित धारावाहिक ‘रामायण’ का प्रसारण हुआ था l लेकिन आज की पीढ़ी को रामायण या रामचरित मानस की जानकारी नहीं है l हालांकि देशभर में कई संगठन और लोग मानस पाठ और रामलीला की सुप्त और लुप्त होती परम्परा को पुनर्जीवित करने के प्रयास में लगे हैं l इनके मुताबिक़ देश के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है l यह देश मात्र क़ानून से व्यवस्थित और विकसित नहीं हो सकता l वे जानते हैं धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था भारत के परिवार और समाज को एकसूत्र में आबद्ध करने वाला तत्व है l नई पीढ़ी में नैतिकता और संस्कारों के बीजारोपण करने के लिए घर-घर में मानस पाठ की परम्परा को हर हाल में शुरू करना ही होगा l

समाज में आदर्शों, संस्कारों और परम्पराओं के जागरण की सोच लेकर 17 से 23 फरवरी तक देशभर से साधु-संत, राम कथाकार और मानस मर्मज्ञ ग्वालियर में जुटे l  इस दौरान 51 ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिदिन आनुष्ठानिक रामायण पाठ, मानस सम्मलेन, रामकथा, रामलीला, प्रदर्शनी, कलश यात्रा और अंत में नित्य मानस पारायण का संकल्प हुआ l  इन सात दिनों में सबसे विशेष उपस्थिति रही जगद्गुरुरामभद्राचार्य और राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्षमहंथ नृत्यगोपाल दास जी महाराज की l  रामजन्मभूमि आन्दोलन से जुड़े संत रामभद्राचार्य ने सनसनीखेज खुलासा किया कि आने वाले ६ दिसंबर तक श्रीराम मंदिर का निर्माण होता हुआ दिखेगा l मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया ने इसकी पुष्टि की l रामायण मेले के समापन पर रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास महाराज ने इस मेले को प्रति वर्ष आयोजित करने की उद्घोषणा भी कर दी l
दरअसल इस मेले की संकल्पना बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विहिप के नेता रहे जयभान सिंह पवैया की है l बकौल श्री पवैया – इस तरह के आयोजन की आकांक्षा कई वर्ष पहले की है l अब यह साकार हुई है l यह तीसरा राष्ट्रीय रामायण मेला है l इसके पहले रामायण मेला के आयोजन की परिकल्पना समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने सन 1961 में की थी l इसी के तहत 1973 में पहली बार उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने चित्रकूट में रामायण मेला आयोजित किया थाl बाद में 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र ने अयोध्या में रामायण मेले की शुरुआत की l  यहाँ यह यहाँ यह उल्लेख जरूरी है कि जहाँ डॉ. राममनोहर लोहिया ने आनंद, प्रेम और शान्ति के आह्वान के साथ रामायण मेला आयोजित करने की कल्पना की थी, वहीं अयोध्या में शुरू होने वाला मेला रामायण मेला अयोध्या के विकास के लिए था l किन्तु इस तीसरे राष्ट्रीय रामायण मेले का उद्देश्य और भी अधिक व्यापक और धारदार जान पड़ता है l इस मेले के संयोजक जयभान सिंह पवैया कहते हैं –समाज में किसी भी स्तर पर नेतृत्व कर रहे नेताओं का धर्मं है कि वे किसी भी प्रकार के लाभ-हानि के भाव से मुक्त होकर परिवर्तन के लिए प्रयास करें l रामचरित मानस और रामायण के पारायण के जरिये हम भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाना चाहते हैं l यह संस्कारों का महा अभियान है l’


गौरतलब है कि ग्वालियर के इस मेले में वह सब कुछ हुआ जो अयोध्या और चित्रकूट के मेले में होता आया है l रोजाना हजारों रामभक्तों का जुटना और रामधुन में रत होना भले ही परम्परागत हो, लेकिन युवाओं और महिलाओं का उत्साह और संकल्प कुछ और ही सन्देश देता है l साध्वी और रामकथा की मर्मज्ञ प्रज्ञा भारती ने जब ५ हजार महिला-पुरुषों को रोजाना रामायण के दो दोहों के पारिवारिक पारायण का संकल्प दिलाया तो इसके मायने बहुत अलग हैं l भारत के एकीकरण और समाज को आदर्शों के सूत्र में बांधने के लिए जिस रामायण मेले की कल्पना डॉ. लोहिया ने की थी, और जिसे कमलापति त्रिपाठी ने अयोध्या में शुरू किया, उसी परम्परा को एक कदम आगे जाकर राष्ट्रीय स्वरुप देने के लिए श्री पवैया ने कदम बढ़ाया है l  वे कहते हैं – राम के बिना भारत की और भारतीय समाज की कल्पना नहीं की जा
सकती l राम के व्यक्तित्व और जीवन से हमें राजनीति, समाजनीति और राष्ट्रनीति की सीख मिलाती है l राम से दूर होकर भारतीय समाज वैमनस्य और विषमता से युक्त हो गया है l  रामत्व ही भारतीय समाज को समरस और आदर्श बना सकता है l

झलकियाँ

·         इंदिरा गांधी नॅशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स द्वारा प्रदर्शनी

·         अयोध्या शोध संस्थान की प्रदर्शनी

·         पतंजलि संस्थान द्वारा योग शिविर का आयोजन

·         एक ही मंच पर देशभर के मानस मर्मज्ञ और श्रेष्ठ संत उपस्थित हुए

·         मानस सम्मलेन

·         कलश और शोभा यात्रा

·         साहित्य भंडारों पर लगी भीड़

·         रामलीला दर्शकों में युवाओं की बड़ी संख्या

·         विविध विषयों पर मानस मर्मज्ञों का व्याख्यान

·         मुस्लिम समाज के लोगों की भागीदारी ने जाति-मजहब के भेद को नकारा

·         मानस पाठ और रामकथा से समरसता का पाठ  

 

राष्ट्रीय रामायण मेला के आयोजन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी समर्थन है l  कोलारस और मुंगावली में विधानसभा उप-चुनाव होते हुए भी भाजपा के दिग्गज नेताओं ने इस रामायण मेले में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक अरुण जैन और भाजपा के संगठन मंत्री सुहास भगत समेत मध्यप्रदेश सरकार के अनेक मंत्री भी इस मेले में उपस्थित हुए l मेले में प्रतिदिन 35 से 40 हजार लोगों का जमावड़ा सामान्य बात नहीं है । मेला परिसर में भगवान श्रीराम और उनसे जुड़े हुए साहित्य की प्रदर्शनी और स्टाल भी लगाई गई थी l जगद्गुरू रामभद्राचार्य महाराज, श्रीराम जन्मभूमि न्यास के महंत नृत्यगोपालदास महाराज, साध्वी प्रज्ञा भारती, साध्वी दीपा भारती, मां कनकेश्वरी देवी, ब्रह्मचारी महावीरदास, संत और कथाकार अजय याज्ञनिक महाराज, विश्वभूषणदास महाराज, रावतपुरा सरकार सहित बड़ी संख्या में देश भर से आये साधु-संतों मौजूदगी ने राजनीतिक आकांक्षाओं को बहुत पीछे धकेल दिया। रामायण मेले में संत प्रेमभूषण जी महाराज की रामकथा भी रोजाना हुई। ग्वालियर की धरती पर हुए इस अनोखे आयोजन में मंच से कई घोषणाएं भी हुईं तो वहीं देश में रामराज्य के प्रति जागृति फैलाने का आह्वान भी हुआ l यहां श्रीराममंदिर निर्माण का आगाज हुआ, वहीं राम के प्रति कम होती भक्ति को फिर से जागृत करने की पहल भी की गई ।

इस राष्ट्रीय रामायण मेले की अंतर्धारा अयोध्या आन्दोलन से जुडी है l  पिछले महीने की महाशिवरात्रि को अयोध्या से शुरू होकर रामेश्वरम तक जाने वाली रामराज्य यात्रा के उद्घाटन अवसर पर आयोजित सभा में मुख्य अतिथि विश्व हिन्दू परिषद् के महासचिव चम्पत राय ने कहा -'हमारी मांग है कि राम मंदिर के केस में सुप्रीम कोर्ट जल्दफैसला सुनाए और इस मामले को लटकाए नहीं।‘ इसअवसर पर उन्होंने रामराज्य रथ यात्रा को सामयिक कार्यक्रम बताया और कहा किपूरे देश में एकबार फिर बड़े पैमाने पर राम मंदिर को लेकर जन जागरण होगा।साथ ही उम्मीद है कि अगली राम नवमी तक राम मंदिर बनने लगेगा। जो बात विहिप के महासचिव अयोध्या में कह गए, उसे ही जगतगुरु रामभद्राचार्य महाराज ग्वालियर के राष्ट्रीय रामायण मेले में दुहरा गए l