परिवार संस्कारों की पाठशाला

दिंनाक: 08 Mar 2018 17:40:45


हिन्दू समाज संरचना में परिवार का स्थान महत्वपूर्ण है. आदर्श समाज के लिये जो व्यवस्था नीति, सिद्धान्त, संस्कार आवश्यक हैं वे प्राप्त होते हैं परिवार में. क्योंकि वे अनायास, सहजता से प्राप्त हो इसी कारण परिवार व्यवस्था निर्माण की गयी है. गृहिणी के आस्था-पूर्वक व्यवहार से मनुष्य पशुता की ओर जाने की अपेक्षा मनुष्यता की ओर बढता है. देवत्व की ओर बढने की उसे प्रेरण मिलती है. उसी में से आदर्श समाज स्वयं साकार हो उठता है. भगिनी निवेदिता कहती हैं - ’भारत में किंडरगार्डन की कोई आवश्यकता नहीं. माँ तुलसी को पानी डालने के लिए जा रहीं हैं, बालक साथ में हैं. तुलसी के पत्ते तोडकर लाते समय माँ बताती हैं, ’बेटे कहो, तुलसी, तुम हरिप्रिय हो मैं तुम्हें तोड रहा हूँ अतः नाराज न होना. मैं आपको विष्णुलक्ष्मी के श्रीचरणों पर समर्पित करूँगा तोड़ने के पूर्व पौधे से संवाद करना. शाम हो गयी माँ बताती ’पत्ते तोडना नहीं पेड सोये हैं.’ वे जीवनमान हैं ये संस्कार. छाछ से मक्खन अलग करते समय पूरा मक्खन अलग नहीं करना चाहिये. थोडा से उसी में छोड़ना चाहिए छाछ माँ है, मक्खन बालक. या कहते हैं कृष्ण आयेगा तो उसके लिये थोडा सा तो मक्खन बचाकर रखना है. भिखारी को केवल सुखी रोटी नहीं देना. दाल, अचार, सब्जी, गुड, कुछ तो भी दो सूखी रोटी वह कैसे खायेगा ? परिवार में कभी तीन कभी चार पीढियाँ एकत्रित रहती हैं परंतु कोई लिखित संविधान नहीं रहता, नियमावली नहीं रहती. प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य के लिए तत्पर रहता है. दूसरों के सुख-सुविधाओं की चिंता करता है.



साभार:- पथिक संदेश